भगवान बुद्ध ‘अत्त दीपो भव’ कहकर महाप्रयाण किये कि अपना दीप स्वयं बनो। किन्तु महावीर स्वामी दीपावली के दिन महाप्रयाण किये- दीपों की पंक्तियों के दिन।
क्या दोनों के महाप्रस्थान के इन तरीकों में कोई रूपक है? कि बुद्ध व्यक्ति चेतना पर बल दे रहे थे और महावीर इस विश्वास से परिचालित थे कि दीप की पंक्ति बनना आवश्यक है?
बुद्ध का महापरिनिर्वाण वैशाख पूर्णिमा को हुआ — पूर्ण प्रकाश की रात। इस रात उन्होंने कुशीनगर के साल-वन में शयन करते हुए, अपने प्रिय शिष्य आनन्द को संबोधित करते हुए कहा: "अत्त दीपो भव, अत्त सरणो, अनञ्ञ सरणो। धम्म दीपो, धम्म सरणो, अनञ्ञ सरणो।" — "अपना दीपक स्वयं बनो, अपनी शरण स्वयं बनो, किसी अन्य की शरण न लो। धर्म को दीपक बनाओ, धर्म की शरण लो।"
यह एक अत्यंत सुचिंतित उपदेश था — इसमें बुद्ध ने अपने जाने के बाद शिष्यों को किसी बाहरी सत्ता, यहाँ तक कि स्वयं तथागत पर भी निर्भर न रहने का निर्देश दिया। यह व्यक्ति की अपनी चेतना की सार्वभौमिक पर्याप्तता का उद्घोष था।
महावीर स्वामी का निर्वाण, इसके विपरीत, एक लौकिक उत्सव के बीच हुआ। पावापुरी में, कार्तिक कृष्ण अमावस्या को। परम्परा के अनुसार, जब महावीर ने देह त्यागी, उस रात्रि के अंधकार को दूर करने के लिए सोलह गणधरों सहित अनगिनत साधकों ने दीप प्रज्वलित किए। जैन परम्परा इसे 'निर्वाण लाड्डू' और 'दीपोत्सव' के रूप में मनाती है।
यहाँ पहला रूपक उभरता है: बुद्ध ने एकांत और आत्म-निर्भरता में प्रस्थान किया, महावीर ने समुदाय और उत्सव के बीच।
फिर 'अत्त दीपो भव' — व्यक्ति-चेतना का दर्शन बुद्ध का यह वाक्य बौद्ध दर्शन के मूल में जाता है। बौद्ध मत में अनात्मा का सिद्धान्त केन्द्रीय है — कोई स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा नहीं है। जो हम 'आत्मा' या 'अहं' समझते हैं, वह पाँच स्कन्धों का अस्थायी समुच्चय है: रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान।
इस अनात्मवाद में फिर 'दीपक' का रूपक क्या अर्थ रखता है?
यहाँ बुद्ध एक सूक्ष्म भेद कर रहे हैं। वे 'आत्मा' को प्रकाश-स्रोत नहीं कह रहे — वे चेतना की उस प्रक्रिया को प्रकाश-स्रोत बता रहे हैं जो प्रतिपल जागरूकता से आलोकित होती है। दीपक वस्तुतः एक क्रिया है, एक द्रव्य नहीं। दीपक जलता है — यह जलना प्रतिपल घटित होता है, ईंधन और वायु और ताप के सतत संयोग से। इसी तरह चेतना भी प्रतिपल उत्पन्न होती है — प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम से।अत्त दीपो भव में जो 'अत्त' है, वह 'अहंकार' नहीं, सम्यक् जागरूकता है।
यह उस व्यक्ति-चेतना का आह्वान है जो अष्टांगिक मार्ग पर चलकर अपनी मुक्ति स्वयं साधे। बुद्ध कह रहे हैं:, गुरु-भक्ति में मत बहो — अपने भीतर झाँको। संभवतः बुद्ध ने यह तब कहा होगा जब मृत्यु शय्या पर उन्हें देख उनके शिष्य रो रहे होंगे कि हम आपके बिना अब कैसे रहेंगे। खासकर आनंद नामक शिष्य।
यह एक आमूल व्यक्तिवादी (individualistic) दर्शन है — किन्तु 'व्यक्तिवाद' शब्द यहाँ पश्चिमी अर्थ में नहीं लेना चाहिए। बुद्ध का व्यक्ति वह है जो संसार की दौड़ से निकलकर, शांत होकर, अपने मन को देखता है। वह अकेला है — किन्तु इस एकान्त में उसकी सम्पूर्ण मुक्ति निहित है।
बुद्ध के संघ की अवधारणा भी इसी से जन्मी — संघ उन व्यक्तियों का एकत्र है जो अलग-अलग अपना दीपक जला रहे हैं। वे एक-दूसरे के लिए नहीं जलते — वे अपने-अपने लिए जलते हैं, और इस जलने से समग्र संघ आलोकित होता है।
महावीर का जैन दर्शन इस बिन्दु पर बुद्ध से मूलभूत रूप से भिन्न है। जैन मत में जीव नित्य और शाश्वत है। प्रत्येक आत्मा अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त आनन्द और अनन्त शक्ति से परिपूर्ण है — किन्तु कर्म के बन्धन से आवृत है। मोक्ष का अर्थ है इस आवरण को हटाना — और इसके लिए त्रिरत्न की साधना चाहिए: सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान, सम्यग् चारित्र।
महावीर का यह दर्शन व्यक्ति की मुक्ति को उतना ही महत्त्व देता है जितना बुद्ध का — किन्तु उस मुक्ति के सामाजिक आयाम में एक भिन्न संरचना है।
जैन परम्परा में चतुर्विध संघ — साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका — एक सुनियोजित समुदाय है जिसमें प्रत्येक स्तर का अपना धर्म है, अपनी जिम्मेदारी है। गृहस्थ साधक संन्यासी को आहार देता है; संन्यासी गृहस्थ को ज्ञान देता है। यह एक पारस्परिक प्रकाश की व्यवस्था है।
दीपावली की रात्रि इसी का प्रतीक है। जब महावीर ने निर्वाण लिया, तो उस रात जो दीप जले — वे एकाकी नहीं जले। वे पंक्ति में जले। दीपमाला — दीपों की श्रृंखला — जैन विचार में एक सूक्ष्म सामाजिक रूपक बन जाती है।
प्रत्येक दीप अलग है — उसकी लौ उसकी अपनी है। किन्तु वह पंक्ति में है। और पंक्ति में होने से उसका प्रकाश केवल उसका नहीं रहता — वह एक समग्र आलोक का अंश बन जाता है। एकाकी दीप बुझ सकता है — हवा के एक झोंके से। किन्तु दीपमाला का एक दीप बुझे तो भी पंक्ति जलती रहती है।
इन दोनों महाप्रस्थानों के रूपक को और गहरे समझने के लिए हमें उनके ब्रह्माण्ड-दृष्टि (cosmology) के भेद को देखना होगा।
बुद्ध की ब्रह्माण्ड-दृष्टि में शून्यता और अनित्यता केन्द्रीय है। कोई भी अस्तित्व स्थायी नहीं — सब कुछ परिवर्तनशील है। इस दृष्टि में, प्रत्येक प्राणी की मुक्ति उसकी अपनी यात्रा है। बोधिसत्व की परम्परा (जो बाद में महायान में विकसित हुई) इसमें एक परिष्कार है — किन्तु मूल थेरवाद में, मुक्ति एक व्यक्तिगत अनुभव है जिसे साझा नहीं किया जा सकता। तुम मेरे लिए नहीं जाग सकते — मुझे अपना जागरण स्वयं करना होगा।
यही कारण है कि बुद्ध का अन्तिम उपदेश एक व्यक्तिगत आज्ञा है — 'तुम' अपना दीपक बनो। यह बहुवचन में भी है, किन्तु प्रत्येक को अलग-अलग सम्बोधित करता है।
महावीर का ब्रह्माण्ड-दर्शन भिन्न है। जैन दर्शन में लोक की अवधारणा है — एक विराट, नित्य ब्रह्माण्ड जिसमें अनन्त जीव हैं, सब अपनी-अपनी मुक्ति की ओर जा रहे हैं। और अहिंसा — जो महावीर का केन्द्रीय सन्देश है — केवल व्यक्तिगत नैतिकता नहीं, एक ब्रह्माण्डीय संबंध-सूत्र है। मैं अहिंसा का पालन करता हूँ क्योंकि दूसरे जीव भी वैसे ही हैं जैसा मैं हूँ।
इस दृष्टि में, दीपावली की रात महावीर का निर्वाण केवल एक व्यक्ति की मुक्ति नहीं है — वह समस्त जीव-जगत के साथ एक सम्बन्ध का परिपाक है। और जो दीप जले उस रात, वे उन सब साधकों की श्रद्धा के प्रतीक हैं जो महावीर से प्रेरणा पाकर, अपने-अपने जीवन में, अपने-अपने तरीके से, मुक्ति की साधना कर रहे हैं।
आज के युग में जब व्यक्तिवाद और सामुदायिकता के बीच का तनाव वैश्विक विमर्श का केन्द्र है, ये दो रूपक और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
पश्चिमी उदारवादी परम्परा ने व्यक्ति को सर्वोच्च माना है — उसके अधिकार, उसकी स्वतन्त्रता, उसका विकास। इस दृष्टि में बुद्ध का 'एकल दीप' का रूपक अत्यंत समकालीन प्रतीत होता है। आत्म-निर्भरता, आत्म-साक्षात्कार, आत्म-विकास — ये सब उसी दिशा में हैं।
किन्तु जलवायु संकट, महामारी और सामाजिक असमानता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी व्यक्ति अकेले नहीं जी सकता — और अकेले नहीं जीत सकता। इस संकट में महावीर की दीपमाला का रूपक अधिक प्रासंगिक है। अहिंसा, जो न केवल व्यक्तिगत नैतिकता है बल्कि एक सामाजिक और पारिस्थितिक प्रतिबद्धता है — दीपों की वह पंक्ति जो मिलकर अंधेरे को दूर करती है।
बुद्ध और महावीर के महाप्रयाण के ये दो रूपक — एकल दीप और दीपमाला — परस्पर विरोधी नहीं हैं। वे एक ही सत्य के दो आयाम हैं।
कोई भी दीपमाला तब तक नहीं बन सकती जब तक प्रत्येक दीप अपने आप में पूर्ण न हो। महावीर की दीपमाला में भी प्रत्येक दीप अपनी लौ से जलता है — किसी दूसरे की लौ उधार लेकर नहीं। इस अर्थ में, बुद्ध का 'अत्त दीपो भव' महावीर की दीपमाला का पूर्वशर्त है।
और बुद्ध का एकल दीप भी कहाँ जलता है? संघ में — उन साधकों के बीच जो सब अपने-अपने दीप लेकर एक ही मार्ग पर चल रहे हैं। इस अर्थ में, बुद्ध के दीपक भी अन्ततः एक दीपमाला ही बनाते हैं।
भारतीय दर्शन की महानता यही है कि वह इस विरोधाभास को जीता है। व्यक्ति भी सत्य है, समुदाय भी सत्य है। एकांत में जागरण भी संभव है, सामूहिक साधना में भी। बुद्ध कह रहे हैं: पहले अपना दीप जलाओ। महावीर कह रहे हैं: फिर उसे पंक्ति में रखो।
और शायद यही वह संदेश है जो इन दो महान श्रमणों ने अपने अवसान के रूपक से हमें दिया — एक ने शब्दों में, दूसरे ने तिथि में।
(लेखक मध्यप्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)