उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ब्रिटिश प्रशासकों, मिशनरियों और प्राच्यविदों ने हनुमान को 'Monkey God' कहकर एक विशेष विमर्श रचा। इस नामकरण में दो स्तरीय संचालन था। पहले स्तर पर, यह हिन्दू धर्म को 'primitive' और 'animal-worshipping' सिद्ध करने का प्रयास था — एक ऐसी सभ्यता जिसे 'civilise' करने के लिए ईसाई मिशन की आवश्यकता थी। दूसरे स्तर पर, यह भारतीय जनमानस में हीनभावना का निर्माण करने का उपकरण था।
किन्तु इस 'Monkey God' शब्दावली में, चाहे जितनी भी अवमानना थी, 'God' शब्द की उपस्थिति एक न्यूनतम स्वीकृति तो करती थी — कि यह पूजा का विषय है, कि इसमें एक दिव्यता-बोध है। यह स्वीकृति चाहे अपूर्ण ही क्यों न हो, हनुमान के देवत्व को पूर्णतः अस्वीकार नहीं करती थी।
महत्वपूर्ण यह है कि इस औपनिवेशिक विमर्श का प्रतिरोध भी उतना ही सशक्त था। हनुमान-पूजा को राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनाया गया। स्वामी विवेकानन्द ने वेदान्त की व्याख्या में हनुमान की दास्य भक्ति को विश्व-सेवा से जोड़ा। भक्ति आंदोलन की परम्परा में हनुमान सामाजिक समरसता के प्रतीक रहे थे, नये युग ने उनमें राष्ट्रीयता को देखा।
पर जिस औपनिवेशिक मानसिकता ने स्वतंत्रता से पहले हनुमान को monkey God कहा था, स्वतंत्रता के बाद भारत में आंतरिक द्वेष पैदा करने लगे लोगों ने एक दूसरी स्ट्रेटेजी अपनाई। दया पवार जैसों से आने वाली यह अभिव्यक्ति, जो दलित साहित्य और सामाजिक न्याय के आंदोलनों में इन दिनों चल रही है, अपने मूल में वही औपनिवेशिक स्वर रखती है। जो कथा मुक्ति के लिए प्रेरित करती थी, उसे उठाकर अपनी राजनीति का हथियार बनाना — यह रणनीति कभी-कभी उसी घाव को गहरा कर देती है जिसे भरने की कोशिश की जा रही होती है।
जब हनुमान को 'your monkey' कहा जाता है — अर्थात् किसी के दास, किसी के गुलाम, किसी की सेवा में बंधे हुए — तो यह हनुमान की वह छवि है जो न तो तुलसीदास की है, न वाल्मीकि की, न कम्बन की, न एकनाथ की। यह हनुमान की वह छवि है जो स्वयं औपनिवेशिक विमर्श से उधार ली गई है — और फिर उसे एक नए राजनीतिक उद्देश्य के लिए पुनः प्रयोग किया गया है।
इस अभिव्यक्ति की विडम्बना यह है कि यह औपनिवेशिक 'Monkey God' के उस ढाँचे को ही स्वीकार करती है जिसमें हनुमान को एक जानवर के रूप में देखा जाता है। औपनिवेशिक दृष्टि कहती थी: "ये लोग monkey की पूजा करते हैं।" आधुनिक प्रतिरोध का यह स्वर कहता है: "हम monkey नहीं हैं।" दोनों में एक समान पूर्वग्रह है — कि हनुमान 'monkey' हैं। दोनों ही हनुमान के वास्तविक स्वरूप को, उनके आध्यात्मिक , प्रतीकात्मक और दार्शनिक आयामों को अनदेखा करते हैं।
यह वैसा ही है जैसे किसी ने ईसा मसीह को 'बढ़ई' कहा हो, और प्रतिरोध में कोई कहे "हम आपके बढ़ई नहीं हैं" और इस प्रक्रिया में ईसा के आध्यात्मिक महत्त्व को स्वयं ही नकार दे।
हनुमान शिव के एकादश रुद्रावतार हैं। उनकी भक्ति 'दास्य भक्ति ' का सर्वोच्च उदाहरण है पर यह दासता नहीं, समर्पण है जो अहंकार के विसर्जन से उत्पन्न होती है। वे द्वैत और अद्वैत दोनों के प्रतीक हैं। राम के सामने "दास हूँ" और आत्मज्ञान में "राम हूँ" — यह oscillation भारतीय दर्शन की गहराई है।भक्ति आंदोलन में हनुमान जाति की सीमाओं को तोड़ते हैं। वे किसी वर्ण-व्यवस्था में नहीं बँधते — वे वानर हैं, जो समस्त मानवीय वर्गीकरण से परे हैं। वाल्मीकि में वे कूटनीतिज्ञ हैं, तुलसीदास में भक्त हैं, कम्बन में योद्धा हैं, कृत्तिवास में प्रेमी भक्त हैं — एक ही पात्र का इतना बहुआयामी चित्रण विश्वसाहित्य में दुर्लभ है। वे अष्ट-सिद्धियों के स्वामी हैं। उनका वानर-रूप 'पशुपति' की परम्परा से जुड़ता है — पशु यहाँ 'जीव' का प्रतीक है, और पशुपति उस जीव के स्वामी।इन आयामों को देखते हुए स्पष्ट होता है कि हनुमान की उपासना करने वाले करोड़ों भारतीय — जिनमें दलित, आदिवासी, पिछड़े, और सवर्ण सभी शामिल हैं — वे किसी 'slave' की पूजा नहीं कर रहे। वे उस आदर्श की पूजा कर रहे हैं जो शक्ति, समर्पण, बुद्धि और सेवा का संयोग है।
तो दया पवार जैसों की अभिव्यक्ति के संदर्भ को क्या केवल बौद्धिक असहमति की तरह देखा जाये और इसके पीछे के सुनियोजित राजनीतिक एजेंडे की अनदेखी कर दी जाए।
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें यह देखना होगा कि ये अभिव्यक्तियाँ किसे लाभान्वित करती हैं। भारत में दलित-सवर्ण विभाजन को, हिन्दू-मुस्लिम विभाजन को, और सामान्यतः हिन्दू सामाजिक एकता को तोड़ने में किसका हित है?
जब हनुमान — जो जाति-निरपेक्ष हैं, जिन्हें रामनामी समाज से लेकर मेहनतकश मज़दूर वर्ग तक सभी पूजता है — को 'caste oppression का symbol बताया जाता है, तो इस कथन का सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं दलित-पिछड़े समुदायों को होता है जो शताब्दियों से हनुमान को अपना इष्टदेव मानते आए हैं। महाराष्ट्र में, राजस्थान में, छत्तीसगढ़ में — हनुमान की उपासना किसी एक जाति की संपत्ति नहीं रही।
इसलिए यह विमर्श दलितों को हनुमान से नहीं, बल्कि उस विशाल सांस्कृतिक धारा से अलग करता है जिसमें वे स्वाभाविक रूप से शामिल थे। यह alienation किसका काम आता है? उन शक्तियों का जो भारत के विविध समुदायों को एकजुट नहीं, विभाजित देखना चाहती हैं।
अलगाव का सबसे सूक्ष्म रूप वह होता है जब आप किसी को उसके अपने घर से बाहर निकाल दें — उसे यह विश्वास दिलाकर कि वह घर उसका था ही नहीं।
इसका यह अर्थ नहीं कि दलित और पिछड़े समुदायों का प्रतिरोध अनुचित है। किन्तु यह प्रतिरोध उन प्रतीकों को निशाना बनाकर नहीं होना चाहिए जो स्वयं जाति-निरपेक्ष हैं, जो स्वयं शोषितों के इष्टदेव रहे हैं।
फुले और आम्बेडकर दोनों तक ने हनुमान का यह अपमान नहीं किया था।
यदि वास्तव में हनुमान की भक्ति में कोई ऐसा तत्त्व है जो दमन को वैधता देता है, तो उसे बताया जाना चाहिए — किन्तु उस तर्क के लिए अकादमिक परीक्षण की आवश्यकता है, एक mischief की नहीं।
यह 'mischief' कई रूपों में प्रकट होती है:
किसी प्रतीक को उसके सबसे सतही और शाब्दिक अर्थ में ग्रहण करना, और उसके समस्त रूपकात्मक, एलीगॉरिकल और दार्शनिक आयामों की अनदेखी करना-यह एक बौद्धिक बेईमानी है जो किसी भी परंपरा के साथ की जा सकती है।
औपनिवेशिक शत्रु-भाषा को अपनाकर उसी के ढाँचे में सोचना भी वही है जो postcolonial theory में 'internalized colonialism' कहलाता है।
जनसाधारण की आस्था अक्सर औपनिवेशिक दिमागों से अधिक शुद्ध और सहज होती है। उसे 'false consciousness' बताकर उसका अवमूल्यन करना एक और mischief है।यह एक नयी आभिजात्यवादी दृष्टि है जो लिबरेशन के नाम पर एक नई श्रेणी-व्यवस्था बनाती है।
भारत के विविध समुदायों के बीच — जो पहले से ही कई आधारों में तनावग्रस्त हैं — एक और विभाजन-रेखा खींचना mischief है। जब एक समुदाय को यह बताया जाए कि "यह देवता तुम्हारा नहीं, तुम्हारे शत्रु का है" — तो इससे किसकी मुक्ति होती है?
हनुमान एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जो भारत के हर कोने में, हर वर्ग में, हर भाषा में पूजे जाते हैं। उत्तर भारत के मज़दूर की कमर में हनुमान का यंत्र, दक्षिण के मंदिरों में आंजनेय की प्रतिमा, आदिवासी परम्पराओं में हनुमान की उपस्थिति — यह सब एक ऐसी सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है जो जातिवादी व्यवस्था के बावजूद, उसके विरुद्ध, निर्मित होती रही है।
इस एकता को तोड़ने का षड्यंत्र — चाहे वह औपनिवेशिक 'Monkey God' के रूप में आए, या आधुनिक 'We are not your monkeys' के रूप में — दोनों अंततः एक ही काम करते हैं: हनुमान को उनके भक्तों से, और भारत के एक समुदाय को दूसरे से, अलग करते हैं।
जब हम हनुमान के उस स्वरूप को समझते हैं जो शक्तिशाली है किन्तु विनम्र है, जो विद्वान है किन्तु सेवाभावी है, जो किसी जाति का नहीं बल्कि समस्त जीवों का है — तब हम जातिवाद के विरुद्ध उनसे ही सबसे बड़ी प्रेरणा ले सकते हैं।
भारत का भविष्य उसकी विविधता में एकता में है। इस एकता को रचने वाले प्रतीकों को नष्ट करना नहीं, उन्हें समझना और पुनर्जीवित करना होगा।
हनुमान भारतीय चेतना के ऐसे ही एक बहुआयामी प्रतीक हैं। वे केवल एक पौराणिक पात्र नहीं — वे एक दार्शनिक आदर्श हैं, एक योगी हैं, एक भक्त हैं, एक योद्धा हैं, एक विद्वान हैं। रामायण में उनकी उपस्थिति इतनी व्यापक और गहरी है कि वे राम की कथा के सह-नायक बन जाते हैं। व्याकरणाचार्य, संगीतज्ञ, अष्ट-सिद्धियों के स्वामी, चिरंजीवी — हनुमान का व्यक्तित्व किसी एकल वर्ग में नहीं समाता।
किसी संस्कृति के प्राणतत्त्व को नष्ट करने का सबसे प्रभावी मार्ग उसके प्रतीकों का अपहरण है। जब कोई समाज अपने सामूहिक अवचेतन, आस्था, और दार्शनिक बोध के संवाहक अपने प्रतीकों को किसी बाह्य या आंतरिक शक्ति द्वारा विकृत होते देखता है, तो यह केवल एक बौद्धिक असहमति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता पर सीधा आघात होता है।
हनुमान हमें बल, बुद्धि और विद्या दें कि हम ऐसी साज़िशों को फाश कर सकें।





