भारतीय ज्ञान-परंपरा में महर्षि भारद्वाज का नाम यंत्र-विज्ञान और वैमानिक शास्त्र के संदर्भ में प्रायः लिया जाता है। उनसे संबद्ध एक कम चर्चित ग्रंथ ‘अंशुबोधिनी’ अथवा ‘अंशु बोधिनी’ भी है। ‘अंशु’ का सामान्य अर्थ किरण या प्रकाश-किरण और ‘बोधिनी’ का अर्थ ज्ञान कराने वाली है; इस आधार पर इसके नाम का भावार्थ किरणों या प्रकाश का ज्ञान समझा जा सकता है। इस ग्रंथ के बारे में आधुनिक लेखों में बताया गया है कि इसका संपादन पंडित सुब्बराय शास्त्री ने किया था और इसका एक मुद्रित संस्करण 1931 में प्रकाशित हुआ। अशोक नेने के प्राचीन भारतीय विज्ञान पर लेख में भी इस ग्रंथ का उल्लेख है। हालांकि, इसकी रचना का वास्तविक प्राचीन काल, मूल पांडुलिपि की प्रामाणिकता और महर्षि भारद्वाज से इसका ऐतिहासिक संबंध अभी सावधानीपूर्वक जाँच की माँग करते हैं।
महर्षि भारद्वाज के नाम से संबद्ध अंशुबोधिनी भारतीय ज्ञान-परंपरा के उन ग्रंथों में गिनी जाती है जिनके बारे में अभी और व्यवस्थित शोध की आवश्यकता है। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह प्रकाश, दर्पण, क्रिस्टल और सौर ऊर्जा जैसे विषयों के साथ प्राचीन भारतीय तकनीकी विचारों की संभावनाओं पर प्रश्न उठाती है। इसके प्रति उचित दृष्टिकोण न तो इसे बिना जाँच आधुनिक विज्ञान से हजारों वर्ष आगे घोषित करना है, न ही अध्ययन किए बिना खारिज करना। मूल पाठ का सत्यापन, ऐतिहासिक काल-निर्धारण और प्रयोगों से जाँच ही यह स्पष्ट कर सकते हैं कि इसमें कौन-से विचार व्यावहारिक वैज्ञानिक ज्ञान हैं, कौन-से दार्शनिक सिद्धांत हैं और किन दावों की अभी पुष्टि होना बाकी है।
ग्रंथ में किन विषयों का वर्णन बताया गया है?
डॉ. ए. एस. नेने के संकलन Science and Technology in Ancient India में प्रकाशित परिचय के अनुसार, अंशुबोधिनी में क्रिस्टल, दर्पण, काँच, सूर्य-ऊर्जा और प्रकाश के गुणों से संबंधित विषय बताए गए हैं। इसमें 50 सूत्र होने का उल्लेख भी मिलता है। विशेष रूप से आठवें सूत्र में काँच, प्रिज्म और दर्पण बनाने में प्रयुक्त पदार्थों तथा सत्रहवें सूत्र में ‘छायाप्रकाशमापक यंत्र’ अथवा ‘ध्वान्तप्रमापक यंत्र’ के वर्णन की चर्चा की गई है। पुस्तक के परिचय में चौबीसवें सूत्र को भी महत्त्वपूर्ण बताया गया है, जिसमें पदार्थों और पंचमहाभूतों से संबंधित अवधारणाओं का उल्लेख बताया गया है। ये विवरण आधुनिक पाठकों के लिए आकर्षक हैं, लेकिन ध्यान रहे कि ये उपलब्ध ग्रंथ के आधुनिक परिचय में किए गए दावे हैं; इन्हें अपने-आप में प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
क्या इसमें आधुनिक स्पेक्ट्रोमीटर का वर्णन है?
इस ग्रंथ को लेकर सबसे रोचक दावा प्रकाश के विश्लेषण से संबंधित उपकरण का है। डॉ. नेने के संकलन में एन. जी. डोंगरे के 1994 और 1998 के शोधपत्रों का संदर्भ दिया गया है। इनमें ‘ध्वान्तप्रमापक यंत्र’ और स्पेक्ट्रोस्कोपी के संभावित संबंध की चर्चा बताई गई है। आधुनिक विज्ञान में स्पेक्ट्रोमीटर ऐसा उपकरण है जो प्रकाश को उसकी तरंगदैर्घ्य या आवृत्ति के अनुसार विश्लेषित करने में सहायता करता है। सूर्य से आने वाले प्रकाश का अध्ययन करके पदार्थों के गुणों की जानकारी प्राप्त करना स्पेक्ट्रोस्कोपी का महत्त्वपूर्ण उपयोग है। इसलिए यदि अंशुबोधिनी के वर्णनों में सचमुच प्रकाश-विभाजन और मापन की कोई व्यावहारिक विधि मिलती है, तो उसका संस्कृत पाठ, उपकरण की रचना और प्रयोगात्मक परिणामों के आधार पर परीक्षण करना उपयोगी होगा। लेकिन यह कहना कि ग्रंथ में वर्णित यंत्र आधुनिक स्पेक्ट्रोमीटर के समान ही था, उपलब्ध संदर्भों से स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं होता।
वैज्ञानिक दृष्टि से इसका महत्त्व
अंशुबोधिनी का अध्ययन दो स्तरों पर किया जाना चाहिए। पहले स्तर पर यह भारतीय पारंपरिक तकनीकी साहित्य, पदार्थों के वर्गीकरण और प्रकाश संबंधी विचारों के इतिहास का एक संभावित स्रोत है। दूसरे स्तर पर इसके सूत्रों को आधुनिक भौतिकी और पदार्थ-विज्ञान के संदर्भ में जाँचा जा सकता है—जैसे काँच और क्रिस्टल की संरचना, प्रकाश का परावर्तन एवं अपवर्तन, विभिन्न पदार्थों से प्रकाश का गुजरना और सौर ऊर्जा का उपयोग। इसके लिए मूल संस्कृत पांडुलिपि, पाठांतर, विश्वसनीय अनुवाद, उपकरण के निर्माण का विवरण और दोहराए जा सकने वाले प्रयोग आवश्यक हैं। स्वयं नेने के लेख का निष्कर्ष भी उपलब्ध सामग्री की पुष्टि के लिए और शोध की आवश्यकता स्वीकार करता है।
स्त्रोतः
अशोक नेने, Science and Technology in Ancient India — ऑनलाइन पुस्तक, विशेषकर “Introduction to Amshubodhini Shastra”।
एन. जी. डोंगरे, “Dhvantapramapaka Yantra of Maharshi Bharadwaja,” Indian Journal of History of Science, 1994, खंड 29(4), पृष्ठ 611–627 — इसका संदर्भ ऊपर दिए गए संकलन में है।
वी. के. डिडोलकर, “Infrared transparent glass ceramic as per ancient Indian text ‘Amshubodhini’,” Journal of Bharatiya Boudhik Sampada, मई 2012, पृष्ठ 28–32 — इसका संदर्भ भी उसी संकलन में दिया गया है।





