आज बड़ी बड़ी कंपनियों में अरसे से काम कर रहे टेक कर्मचारी अपने सिर पर तलवार लटकी देख रहे हैं , एक मोटे अनुमान के अनुसार आमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियों ने लाखों कमाने वाले हजारों लाखों कर्मचारियों को निकाल दिया है और कितने ही और कर्मचारी भय में जी रहे हैं कि क्या आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस जिसे संछेप में एआई कहा जाता है उनकी भी नौकरियां खा जाएगा?यही नहीं पिछले तीन सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब इंजीनियरिंग कालेजों में कैंपस भर्ती के लिए नहीं आ रही हैं , आई आई टी कभी अच्छे जॉब की शत प्रतिशत गारंटी माने जाते थे उनके यहाँ भी सारे पास आउट को नौकरियां नहीं मिल रही हैं।
जहाँ एक ओर ए आई को नौकरियों को खाने वाला विलेन माना जा रहा है वहीं हाल ही में एक ऐसी पुस्तक प्रकाशित हुई है जो आशा जगाती है कि ए आई का इस्तेमाल करके आप करोड़ों कमा सकते हैं . पुस्तक का नाम “आप भी करोड़ों कमा सकते हैं ए आई से “ इसके लेखक प्रदीप गुप्ता हैं . प्रदीप बहुमुखी प्रतिभा के धनी लेखक, कवि और संगीतकार हैं और ए आई के शैशव यानी मशीन लर्निंग से 2003 से स्टेट बैंक इंस्टिट्यूट ऑफ़ इनफार्मेशन एंड कम्युनिकेशन मैनेजमेंट हैदराबाद से जुड़े रहे हैं . उनकी यह पुस्तक आश्वस्त करती है कि अगर समझदारी से काम लिया जाए तो ए आई से पैसे भी कमाए जा सकते हैं .
इतिहास बताता है कि ए आई ही नहीं पहले भी समय समय पर औद्योगिक क्रांतियों ने नौकरियों को हिलाया है। भाप के इंजन का आविष्कार हुआ तो घोड़ागाड़ी वालों को बेरोज़गार हो गए . इंटरनेट ने हजारों प्रिंटिंग प्रेस और वीडियो रेंटल की दुकानों को बंद करवा दिया.अब एआई वही कर रहा है—लेकिन इसकी गति बहुत तेज है , और यह उथल पुथल बड़े पैमाने पर कर रहा है .
चारों तरफ़ होने वाले बदलाव को देखिए:
* लगभग सभी कंपनियों में कस्टमर सपोर्ट एजेंट्स की जगह अब चैटबॉट्स हैं, जो कभी सोते नहीं।
* जूनियर कॉपीराइटर, डिज़ाइनर और ट्रांसलेटर को एआई टूलसे रिप्लेस हो रहे हैं।
* फाइनेंशियल एनालिस्ट्स देख के हैरान हैं कि मशीनें उनसे तेज़ और सही डेटा एनालिसिस कर रही हैं।
* और यहाँ तक कि सॉफ़्टवेयर इंजीनियर भी देख रहे हैं कि एआई असिस्टेंट उनके लिए कोड लिख रहा है , टेस्टिंग और डिबग जैसे काम चुटकियों में कर रहा है।
यह सब साइंस-फिक्शन का पन्ना नहीं है—ये अभी और हमारे समय में ही हो रहा है।
गोल्डमैन सेच कंपनी की एक रिपोर्ट बताती है कि जल्दी ही दुनिया भर में 30 करोड़ नौकरियाँ एआई से प्रभावित हो सकती हैं.संदेश साफ़ है: एआई भविष्य में आपकी नौकरी के लिए नहीं आएगा—वो तो पहले से आपकी कुर्सी पर बैठ चुका है।
लेखक का कहना है एआई सिर्फ़ काम नहीं छीनता, यह पूरी इंडस्ट्री बदल देता है. कंपनियों को एआई पसंद है, क्योंकि यह लागत घटाता है। 500 लोगों की टीम का काम सिर्फ़ 50 लोग अधिक दक्षता से कर सकते हैं . एआई की वजह से एक सुपरस्टार वकील, क्रिएटर या कंसल्टेंट अनगिनत लोगों को क्वालिटी सेवा देने में सक्षम है। बाकी हजारों औसत काम करने वाले अप्रासंगिक हो जायेंगे .जिन कंपनियों के पास सबसे शक्तिशाली एआई सिस्टम हैं (जैसे OpenAI, Google, Baidu), वे पूरे के पूरे व्यवसाय सेक्टर्स पर कब्ज़ा कर सकती हैं. लेखक का यह भी कहना है कि एआई सिर्फ़ टेक्नोलॉजी नहीं है—ये भू-राजनीति को उलट पलट करने की क्षमता रखता है।आने वाले समय में ग्लोबल पावर शिफ्ट देखने को मिलेगी , जो देश ई आई की ताक़त का सही इस्तेमाल करेंगे वे देश आर्थिक और सैन्य ताकत में भी आगे होंगे। बाकी बहुत पीछे छूट सकते हैं।
सरकारों को भी सोचना होगा कि अगर करोड़ों लोग नौकरियाँ खो देंगे और उनके पुनर्वास के लिए कोई बेहतर सुरक्षा जाल नहीं होगा, तो विरोध, ध्रुवीकरण और राजनीतिक उग्रवाद बढ़ सकता है. इसलिए एआई सिर्फ़ नौकरियाँ नहीं हिला रहा, ये राजनीतिक भूकंप भी ला सकता है.और जो देश या जो नेता इस चुनौती को नज़रअंदाज़ करेंगे, उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.
लेकिन लेखक ने एक विरोधाभास की बात की है कि एआई काम छीनेगा भी और अगर आप तैयार हैं तो यह नए मौके भी देगा. उनके अनुसार सबसे ज़्यादा खतरे में नौकरियाँ रूटीन व्हाइट-कॉलर नौकरियाँ (डेटा एंट्री, अकाउंटिंग, बेसिक कोडिंग), ऐसे क्रिएटिव जॉब जिनमें ज़्यादा क्रिएटिव काम न हो और केवल दोहराव होता है इसमें साधारण डिज़ाइन, कॉपीराइटिंग, वीडियो एडिटिंग शामिल हैं , तथा कस्टमर सर्विस और कॉल सेंटर में काम करने वाले होंगे . लेकिन फ़िलहाल ई आई से सुरक्षित नौकरियाँ भी रहेंगी , ख़ासकर जहाँ गहरी मानवीय संवेदना ज़रूरी है जैसे कि नर्सिंग, टीचिंग, थेरेपी. और वे भी जहाँ फिजिकल स्किल जरूरी है और अनिश्चित माहौल है प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, शेफ के जॉब इसी श्रेणी में आते हैं. क्रिएटिव लीडरशिप, उद्यमशीलता और युक्तिरचना वाली भूमिकाओं को ए आई अभी हिला नहीं पाएगी .
लेखक के अनुसार आने वाले समय में असल विजेता वही होंगे जो एआई के साथ काम करना सीख लेंगे. एआई टोनी स्टार्क को रिप्लेस नहीं करता, बल्कि उसे आयरन मैन बना देता है।
इसलिए प्रदीप गुप्ता का कहना है कि एआई सीखें, डरें नहीं इसे दुश्मन नहीं, सहकर्मी मान कर चलें, प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, ऑटोमेशन, AI-आधारित क्रिएटिविटी सीखें. वो कौशल अपनाएँ जिसकी फिलहाल एआई कॉपी नहीं कर सकता है जैसे इमोशनल इंटेलिजेंस, लीडरशिप, स्टोरीटेलिंग, नेगोशिएशन.
लेखक का कहना है कि यह सच है कि एआई के कारण सैकड़ों हज़ारों नहीं करोड़ों नौकरियाँ ख़तरे में हैं लेकिन ये मानव सभ्यता के यात्रा में एक अनोखा मौका भी है—जहाँ हम काम, दौलत के मायने को फिर से परिभाषित कर सकते हैं।
ये “नौकरियों का अंत” नहीं है, ये नए तरह के काम की शुरुआत है. वो काम जहाँ आपकी क्रिएटिविटी, आपकी संवेदना और आपका विज़न मशीनों से और बड़ा बन जाएगा.
जो लोग बदलाव को अपनाएँगे, वे सिर्फ़ ज़िंदा नहीं रहेंगे—वे आगे बढ़ेंगे. और जो रुकेंगे, वो पीछे छूट जाएँगे।
मेरा सुझाव है कि बदलाव की आने वाली इस चुनौती से निबटने के लिए इस विचारोत्तेजक पुस्तक को पढ़ना चाहिए .

आप भी करोड़ों कमा सकते हैं : लेखक प्रदीप गुप्ता
प्रकाशक : अध्विक पब्लिकेशन , दिल्ली





