भारतीय संस्कृति में ज्ञान प्रदान करने वाले गुरुओं को देवताओं के समान स्थान दिया जाता है। परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करना ही मनुष्य के भविष्य का आधार है। गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना सत्य, ज्ञान और अमूल्य अनुभवों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के समान है।

आषाढ़ माह की पूर्णिमा को परंपरागत रूप से गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। ओशो ने आषाढ़ माह की पूर्णिमा की रात को मनाए जाने वाले गुरु पूर्णिमा के उत्सव के सार को खूबसूरती से व्यक्त किया है। ओशो कहते हैं कि गुरु चंद्रमा के समान है, जिसका अपना कोई प्रकाश नहीं होता, बल्कि वह परम आत्मा से ऊर्जा और प्रकाश प्राप्त करता है। अन्य पूर्णिमा की रातों के विपरीत, आषाढ़ माह की पूर्णिमा का चंद्रमा बादलों से घिरा होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे गुरु अपने शिष्यों से घिरे होते हैं।

व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाने वाला यह दिन ऋषि वेद व्यास की स्मृति और श्रद्धा में मनाया जाता है। वे हिंदू धर्म के आदि गुरु हैं, जिन्होंने वेदों का वर्गीकरण किया, अठारह पुराणों और महाभारत की रचना की। गुरु पूर्णिमा का उत्सव सर्वप्रथम व्यास के शिष्यों द्वारा मनाया गया था। यह परंपरा व्यास की सीमाओं से परे विस्तारित हुई और गुरु पूर्णिमा के रूप में प्रसिद्ध हुई।

गुरु पूर्णिमा वह दिन है जब व्यक्ति अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।

गुरु परम आनंद का साक्षात रूप हैं। वे हमें मुक्ति दिलाते हैं और उनके प्रति हमारे मन में गहरा प्रेम, आस्था और श्रद्धा का भाव रहता है। ओशो कहते हैं कि गुरु एक दिव्य उपस्थिति हैं। उनके माध्यम से ही व्यक्ति को दिव्यता का पहला दर्शन प्राप्त होता है। गुरु साधक का सृजन, रूपांतरण और पुनर्जन्म करते हैं ताकि वह पूर्ण विश्वास के साथ अपने गुरु का अनुसरण करते हुए अनेक अज्ञात पथों और द्वारों से गुजर सके और अनेक अज्ञात ताले खोल सके। गुरु के महत्व पर बोलते हुए ओशो कहते हैं कि गुरु का आशीर्वाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। गुरु के माध्यम से व्यक्ति अपने भविष्य को देख सकता है और अपने भाग्य के प्रति सजग हो सकता है। उनके द्वारा ही व्यक्ति एक बीज की तरह अंकुरित होने लगता है, मानो आकाश की ओर बढ़ रहा हो।

“'गुरु' शब्द का अनुवाद संभव नहीं है। न ही 'शिक्षक' और न ही 'गुरु' शब्दों में वह सुंदरता है। वास्तव में, गुरु की अवधारणा इतनी गहरी भारतीय है कि किसी भी देश की कोई अन्य भाषा इसका अनुवाद करने में सक्षम नहीं है। यह मूल रूप से पूर्वी है। 'गुरु' शब्द दो शब्दों, 'गु' और 'रु' से मिलकर बना है। 'गु' का अर्थ है अंधकार, 'रु' का अर्थ है अंधकार को दूर करने वाला। गुरु का शाब्दिक अर्थ है 'प्रकाश'। और वह प्रकाश आपके भीतर ही है, जी हाँ! यदि आप किसी बुद्ध, यीशु, कृष्ण या महावीर से मिलें, तो यह आपके भीतर के गुरु को खोजने में अत्यंत सहायक होगा, क्योंकि बुद्ध को देखकर अचानक आपके भीतर एक महान उत्साह और आशा जागृत होगी: “यदि यह बुद्ध के साथ हो सकता है”—जो बिल्कुल आपके समान हैं, वही शरीर, वही रक्त, वही अस्थि, वही मज्जा—“यदि यह इस व्यक्ति के साथ हो सकता है, तो मेरे साथ क्यों नहीं?” आशा ही आरंभ है। बाहरी रूप से गुरु से मिलना एक महान आशा, एक महान आकांक्षा का आरंभ है।”

चांद जब पूरा हो जाता है, तब उसकी एक शीतलता है। चांद को ही हमने गुरु के लिए चुना है। सूरज को चुन सकते थे, ज्यादा मौजुद होता, तथ्यगत होता। क्योंकि चांद के पास अपनी रोशनी नहीं है। इसे थोडा समझना।




चांद की सब रोशनी उधार है। सूरज के पास अपनी रोशनी है। चांद पर तो सूरज की रोशनी का प्रतिफलन होता है। जैसे कि तुम दीए को आईने के पास रख दो, तो आईने में से भी रोशनी आने लगती है। वह दीए की रोशनी का प्रतिफलन है, वापस लौटती रोशनी है। चांद तो केवल दर्पण का काम करता है, रोशनी सूरज की है।



हमने गुरू को सूरज ही कहा होता, तो बात ज्यादा तथ्यपूर्ण होती। मिश्रित कर दे। चांद शून्य है; उसके पास कोई रोशनी नहीं है, लेता और सूरज के पास प्रकाश भी महान है, विराट है। चांद के पास कोई बहुत बड़ा प्रकाश थोड़े ही है, बड़ा सीमित है; इस पृथ्वी तक आता है, और कहीं तो जाता नहीं।



पर हमने सोचा है बहुत, सदियों तक, और तब हमने चांद को चुना है दो कारणों से। एक,गुरु के पास भी रोशनी अपनी नहीं है, परमात्मा की है। वह केवल प्रतिफलन है। वह जो दे रहा है, अपना नहीं है; वह केवल निमित्तमात्र है, वह केवल दर्पण है।



तुम परमात्मा की तरफ सीधा नहीं देख पाते, सूरज की तरफ सीधा देखना बहुत मुश्किल है। देखो, तो अड़चन समझ में आ जाएगी। प्रकाश की जगह आंखें अंधकार से भर जाएंगी। परमात्मा की तरफ सीधा देखना असंभव है, आंखें फूट जाएंगी, अंधे हो जाओगे। रोशनी ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, तुम सम्हाल न पाओगे, असह्य हो जाएगी। तुम उसमें टूट जाओगे, खंडित हो जाओगे, विकसित न हो पाओगे।



इसलिए हमने सूरज की बात छोड़ दी। वह थोड़ा ज्यादा है; शिष्य की सामर्थ्य के बिलकुल बाहर है। इसलिए हमने बीच में गुरु को लिया है।



गुरु एक दर्पण है, पकड़ता है सूरज की रोशनी और तुम्हें दे देता है। लेकिन इस देने में रोशनी मधुर हो जाती है। इस देने में रोशनी की त्वरा और तीव्रता समाप्त हो जाती है। दर्पण को पार करने में रोशनी का गुणधर्म बदल जाता है। सूरज इतना प्रखर है, चांद इतना मधुर है!



इसलिए तो कबीर ने कहा है, गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पाय। किसके छुऊं पैर? वह घड़ी आ गई, जब दोनों सामने खड़े हैं। फिर कबीर ने गुरु के ही पैर छुए, क्योंकि बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।



सीधे तो देखना संभव न होता। गुरु दर्पण बन गया। जो असंभवप्राय था, उसे गुरु ने संभव किया है, जो दूर आकाश की रोशनी थी, उसे जमीन पर उतारा है। गुरु माध्यम है। इसलिए हमने चांद को चुना।



ओशो रजनीश

गीता दर्शन प्र 201