पुस्तक परिचय
प्रस्तुत ग्रन्थ “फीजी का हिंदी वांगमय” डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा की चार दशक पूर्व की बृहत् योजना –‘हिंदी का अंतर राष्ट्रीय परिदृश्य’ का एक महत्वपूर्ण खंड है | ‘हिंदी का अंतर राष्ट्रीय परिदृश्य’ योजना का पहला खंड ‘हिंदी का प्रवासी साहित्य’ है | इस खंड की चार पुस्तकें -1. फ़ीजी का सृजनात्मक हिंदी साहित्य (2012) 2.सूरीनाम का सृजनात्मक हिंदी साहित्य (2015) 3. मारीशस का सृजनात्मक हिंदी साहित्य (2016), 4. प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य (2016) प्रकाशित हो चुकी है | प्रस्तुत पुस्तक “फीजी का हिंदी वांगमय” पहले खंड की पांचवीं और फ़ीजी की भाषा और साहित्य पर लिखी चौथी पुस्तक है | दूसरे खंड की पहली प्रकाशित पुस्तक थी – फ़ीजी में हिंदी: स्वरूप और विकास (2000) इस खंड की दूसरी पुस्तक सुश्री भावना सक्सेना की ‘सूरीनाम में हिन्दुस्तानी’ (2012) नाम से प्रकाशित हुई | अन्य पुस्तकों पर अनुसंधान कार्य चल रहा है| तीसरे खंड की पहली पुस्तक ‘सरनामी हिंदी– हिंदी का विश्व फलक (सह-लेखक, भावना सक्सेना, 2021) प्रकाशित हो चुकी है | इस श्रृंखला की दूसरी पुस्तक– ‘फ़ीजी हिंदी– हिंदी का विश्व फलक’ (सह-लेखक सुनंदा वर्मा 2023) का प्रकाशन केन्द्रीय हिंदी संस्थान (शिक्षा मंत्रालय) ने किया | प्रसन्नता का विषय है कि ये सभी पूर्व प्रकाशित पुस्तकें देश के प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने प्रकाशित कीं, विद्वत समाज में पर्याप्त चर्चित रहीं और विश्वविद्यालय के प्रवासी साहित्य के पाठ्यक्रम का अंग भी बनीं |
वरिष्ठ भाषावैज्ञानिक और प्रवासी भारतीय साहित्य के विशेषज्ञ डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा द्वारा संपादित और वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘फीजी का हिंदी वांग्मय’ प्रशांत महासागर की गोद में स्थित 300 से अधिक द्वीपों वाले देश फ़ीजी में बसे हुए प्रवासी भारतीयों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति की साहित्यिक मंजूषा है| फ़ीजी का, मानक हिंदी और फ़ीजी हिंदी में, पद्य और गद्य दोनों विधाओं में लिखित और प्रकाशित हिंदी रचनाओं का यह समेकित प्रामाणिक पहला बृहत् साहित्य संचयन(856 मुद्रित पृष्ठ) है| प्रस्तुत ग्रन्थ फीजी के लेखक समाज के विचारों, धारणाओं, दर्शन और दृष्टि का जहाँ अभिलेख है वहां फीजी के भारतीय समाज के स्वरूप को समझने में सहायक है| फीजी के भारतीय जन समाज के स्वरूप, भारत के प्रति उनके गहरे भावनात्मक सम्बन्ध, उनकी अनुभूति, नए अपनाए देश में संघर्ष और सुख दुःख के स्वरूप को समझने में अनुसंधाताओं के लिए यह ग्रन्थ दीप स्तम्भ सदृश होगा|
डॉ. विमलेश कान्ति वर्ष 1984-1987 तक फीजी के भारतीय उच्चायोग में वरिष्ठ राजनयिक के रूप में प्रथम सचिव (शिक्षा और हिंदी) के पद पर प्रतिनियुक्त थे जिसके कारण उन्हें फीजी के भारतीय जनसमाज के साथ लम्बे समय तक रहने और उनकी भाषा फ़ीजी हिंदी, उनके साहित्य तथा फ़ीजी के भारतीय समाज को समझने का अवसर मिला| फ़ीजी भूमि और उसकी संस्कृति से उनका जो परिचय वर्ष 1984 में हुआ वह आज विगत 40 वर्षों में और भी सुदृढ़ हुआ है जिसके कारण वे फीजी की भाषा, साहित्य और संस्कृति पर अनेक महत्वपूर्ण शोधपरक ग्रन्थ विद्वत समाज को दे सके |
‘फीजी का हिंदी वांग्मय’ पुस्तक फीजी के दिवंगत रचनाकारों को समर्पित है | डॉ. वर्मा लिखते हैं कि ‘अपने फ़ीजी प्रवास काल में (1984-1987) जिन हिंदी रचनाकारों, हिंदी सेवियों ने मेरे साथ अहर्निश फ़ीजी में हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए कार्य किया यथा कमला प्रसाद मिश्र, विजेंद्र सुधाकर, रामनारायण गोविन्द, महेश चन्द्र शर्मा ’विनोद’ ज्ञानी दास, जोगिन्दर सिंह कँवल, रामानारायण, महावीर मित्र, काशीराम कुमुद, बृज विलाश लाल आदि कितने ही कर्मठ भारत भक्तों और हिंदी सेवियों को, उनकी मधुर स्मृतियों को और उनकी प्रतिबद्ध हिंदी साधना को नमन करते हुए यह पुस्तक सादर समर्पित है ‘|
डॉ. वर्मा का मानना है कि जब हिंदी साहित्य के पुनर्लेखन का प्रश्न उठेगा उस समय फ़ीजी के प्रवासी भारतीयों के हिंदी अवदान पर विद्वानों का ध्यान जाएगा और हिंदी साहित्य लेखन में फीजी के हिन्दी के साहित्यिक अवदान पर अवश्य विचार होगा जो हिंदी के विश्व व्यापी स्वरूप को विश्व के सामने रखेगा और विश्वभाषा हिंदी की हमारी धारणा को पुष्ट कर सकेगा | फीजी के हिंदी रचनाकारों का यह बृहत् संकलन इस दिशा में एक विनम्र प्रयास है | उनका विश्वास है कि भविष्य में फीजी के हिंदी साहित्य पर अनुसंधान करने वाले शोधार्थियों के लिए ‘फीजी का हिंदी वांगमय’ एक आधार ग्रथ के रूप में उपयोगी हो सकेगा |
ग्रन्थ पर फीजी के तीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों- प्रोफ. सुब्रमनी, वरिष्ठ साहित्यकार तथा फीजी माँ व डउका पुराण के यशस्वी लेखक, प्रख्यात समाज सेवी तथा फीजी सरकार के भूतपूर्व उपप्रधान मंत्री पंडित हरीश शर्मा तथा विश्व हिन्दी सम्मान से सम्मानित साहित्यकार सुश्री सुनीता नारायण की सम्मतियाँ दी गई हैं जो पुस्तक की महत्ता को रेखांकित करती हैं | सम्मतियाँ अविकल रूप में दी जा रही हैं |
सम्मतियाँ
MILESTONE PUBLICATION FOR HINDI IN FIJI
Professor Vimlesh Kanti Verma is not only a staunch supporter of Hindi in Fiji, he is also a Hindi language activist who, through his research and publications, has done supreme service for the Hindi language. In addition, he has trained a cadre of student researchers and writers who will carry on his legacy. In this most recent book Fiji ka Hindi Vangmaya he has collaborated with co-editors Deepti Aggrawal and Sunanda Verma to produce a classic anthology that is a pleasure to read, and ought to be included in the Hindi language curriculum in Fiji, India and globally.
Subramani, Fiji Writer & Professor in English
To the best of my knowledge Dr. Vimlesh Kanti Verma is the only author who has done such comprehensive research and written so widely on Fiji's Hindi language and Hindi writers.
His latest book "Fiji ka Hindi Vangmaya" brings together prose and poetry from over 350+ Hindi writers in Fiji. The book will undoubtedly be warmly welcomed and well received by scholars.
Harish C. Sharma LLB, Sanatan Ratna, O.F. (Officer of the Order of Fiji)
Deputy Prime Minister in N.F.P./F.L.P. Coalition Govt, 1987
‘फीजी के हिंदी कहानी अउर कविता के ई संकलन हुआँ के लिए बहुत जरूरी है । इस में खली भाषा के विकास नई देखाए है लेकिन आगे के लेखन में सोच, फीजी हिंदी के विकास, हिस्ट्री, भावना अउर सपना के बेहतर ढंग से प्रकट करेके काबिलीयत बढ़ाए है।‘ सुनीता नारायण, ‘विश्व हिंदी सम्मान’ से सम्मानित फ़ीजी की हिंदी सेवी,
वर्त्तमान में न्यूज़ीलैंड में निवास
सम्पादक मंडल
सम्पादक
विमलेश कान्ति वर्मा देश के लब्धप्रतिष्ठ भाषावैज्ञानिक है और दिल्ली विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक हैं| वे देश में प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य के विशेषज्ञ के रूप में भी जाने जाते हैं | फ़ीजी में हिंदी-स्वरूप और विकास, फ़ीजी का सृजनात्मक हिंदी साहित्य, सूरीनाम का सृजनात्मक हिंदी साहित्य, मारीशस का सृजनात्मक हिंदी साहित्य, प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य, सरनामी हिंदी: हिंदी का विश्व फलक, फ़ीजी हिंदी: हिंदी का विश्व फलक, विश्व हिंदी के भगीरथ [प्रवासी हस्ताक्षर] उनके प्रकाशित शोधपरक ग्रन्थ हैं | डॉ. विमलेश कान्ति ने फ़ीजी के भारतीय उच्चायोग में वरिष्ठ राजनयिक के रूप में प्रथम सचिव (हिंदी और शिक्षा) के पद पर हिंदी की सेवा भी की है | हिंदी और शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें महापंडित राहुल सांकृत्यायन सम्मान, उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदी विदेश प्रसार सम्मान से सम्मानित किया हैं | बल्गारिया की सरकार ने भारत और बल्गारिया के सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उन्हें दो बार आपने राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया है |
सह-सम्पादक दीप्ति अग्रवाल ने अंग्रेज़ी, हिंदी और समाज कार्य में एम.ए.की उपाधियां प्राप्त की। ‘भारतीय डायस्पोरा, संस्कृति और हिंदी साहित्य(फीजी, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मारीशस और गयाना के सन्दर्भ) में’ विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उनकी रुचि कविता लेखन और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद में हैं। प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य पर उनके अनेक शोध लेख प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं|’कुली से कुलीन’ पुस्तक उनकी गिरमिटियों के जीवन पर लिखित कविताओं का प्रकाशित संग्रह है |
सुनंदा वर्मा सोफ़िया, बल्गारिया में जन्म; एम.ए. अंग्रेज़ी (दिल्ली विश्वविद्यालय),पत्रकारिता (आईआईएमसी, दिल्ली) वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा ज़ी न्यूज़,आजतक तथा स्टार न्यूज़ में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्य कर चुकी हैं | वे सिंगापुर में रहती हैं और संस्कृति, भाषा और समाज सम्बंधित विषयों पर हिंदी और अंग्रेज़ी में निरंतर लिखती हैं। वे अँग्रेज़ी से हिन्दी और हिंदी से अंग्रेज़ी में अनुवाद भी करती हैं। प्रवासी भारतीय साहित्य पर वे एक दशक से भी अधिक समय से अनुसंधान कर रही हैं। 'प्रवासी भारतीय हिंदी साहित्य', ‘फ़ीजी हिंदी: हिंदी का विश्व फलक’ और ‘विश्व हिंदी के भगीरथ [प्रवासी हस्ताक्षर]’ पुस्तकों की वह सह-संपादक हैं। सुनन्दा वर्मा ‘दक्षिण अफ़्रीका में हिन्दी: स्थिति और संभावनाएं’ विषय पर शोध कर रही हैं।
साभार- वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई से
“फीजी का हिंदी वाङ्मय”





