जिन्हें आप एक प्रकाशक या संपादक की हैसियत से जानते हों। और अचानक पता चलता है कि सैकड़ों पुस्तकों को अपने हाथों से गुज़ारने वाले उन हाथों की उँगलियों ने कविताएँ रच दी हैं, तो एक सुखद आश्चर्य हुआ। प्रकाशन के मैनेजमेंट से लेकर पन्नों की सेटिंग, ग्राफिक्स, कवर, लेखकों से माथाफोड़ी, प्रिंटर से दिल्ली, भोपाल बात करना, पार्सल मँगवाना- भेजना, इनके सारी बातों के बीच तितली के परों के समान कोमल अनुभूति अंकुरित हो जाना, किसी परीकथा जैसा ही लगा था। शहरयार की कविता की पुस्तक आई है, यह जानकर ऐसा ही महसूस हुआ। इसलिए कविताएँ पढ़ने की उत्सुकता और बढ़ गई थी। और जब पुस्तक हाथ में आई तो शहरयार की कविताओं से गुज़रना मुझे ऐसा लगा जैसे किसी अँधेरी सुरंग के मुहाने पर दूर रोशनी दिखाई दे रही हो, और धीरे-धीरे पूरा उजाला फैल गया हो। ये कविताएँ बिल्कुल वैसी ही हैं।
शुरुआत प्रेम से होती है और प्रेम तो वैसी ही इतनी ख़ूबसूरत अनुभूति है कि सारी दुनिया प्रेममय लगने लगती है। जब कविताओं में प्रेम आता है, तो लगता है कि कविता 'शृंगारित' हो गई है। उसे आभूषण पहना दिए गए हों। जब मैं इन कविताओं से गुज़रने लगी, तो किसी पुरुष लेखक द्वारा आभूषणों और सुंदरता के बारे में इस तरह बात करना बड़ा सुखद लगा। जब वे रेहड़ी पर टँगे झुमके की बात करते हैं, तो उन्हें वे चाँद-सूरज जैसे लगते हैं, जिनकी कीमत सिर्फ 25 रुपये है, लेकिन देखते ही देखते वे हज़ारों-करोड़ों के हो जाते हैं। जब वे हरी चूड़ियों पर सुनहरे काम की बात करते हैं, तो लगता है कि कवि के हृदय में कितनी सूक्ष्म दृष्टि है। वे गहनों को कविता की तरह रच देते हैं। जब वे पायल, गालों को छूती नथ, झुमके, चूड़ियों की बात करते हैं। देखिए किस तरह- खन खन हरी काँच की चूड़ियाँ / बस दो या तीन ज़्यादा नहीं। ये चमकती नहीं / ये भड़कीली नहीं / एक गहरा, शांत हरा रंग / जैसे मानसून के बाद की पत्तियाँ / और उन पर बहुत महीन सुनहरा वर्क / जैसे सूरज की पहली किरण किसी पत्ती पर ठहर गई हो।
या- रेहड़ी पर टँगा वह झुमका / ना बहुत बड़ा ना बहुत छोटा / बस तुम्हारी साँवली गर्दन को नापता हुआ / तुम्हारे कानों में वह जब झूलता / तो लगता जैसे सूरज और चाँद मिले हों / जब वह तुम्हारे कान से टकराता / तो एक धीमी सी धुन निकलती थी / वह धुन हमारे इश्क का सबसे महँगा संगीत थी।
इसी ख़ूबसूरती से जब वे गुलमोहर की शर्म और नाक के नीचे काले तिल की बात करते हैं, तो लगता है कि उन्होंने इत्र की शीशी का ढक्कन खोल दिया है और ख़ुशबू चारों ओर महकने लगी है। और तो और दाँत पर चढ़े हुए दाँत, यानी नुक्स वाला दाँत भी इतनी ख़ूबसूरती का पैमाना हो सकता है कि उस पर कविता ही रच दी जाए, फिर तो उस कवि की क्या ही बात है। बानगी देखिए- उन दाँतों के बीच एक तरफ चढ़ा हुआ वह "छड़ा" दाँत, जैसे किसी मँझे हुए कलाकार ने ख़ूबसूरती में एक छोटा सा नुक्स छोड़ दिया हो, ताकि नज़र ना लगे- वह दाँत हँसी के साथ जब नुमाया होता है / तो चेहरे पर एक अलग ही शरारत भर देता है / मैं अक्सर सोचता हूँ / अगर उसके दाँत बिल्कुल सीधे होते / तो शायद वह इतनी "अपनी" ना लगती। यह इसलिए भी सुखद लगता है क्योंकि मैं उस नायिका को जानती हूँ। जब दांपत्य में आप रचे-बसे हों और ऐसी कविताएँ निकलें, तो यह साबित करता है कि दांपत्य में प्रेम का रंग और गाढ़ा हो चला है। और आने वाले दिनों में दूर तक इसका रंग और गहरा होने वाला है।
भूले बिसरे प्रेम या खिलंदड़े दिनों के प्रेम की कविताएँ अद्भुत है। ये कविताएँ कवि के प्रति एक सम्मान पैदा कर देती है। "तुम्हारे सुख की ख़ातिर" में पाठकों का दिल भी बैठ जाता है जब वे कहते हैं- हम साथ थे पर जानते थे यह आख़िरी पड़ाव है / जब मैंने तुम्हें छोड़कर जाने के लिए क़दम उठाया तो वह पहला प्यार था मेरा / जिसके लिए मैं सचमुच रोया / दुल्हन के जोड़े में मैं तुम्हें देख लेता / तो सारे त्याग टूट जाते / और मैं उस दरवाज़े पर खड़ा रहकर / तुम्हारे नए जीवन को अधूरा नहीं करना चाहता था। यह बहुत सुंदर कविता है जो निस्वार्थ प्रेम की कहानी कहती है। शीर्षक कविता "एक पुराना मौसम लौटा" गुलज़ार साहब की ग़ज़ल के मिसरे की तरह यादों की पुरवाई में लिए जाती है।
शहरयार की कविताओं में प्रेम के साथ-साथ दोस्ती का रंग भी बहुत अपना सा लगता है। जब 'पढ़ाकू' या 'जेंटलमैन' जैसे खिताब वाले दोस्तों की याद आती है, जब वे शरीफ़ से दिखने वाले 'सरदार' की बात करते हैं या 'अंताक्षरी वाले बेईमान सुल्तान' की, या 'हम पाँच और हमारी उलझी दोस्ती' की। दोस्ती का रिश्ता सचमुच बहुत अलग होता है। बिना रक्त संबंध और किसी भी धागे या गाँठ के बिना बँधा रिश्ता। ऊँचे-नीचे पथरीले रास्तों पर चलने वाली दोस्ती की मज़बूती ही अलग होती है। दोस्तों के साथ चीटिंग करना, पाला बदलना और ख़ुराफाती शक्लें- बचपन का यह दौर बहुत अलग होता है।
उनकी एक और कविता आत्मा को छू लेती है- 'एक लिबास, एक रूह'। आज जब नफ़रतों का दौर देखते हैं, तो ऐसी कविता सुकून देती है। ऐसा सुकून, मानो किसी ने जलती आँखों पर रुई के ठंडे फाहे रख दिए हों । वे स्वयं को वहाँ रखते हैं, जहाँ वे भीड़ में अपनी पहचान के कारण अलग दिखते थे। उन्हें डर था कि उनका यह लिबास दिलों के बीच दीवार न खड़ी कर दे। लेकिन वे उन कंधों का शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने उन्हें अलग होने का एहसास नहीं होने दिया। यहाँ उनकी भाषा दिल को छू लेने वाली है। वे कहते हैं कि उनके दोस्तों और अपनों ने उन्हें वैसे ही अपनाया जैसे समंदर लहरों को अपनाता है। बिना यह पूछे कि वे किस किनारे से आई हैं। इसीलिए इन नेक दुआओं को ही वे अपनी असली कमाई मानते हैं। आज के समय में यह कविता बहुत सार्थक है।
संग्रह की आख़िरी तीन-चार कविताएँ शायद आज के शहरयार का 'होना' हैं। वे कविताएँ एक लेखक और प्रकाशक से बढ़कर एक ऐसी शख्सियत को समर्पित हैं, जिसने शहरयार का भविष्य गढ़ा। शहरयार ने बहुत ईमानदारी से उस सम्मान को अपनी कविताओं में प्रस्तुत किया है। सम्मान उनके लिए जिनकी छत्रछाया में शहरयार ने स्वयं को महफ़ूज़ पाया। यह वह वटवृक्ष है जिसकी छाया में नन्हें पौधे भी मज़बूती से पनपते हैं और वृक्ष बनते हैं।
पंकज सुबीर को समर्पित यह कविताएँ सर्वश्रेष्ठ हैं। उनकी ये कविताएँ इसलिए भी अच्छी लगती हैं क्योंकि उनमें 'खांटी' शब्द हैं। मालवा में बिगड़ैल लड़के को 'ढोर' कहा जाता है। शहरयार ने इस शब्द का प्रयोग अपनी कविता में किया है। वे पंकज जी के लिए लिखते हैं- "मेरा दिल जानता है कि आप वह दरख़्त हैं जिसकी छाँव में एक ढोर लड़का आज इंसान बन गया।" इसी तरह तीन पीढ़ियों के विश्वास का अनकहा रिश्ता और 'शिवना' की मेहनत- यह 'अभाव से आसमान तक' की यात्रा है। इन सभी कविताओं में शहरयार ने एक ऐसे व्यक्तित्व को केंद्र में रखा है जो उनकी ज़िंदगी में सब कुछ है। मुझे लगता है कि इसी तरह कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। कृतज्ञता दरअसल हमारी पुरातन परंपरा है और यदि यह क़ायम रहे, तो इससे अच्छा साहित्य और क्या होगा।
मैं शहरयार के प्रथम काव्य संग्रह के लिए उन्हें बहुत बधाई देती हूँ। यह तो अभी यात्रा का आरंभ है और मुझे लगता है कि मंज़िल पर पहुँचने के बजाय यह यात्रा जारी रहे, इससे अच्छी बात और कोई नहीं हो सकती। तो प्रेम के आरंभ से होती हुई, अपनों के प्रति सम्मान ज्ञापित करती चल रही यह यात्रा निर्बाध जारी रहे, यही शुभकामनाएँ।
किताब : एक पुराना मौसम लौटा (कविता संग्रह)
रचनाकार : शहरयार
कीमत : 150 रुपए
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट,
ईमेल- shivna.prakashan@gmail.com
प्रकाशन वर्ष- 2026

समीक्षा
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