अंग्रेजी राज में अपने माता-पिता के साथ त्रिनिदाद गए एक बच्चे को यह बात खटकती थी कि त्रिनिदाद में कोई मंदिर नहीं है। उसके माता-पिता सहित हजारों भारतीयों को अंग्रेज वहाँ चीनी मिलों में मजदूर के रूप में काम करने के लिए ले गए थे। वहाँ अंग्रेजों के लिए चर्च तो थे मगर मंदिर नहीं था, जहाँ शिवदास भगवान की पूजन कर सके।
शिवदास ने त्रिनिदाद और टोबैगो के वाटरलू तट पर स्थित प्रसिद्ध "टेम्पल इन द सी" (Temple in the Sea) को अपनी अटूट श्रद्धा और वर्षों की मेहनत से बनाया। 1947 में उन्होंने सबसे पहले समुद्र किनारे एक छोटा शिव मंदिर बनाया था। वह ज़मीन एक निजी चीनी कंपनी की थी। कंपनी ने मंदिर हटाने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके कारण उन्हें 14 दिन की जेल और जुर्माना भी भुगतना पड़ा, तथा मंदिर तोड़ दिया गया।
जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि मंदिर समुद्र में बनाएँगे, क्योंकि उनका मानना था कि समुद्र किसी एक व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। वे प्रतिदिन अपनी साइकिल पर पत्थर, रेत और सीमेंट लाते थे। इन्हें समुद्र में डालकर धीरे-धीरे एक कृत्रिम आधार (छोटा द्वीप) और वहाँ तक पहुँचने का रास्ता तैयार किया। वर्षों की लगातार मेहनत के बाद उन्होंने समुद्र के बीच शिव मंदिर का निर्माण पूरा किया। साधु जी के निधन के बाद मंदिर जर्जर होने लगा। 1995 में स्थानीय हिंदू समुदाय ने इसका पुनर्निर्माण कराया, जो आज श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए एक प्रमुख धार्मिक स्थल है।
यह मंदिर आज त्रिनिदाद और टोबैगो में भारतीय मूल के लोगों की आस्था, संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।





