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नागाओँ का मजाक उड़ाने वाले पहले इतिहास भी पढ़ लें

कुंभ आये और नागा का जिक्र न हो यह कैसे हो सकता है? इधर कुछ सालों से सोशल मीडिया पर नागा साधुओं का मजाक उड़ाना एक नये तरह की प्रगतिशीलता बन गयी है और उन्हें नारी विरोधी के बतौर पेश क िया जाता है। भला हो पश्चिमी लोगों का जिन्होंने एक से एक तस्वीरें इंटरनेट पर उपलब्ध करा दी हैं। कोई एक तस्वीर उठाओ और नागाओं को गाली देते हुए धर्म को लतिया दो। क्या आप जानते हैं कि नागा कौन होते हैं और उनके बनने की प्रक्रिया क्या है?

कोई भी मुंह उठाकर नागा साधु नहीं बन सकता। इसकी एक प्रक्रिया है। ये वो लोग होते हैं जो समाज सेवा के जरिए मोक्षमार्ग की तरफ अग्रसर होते हैं। नागाओं की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी कि शायद धर्म। लेकिन पहली बार आदि शंकराचार्य ने इन्हें संगठित करके अखाड़ों में विभक्त किया। इन अखाड़ों के जरिए ही वे निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करते हैं।

अखाड़ों को क्षेत्र और मठों में विभक्त किया गया है जहां से नागा साधु खेती करते हैं और खेती से उपजे अन्न का समाज को दान करते हैं। इस दौरान वे सामान्य वेशभूषा में ही रहते हैं। जो पूरी तरह से दिगंबर अवस्था को प्राप्त कर गये हैं और सालभर बिना कपड़ों के रहते हैं वे सामान्य समाज के संपर्क में नहीं आते। वे मठों में सबसे सम्मानित होते हैं और पूरी मठ व्यवस्था इन्हीं दिगंबरों के आसपास रची जाती है।

रही बात कपड़े उतारने की तो यह नागा के जीवन में आखिरी अवस्था होती है। उसके पहले उसे संसार में सबसे अपने संबंधों को काटना होता है, फिर अपने शरीर और मन से संभोग की इंद्रिय और कामना दोनों को काटना होता है। क्रमिक रूप से इसमें बारह वर्ष का समय लगता है तब कहीं जाकर नागा होने की दीक्षा मिलती है।

किसी नंगे आदमी को देखकर हम बौखला जाते हैं क्योंकि हमारे अपने भीतर इतनी वासना भरी हुई है कि कुत्ते बिल्ली का संभोग भी देखकर आकर्षित हो जाते हैं। नागा साधु तो फिर भी सीधे सीधे हमारी कामना पर कुठाराघात करता है। वह नंगा नहीं है। नंगे हैं हम लोग जो एक बिना कपड़े के आदमी को देखकर नंगई पर उतर आते हैं। मन से वासना और शरीर से कपड़े उतारना इतना आसान नहीं है कि कोई भी नागा और दिगंबर हो जाएगा। उनका मजाक मत उड़ायिए। उनको प्रणाम करिए ताकि आपके भीतर की वासना नंगी न हो जाए।

साभार- संजय तिवारी के फेसबुक पेज से

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