नेपाल से लौटा हूँ तो यह फर्क और नज़र आया है।
जिस कार्यक्रम में गया था वह युवाओं के द्वारा ही आयोजित किया गया था। आज के शब्दों में जेन जी़।
लेकिन उनकी भाषा और उनके संस्कार में सनातन इतना रचा बसा था। उनकी अपनी परम्पराओं के प्रति श्रद्धा देखते बनती थी।
तो भारत में यह भाषा की अश्लीलता और सनातन के प्रति यह निरादर और उपहास का भाव इसी उम्र के लड़के लड़कियों में कैसे आया है?
भारत की असफलता यह नहीं है कि उसने अपनी परम्परा का पश्चिमी या सोवियत व्याख्याओं से अवमूल्यन करने की खुली छूट दी बल्कि यह है कि अपनी परम्परा के निहितार्थ समझने की बुद्धि विकसित ही नहीं की।
यह बात नेपाल में महर्षि वात्स्यायन की गुफा देखकर समझ आई। उनकी रचना का कितना स्थूल अर्थान्वयन कर हमारे यहाँ काम चलाया गया। हमारे हाथ यही materiality लगी। वात्स्यायन की spirituality नेपाल ले गया। उस गुफा का वातावरण इतना शान्त और पवित्र है। वात्स्यायन के द्वारा स्थापित शिवलिंग वहाँ हैं। उस गुफा में प्रवेश करने वाला व्यक्ति सबसे पहले जिस अनुभूति से भर उठता है, वह किसी कामोत्तेजना की नहीं, बल्कि गहन शांति, मौन और तप की होती है। यह दृश्य स्वयं वात्स्यायन की सबसे बड़ी व्याख्या बन जाता है।
जिस ऋषि को आधुनिक संसार ने केवल शारीरिक पक्ष तक सीमित कर दिया, उसकी साधना-भूमि शिव की उपस्थिति, तप की निस्तब्धता और आत्मसंयम की सुगंध से भरी हुई है। मानो इतिहास स्वयं कह रहा हो कि हमने वात्स्यायन की पुस्तक पढ़ी, पर उनका आश्रम नहीं देखा; उनके सूत्रों की देह देखी, पर उनके जीवन की आत्मा नहीं देखी। वहाँ कोई चकाचौंध नहीं, कोई उत्तेजना नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं—केवल मौन, शीतलता, तप और एक ऐसी पवित्र उपस्थिति, जो भीतर की चंचलता को धीरे-धीरे विराम देने लगती है। उस वातावरण में बैठकर यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि इसी ऋषि को आधुनिक विश्व ने केवल शारीरिक आसनों का व्याख्याता मान लिया।
वास्तव में भारत की यही सबसे बड़ी त्रुटि है। उसने ग्रन्थ को उसके रचयिता से अलग कर दिया। उसने सूत्रों को पढ़ा, पर साधक को नहीं; उसने शब्दों को ग्रहण किया, पर मौन को नहीं; उसने शरीर को देखा, पर उस चेतना को नहीं, जहाँ से शरीर का विज्ञान जन्म लेता है। किसी दार्शनिक को समझने के लिए केवल उसकी पुस्तक पर्याप्त नहीं होती; उसकी तपोस्थली, उसकी उपासना, उसका मौन और उसका आध्यात्मिक क्षितिज भी उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनकी रचना में संवाद, सहमति, परस्पर सम्मान, सामाजिक उत्तरदायित्व, सौन्दर्यबोध, कला, संगीत, सुगन्ध, वस्त्र, विनोद, शिष्टाचार और भावनात्मक परिपक्वता पर उतना ही बल था जितना शारीरिक निकटता पर। इसका अर्थ यह था कि वात्स्यायन के लिए प्रेम एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक घटना थी।
रचयिता की तपस्थली देखने की सुविधा नेपाल को है। नेपाल की वह गुफा इसलिए केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं है; वह एक मौन प्रतिवाद है। वह उन सभी सतही धारणाओं का खंडन करती है जिन्होंने उनकी कृति को मात्र देह की पुस्तक बना दिया। उस कंदरा की निस्तब्धता कहती है कि किसी सभ्यता को उसके ग्रन्थों से नहीं, उसके ऋषियों से पढ़ो; और किसी ऋषि को उसके प्रसिद्ध अध्यायों से नहीं, उसके आराध्य से पहचानो। यदि वात्स्यायन के आराध्य शिव हैं, तो उनके सूत्रों की अंतिम व्याख्या भी शिवपरकता में ही खोजनी होगी।
इसलिए आज अश्लील बोर्ड लिए उन युवक युवतियों के पास उनकी कुंठा है जिनका विरेचन उनकी उस तरह की गालियों में हो रहा है। कुंठा हो, कुंठा का संस्कार न हो तो कुंठा का उपचार भी कैसे होगा।

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)




