मुंबई। कल्याण।
उसके पास था एक टूटा हुआ घर।

एक डेढ़ साल की बच्ची। और एक ऑटो।

जो किसी और ने चलाना सिखाया था।

सुबह के 6 बज कर 30 मिनट।

जब शहर अभी करवट बदल रहा होता है एक ऑटो सड़क पर निकल चुकी होती है।

ड्राइवर की सीट पर 25 साल की कोमल गायकवाड़।

और उनके बिल्कुल बगल में उनकी 3 साल की बेटी तेजस्वी।

लकड़ी से बनी एक छोटी सी स्पेशल सीट पर। नाश्ता पास में रखा है। आंखें अभी नींद से भरी हैं।

पर मां पूरी तरह जाग चुकी है।

कोमल महाराष्ट्र के परभणी की है।

10वीं के बाद पढ़ाई छूटी पैसे नहीं थे।

18 साल में शादी हुई। कल्याण आ गईं। 22 साल में मां बनीं।

और 23 साल की उम्र में
पति गांव गया। और लौटा नहीं।

तेजस्वी उस वक़्त डेढ़ साल की थी।

मेरे एक साथी पत्रकार ने जब कोमल से उसकी हिम्मत के बारे में पूछा था, तो उन्होंने कहा, 'उनके पास हार मानने का कोई विकल्प नहीं था।'

एक तरफ किराए का मकान। दूसरी तरफ बिना खाए गुजरते दिन। और बीच में एक नन्ही बच्ची जो मां का चेहरा देखती थी।

कोमल ने पहले सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी की।

पर तेजस्वी को छोड़कर कहां जातीं?

नौकरी छोड़नी पड़ी।

और तब उन्हें याद आया
पति ने एक बात सिखाई थी।
ऑटो चलाना।

इसलिए नहीं कि कोमल रोजी कमाएं।

बल्कि इसलिए कि जब वो घर पर न हों, तो कोमल बेटी को स्कूल छोड़ आए।

कोमल ने कहा, 'उस वक़्त मुझे नहीं पता था कि एक दिन यही हुनर मेरी रोजी-रोटी का एकमात्र ज़रिया बन जाएगा।'

जो इंसान छोड़ गया उसी के दिए हुनर ने जिंदगी दी।

जिंदगी की विडंबना देखिए।

कोमल ने ₹2 लाख का कर्ज लिया।

₹60,000 डाउन पेमेंट दिया।

एक नया ऑटो खरीदा।

और उसमें ड्राइवर सीट के बगल में एक छोटी सी लकड़ी की सीट बनवाई।
सिर्फ तेजस्वी के लिए।

ताकि मां काम करे और बेटी मां के पास रहे।

यह सीट कोई साधारण सीट नहीं है।

यह एक मां का वो फैसला है जिसमें उसने कहा :

'मैं दोनों काम करूंगी। मां भी। और कमाने वाली भी।'

कोमल का एक दिन..
सुबह 6:30 तेजस्वी का नाश्ता पैक करो। सीट पर बिठाओ। निकलो।
दोपहर तक सड़क पर।
घर आओ। खाना बनाओ।
शाम 4 बजे फिर निकलो।
रात 10 बजे तक।
16 घंटे। हर दिन। बिना छुट्टी।

और इन 16 घंटों के बाद कमाई?

रोजाना ₹400 से ₹500 रुपये की कमाई।
मकान किराया ₹2,500।

ऑटो की ईएमआई ₹6,500।

यह गणित कभी पूरा नहीं होता।

पर कोमल रुकती नहीं...

कोमल की चाहत भी अपनी बच्ची को आईपीएस अफसर बनाना है।
वह रात 10 बजे थककर घर आती हैं। तेजस्वी सो चुकी होती है।

और शायद बस एक पल उसे देखती हैं।

बस इसीलिए सुबह 6:30 पर फिर निकलने की हिम्मत मिलती है।

विज्ञान एक बात कहता है,
मां और बच्चे के बीच जो लगाव होता है वो दुनिया का सबसे पुराना अनुवांशिकी व प्राकृतिक बंधन है।

करोड़ों साल के मानव इवोल्यूशन में जिन मांओं ने अपने बच्चों के लिए सब कुछ दांव पर लगाया उन्हीं के बच्चे जीवित रहे। उन्हीं की नस्लें आगे बढ़ीं।

'मातृ सहनशीलता' मां की यह अटूट ताकत कोई नैतिक अच्छाई नहीं है।

यह जैविक है। यह अस्तित्व है। यह इवोन्यूशन की सबसे पुरानी ताकत है।

कोमल उसी ताकत का आज का रूप हैं।

और तेजस्वी का सपना?

कोमल ने एक संवाद माध्यम को बताया 'मेरा सपना है कि मेरी बेटी आईपीएस अफसर बने।'

वो बच्ची जो अभी ऑटो की उस छोटी सी सीट पर बैठती है

एक दिन उस कुर्सी पर बैठेगी जहां से शहर चलते हैं।

मां को यकीन है।

इसीलिए मां रुकती नहीं।

कोमल के लिए हर दिन मदर्स डे भी है। और स्ट्रगल डे भी।

क्या आपकी जिंदगी में कोई ऐसी मां है
जो चुपचाप लड़ रही है?
जिसे कोई नहीं देखता?
जिसकी तारीफ कोई नहीं करता?

आज उसे बस इतना बताइए कि आपने देखा है।

बस इतना काफी है।

कोमल को कल्याण में कुछ संस्थाओं और स्थानीय संगठनों ने ₹1 लाख की मदद दी है। तेजस्वी की पढ़ाई का खर्च उठाने का आश्वासन भी मिला है।

पर कोमल की असली जरूरत पैसे नहीं।

तेजस्वी का वो सपना पूरा होना है।

और उसके लिए मां हर सुबह 6:30 पर निकल पड़ती है।

साभार -सोशल मीडिया से
#KomalGaikwad #MothersDay2026 #SingleMother #MaaKiHimmat #WomenEmpowerment #Tejasvi #InspiringIndia