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अच्छा लिखना है तो खूब पढ़ो ……..

“अच्छा लिखना है तो खूब पढ़ने की आदत डालें। देखो कैसे हेडिंग हैं,केसे लिखा है और क्या सन्देश है। पढ़ने से भाषा शैलियों का पता चलेगा। बात को कहने का तरीका आएगा। जितना अधिक पढ़ोगे उतना ही लेखन सुधरेगा। पढ़ने को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लो।” कोटा के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार स्व. दुर्गा शंकर त्रिवेदी जी की का यह गुरुमंत्र मुझे उस समय मिला जब लेखन की शैशव अवस्था में था। सदैव उनकी याद बनी रहती है और उनका गुरुमंत्र आज भी मेरे लेखन का प्रमुखआधार हैं।

बात उन दिनों की है जब करीब 43 साल पहले मैंने कोटा में सहायक जन सम्पर्क अधिकारी के पर पर अपनी नौकरी शुरू कर जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव की शुरुआत की थी।लेख लिखता था और साईकिल चलाकर त्रिवेदी जी के पास जाता, उन्हें दिखता, जरा देखो गुरुजी कैसा बना है। वे देखते, कुछ कांट छाट करते और मुझे हेडिंग लगाने की कला समझते थे। यह क्रम काफी समय तक चलता रहा और मै सीखता रहा – लिखता। बाद में राजस्थान पत्रिका उन्हें जयपुर ले गई और वह रविवारीय परिशिष्ट का प्रभारी बन गए। मैं उन्हें रचना भेजता था। जो ठीक होती थी छाप कर मेराा हौसला बढ़ाते थे बाकी को सुधार के लिए रिमार्क लगा कर लौटा देते थे। निरन्तर उनका मार्ग दर्शन मिलता रहा और लेखन में दम आता रहा। उस समय कोटा के जन सम्पर्क अधिकारी श्री नटवर त्रिपाठी,स्व. श्री प्रेमजी प्रेम, स्व.श्री रामकुमार, श्री ओम प्रकाश, जितेंद्र गौड़, बाल मुकंद त्रिवेदी, घनश्याम वर्मा और फिरोज अहमद प्रमुख रूप से खूब लिखते थे। इनके छपे लेख पढ़ कर बहुत कुछ सीखने को मिला। हम आपस में अच्छे मित्र बन गए। एक दूसरे के लेखों पर चर्चाएं होने से भी बहुत कुछ सीखा।

मैंने न तो हिंदी साहित्य का कोई खास अध्ययन किया है न मै साहित्यकार हूं। जैसा सीखा, सुना, देखा,जाना,पढ़ा, समझा वही लिखता रहा। सहज,सरल और,सीधी भाषा। न कोई उपमा न अलंकार, न गूढ़ शब्दों का प्रयोग। लेखन की मेरी यात्रा की शुरुआत एक निराश्रित बालक से हुई बातचीत के आधार पर लिखे गए एक छोटे से लेख सेे हुुई। धीरे – धीरे आसपास के परिवेश और कुछ अन्य विषयों पर लिखने का प्रयास किया। खूब पढ़ने की आदत में छुपा त्रिवेदी जी का रहस्य स्मझ में आया जब मेरे लेख राजस्थान के अखबारों में छपने लगे। उस दौर के कोटा से प्रकाशित दैनिक जननायक,देश की धरती, कलम का अधिकार, धरती करे पुकार आदि अखबारों ने मेरे लेखों को प्रचुर स्थान दे कर न केवल मेरा उत्साह बढ़ाया वरन यह कहूं की आज लेखन में वे रीड की हड्डी का काम कर रहे हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

निरंतर अध्यन,खोजी प्रवृति,लेखन की रुचि की वजह से ही नोकरी की जरूरत के लिए विभिन्न विभागों के विकास सम्बन्धी लेख, सफलता की कहानियां, फीचर खूब लिखे, खूब छपे। कला – संस्कृति,पर्यटन,पुरातत्व, लोगों की जीवन शैली,पर्व, मेलों और पर्यावरण, बाल विवाह, सामूहिक विवाह, रक्तदान, सरक्षित परिवहन, आत्महत्या, नशामुक्ति आदि सामाजिक विषयों पर लिखना शुरू कर दिया। बालमन पर पर भी लिखने लगा। कई अन्य विविध विषय भी लेखन का आधार बने। मेरा उत्साह बढ़ता गया और लिखने की रफ्तार भी।

करीब दो दशक तक मेरे लेख कोटा के स्थानीय समाचार पत्रों के साथ – साथ, राज्य और राष्ट्रीय समाचार पत्रों में स्थान पाने लगे। राजस्थान पत्रिका, देनिक नवज्योति, राष्ट्रदूत, हिंदुस्तान समाचार, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, देनिक जागरण,वीर अर्जुन, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा जैसे समाचार पत्रों में सप्ताह में एक और कभी – कभी दो लेख छपने लगे। योजना मंत्रालय की पत्रिका ” योजना”, ग्रामीण विकास मंत्रालय की पत्रिका” कुरुक्षेत्र”, केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की पत्रिका ” समाज कल्याण”, भारतीय डाक तार विभाग की पत्रिका ” डाक तार”, परिवार कल्याण मंत्रालय की पत्रिका ” परिवार कल्याण”,भारतीय रेलवे की पत्रिका ” भारतीय रेल “, एयरलाइंस की पत्रिका ” स्वागत” आदि पत्रिकाओं में खूब लेख छपे। साथ ही बाज़ार में प्रचलित सरिता,
मुक्ता, गृहशोभा,कादम्बिनी, नवनीत, हिंदुस्तान साप्ताहिक, धर्मयुग, दिनमान, सहित बाल पत्रिका चंपक, सुमन सौरभ, नंदन,लोटपोट का भी लेखक बन गया। कुछ पत्रिकाओं में तो उनकी मांग के आधार पर भी लेखन किया।

लेखन की यात्रा निरन्तर जारी है। समाचार पत्रों की नीतियों में बदलाव हुआ। जैसा लिख रहा था उस शैली के लेख छपने कम हो गए। कुछ पत्रिका भी बन्द हो गई। विकास परक और विविध विषयों के लेख रिटायरमेंट तक निरन्तर अखबारों और जन सम्पर्क विभाग की पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे।

सेवा निवृत्ति के बाद कुछ नए अखबारों हनुमानगढ़ से प्रकाशित दैनिक इबादत, दिल्ली से अमर उजाला, जयपुर से सत्ताजगत,लखनऊ से ज्ञान ज्योति, कोलकाता से स्वतंत्र भारत, देहरादून से कलम का दायित्व, रांची से प्रभा साक्षी दैनिक,पटना से प्रभात खबर,यूएसए से प्रकाशित एक मात्र 70 पेज का साप्ताहिक ” हम हिन्दुस्तानी” सहित कोटा के स्थानीय अखबारों में मेरे लेख निरन्तर प्रकाशित हो रहे हैं। इसी बीच मुंबई,दिल्ली,लखनऊ,जयपुर और उदयपुर के राष्ट्रीय हिंंदी समाचार पोर्टल से जुड़ाव हुआ और इनमें कई वर्षो से नियमित रचनाएं प्रकाशित हो रही हैं।

नियमित पढ़ने के गुरुमंत्र की वजह से ही एक समय था जब मै दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं और बाल पत्रिका लोटपोट का नियमित लेखक रहा और आज कई समाचार पत्रों और पोर्टल के स्थाई लेखकों की उनकी सूची में शुमार नाम है।

लेखन की विधाओं से बढ़ कर यात्रा पुस्तक लेखन तक पहुंच गई। कहते हुए उत्साहित हूं कि अनगिनत लेखों के साथ करीब तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें जीवन की अमिट वैचारिक पूंजी है। वैचारिक पूंजी का प्रसार सतत जारी है।

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