" अप मृत्युहरं कालमृत्योश्चापि विनाशनम।
सध:कलत्र-पुत्रादि-धन-धान्य प्रदं द्विजा:।।"
लकड़ी के चौरंग या पाट के ऊपर शिबलिंग बनायें । पार्थिव शिवलिंग बनाने छानी हुई शुद्ध मिट्टी, गाय का गोबर, गुड़, मक्खन , शहद ,चन्दन और भस्म मिलाकर शिवलिंग का निर्माण करें। शिवलिंग की ऊँचाई 12 अंगुल से ज़्यादा नही होनी चाहिए ।
षोडशोपचार पूजा का सारी पूजा सामग्री एकत्र करें । आसन शुद्धि ओर देहशुद्धि आचमन करें और शिव पूजा का संकल्प करें । प्रथम गुरु , कुलदेवी , गणपति , भगवान विष्णु , पार्वतीजी का आह्वाहन करे और ध्यान करे । शिबलिंग पर हाथ से स्पर्श करें और शिवजी का आह्वाहन करें । भगवान शिव से विनती करे की वे इस शिवलिंग में अपना वास बनाये जिससे की आपकी विनती उन तक पहुँच सकें |
अब क्रमसे भगवान् का षोडशोपचार पूजन करे । ध्यान , आवाहन , आसन , चरण-हस्त-मुख प्रक्षाल , पंचामृत सहित विविध सुगंधित ओर पवीत्र जलसे अभिषेक , वस्त्र , जनेऊ , टिल्लक , पुष्प , धूप , दीप , प्रसाद , मुखवास , दक्षिणा , आरती , स्तुतिगान ओर क्षमापना । पूजा के बाद " ॐ ह्रीं नमः शिवाय " मंत्र की 5 माला जाप करे । आरोग्य केलिए महामृत्युंजय मंत्र भी कर सकते है । शिवगायत्री या रुदृपाठ भी कर सकते है । पूजा जाप पूरा होने के बाद हाथमे जल लेकर पूजा जाप मंत्र फल शिव प्रसंनार्थे शिवार्पण करे । अब भगवान शिवजी ओर आवाहित तमाम देवी देवताओं को ( गुरु गणपति ओर कुलदेवी के सिवाय बाकी सब देव ) यथा स्थान बिदा करे और शिवलिंग ओर सारा पूजा समान नदी या तलावमे विसर्जित कर । प्रति सोमवार या फिर प्रतिमास अमावस्या के दिन पार्थिव लिंग पूजा करे । 21 पूजा का ये व्रत है । व्रत के दिन एक समय भोजन करे और गाय , ब्राह्मण , भिक्षु को भोजन करवाये । पूर्वजन्मों के संचित कर्मो का भी नाश कर श्रेष्ठ फल देनेवाला ये यजन है ।
ऊपर दिए विधान में अगर कुछ समज न आये तो आप आपके सद्गुरु या कुलगोत्र के ब्राह्मण या फिर विद्वान कर्मकांडी ब्राह्मण देव से विधान समज लीजिये । पार्थिवलिंग निर्माण और पूजा के बाद ऊर्जामय विसर्जन की ये प्रक्रिया अति गोपनीय रहस्य है इसे यहा नही लिख सकते पर शिवपूजा का ये सर्वोत्तम प्रकार है , इस यजन के बाद जीवनमे कभी किसी भी प्रकार का कष्ट - समस्या नही आती । कभी कुछ मांगने की जरूरत ही नही रहती । भगवान शिव स्वयं अपनी प्रसन्नता से अकल्पत फल देते है । यथाशक्ति ओर मति अनुसार श्रेष्ठ से श्रेष्ठ पदार्थो से पूजा करे । पूर्ण श्रद्धा और भाव ही शिवकृपा के अधिकारी बनाता है ।




