सत्यार्थ-प्रकाशादि ग्रन्थों में शिक्षा एवं पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में यद्यपि महर्षि ने बहुत कुछ लिखा किन्तु वे स्त्री शिक्षा के सम्बन्ध में पृथक् एक पुस्तक लिखना चाहते थे यह उनके जीवन चरित्र के अध्ययन से पता चलता है। देश का परम दुर्भाग्य था कि ऋषिवर स्त्री शिक्षा सम्बन्धी उस महत्त्वपूर्ण पुस्तक को लिख न सके और काल कवलित हो गये। वे नारी जाति के लिये क्या विशेष शिक्षायें देना चाहते थे शायद उसे सूक्ष्म रूप में उनके आर्योद्देश्यरत्नमाला जैसी छोटी पुस्तक से लेकर वेदभाष्य जैसे बृहत्काय महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों से समेटा जा सकता है। महर्षि के वेदभाष्य में उपमार्थक जो अर्थ हैं उन्हें देखने से कोई भी यह बोध कर सकता है कि स्वामी जी महाराज वेदार्थ के माध्यम से समग्ररूपेण स्त्री जाति के कर्त्तव्याकर्त्तव्य को कह देना चाहते हैं, चाहे वह अभिधार्थ से हो या उपमार्थ से। उदाहरणार्थ इस संक्षिप्त लेख में एक दो वेदार्थ प्रस्तुत हैं। मन्त्र है-
व्यञ्जिभिर्दिव आतास्वद्यौदप कृष्णां निर्णिजं देव्यावः ।
प्रबोधयन्त्यरुणेभिरश्वैरोषा याति सुयुजा रथेन ।। (ऋ०१।११३।१४)
इस मन्त्र में प्रातःकालीन वेला उषःकाल का वर्णन है किन्तु महर्षि दयानन्द वाचकलुप्तोपमालंकार कहकर मन्त्र का भावार्थ प्रस्तुत करते हैं-
"जैसे प्रातः समय की वेलां दिशाओं में व्याप्त है वैसे कन्या लोग विद्याओं में व्याप्त होवें वा जैसे यह उषा अपनी कान्तियों से शोभायमान होकर रमणीय स्वरूप से प्रकाशमान रहती है वैसे यह कन्याजन अपने शील आदि गुण और सुन्दर रूप से प्रकाशमान हों जैसे यह उषा अन्धकार का निवारण रूप प्रकाश को उत्पन्न करती है वैसे ये कन्या जन मूर्खता आदि का निवारण कर सुसभ्यतादि शुभगुणों से सदा प्रकाशित रहें।"
ऋषिवर के इन शब्दों में नारी के प्रति उमड़ती हुई यह भावना स्पष्ट सामने आती है कि पुत्रियों को विदुषी बनाना चाहिये और आडम्बरों तथा पाखण्डों को दूर करने के लिये कटिबद्ध होना चाहिये ।
एक अन्य मन्त्र पर ऋषिवर उपमार्थ से ही नारी की सामाजिक महत्ता का प्रतिपादन 'विश्ववारा' शब्द से जिसका अर्थ 'विश्व समस्त कल्याण का वरण करने वाली है' करते हैं अर्थात् उनका कहना है कि नारी की उत्कृष्ट स्थिति एवं सम्मान के बिना समाज एवं राष्ट्र की कोई स्थिति नहीं बन सकती है। सम्पूर्ण मन्त्र इस प्रकार है-
माता देवानामदितेरनीकं यज्ञस्य केतुबृहती विभाहि । प्रशस्तिकृद् ब्रह्मणे नो व्युच्छा तो जने जनय विश्ववारे ।।
(ऋ० १।११३/१९)
मन्त्र का भावार्थ ऋषि के शब्दों में निम्न है-
..........."स्त्री सम्बन्ध से उत्पन्न हुवे दुःख के तुल्य इस संसार में कुछ भी बड़ा कष्ट नहीं है उससे पुरुष सुलक्षणा स्त्री की परीक्षा करके पाणिग्रहण करे और स्त्री को भी योग्य है कि अतीव हृदय के प्रिय प्रशंसित रूप गुण वाले पुरुष का ही पाणिग्रहण करे ।"
अब ये स्त्री सम्बन्धी कष्ट स्त्री के विदुषी होने पर ही दूर हो सकते हैं अतः उनका पण्डिता बनकर विश्ववारा बनना परम आवश्यक है, यह यहाँ ऋषिवर का तात्पर्यार्थ है। पाठक देखें -कहाँ वेद की नारी के लिये यह पवित्र उक्ति और कहाँ भागवत पुराण जैसे भ्रष्ट ग्रन्थ जिनमें नारी को "नव नवमभीप्सन्त्यः पुंश्चल्यः स्वैरवृत्तयः" (भाग ० ९।१४।३८ । कहते हुवे पुंश्चली तक कह डाला है तथा स्वेच्छाचारिणी तक बना दिया है।
आदर्श पत्नी एवं कर्त्तव्यनिष्ठ माँ के स्वरूप पर भी वेदभाष्य के माध्यम से महर्षि दयानन्द ने अति उत्तम प्रकाश डाला है। उन मनोहारी वेदार्थों को मुग्ध-भाव से देखते ही बनता है। मैं कह सकती हूँ कि स्त्रीशिक्षा के सम्बन्ध में पृथक पुस्तक न लिख करके भी महर्षि दयानन्द ने हमें इतनी विपुल सामग्री प्रदान कर दी है कि जिसकी कोई तुलना नहीं। इन बिखरे सूत्रों को बटोर लेना हमारे लिये अमृतसम हो सकता है।
इस प्रकार विश्व महिला सम्मेलन हो या पारिवारिक गृहिणी की समस्या महर्षि दयानन्द का स्थान नारी जागरण के रूप में अद्वितीय एवं अतुलनीय है इसे समझकर भी न समझना अन्धकार से ही गुजरना होगा, क्योंकि उनसे पूर्व "नारी को वेद पढ़ने का पूर्ण अधिकार है" ऐसा स्पष्ट शंखनाद करके नारी के दकियानूसी से जकड़े बौद्धिकता के एक-२ तन्तुओं को खोलने का किसी ने प्रयास ही नहीं किया ।
जिस नारी की चीत्कार को हजारों वर्षों से बहरे श्रवणरन्ध्रों ने आज तक न सुना था और मनमाने वाक्य घड़कर उसे सभी अधिकारों से अपदस्थ ही नहीं किया था अपितु भीषण अत्याचार भी ढाया था उसे महर्षि दयानन्द ने सुना ही नहीं खूब गहराई से अनुभव किया और महर्षि दयानन्द को व्याकुलता से टहलते हुवे देखकर जब कुछ भक्तों ने विनयपूर्वक पूछा- महाराज ! आज क्या कोई वेदना है जो आप इस प्रकार व्याकुल हैं ?
ऋषिवर ने एक ही बात कही--
"विधवाओं के हृदय विदारक क्रन्दन एवं गोवध के जघन्य पाप से भी बढ़कर क्या कोई वेदना हो सकती है?" ऋषिवर के इन सब्दों में जो नारी के लिये गहरी करुणा छिपी है वह स्पष्ट है ।।
[स्रोत: उरूधारा नारी (नारी एक चिरन्तन सत्य स्वरूप) लेखिका: पूज्या आचार्या डा. प्रज्ञा देवी जी, पाणिनि कन्या महाविद्यालय, वाराणसी, पृष्ठ संख्या: 44-47, प्रस्तुति: रणवीर आर्य, हैदराबाद]





