आज समूचे राष्ट्र में भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता खंडित होती जा रही है। लोग अपनी पहचान विस्मृत कर रहे हैं। चारों तरफ देश की एकता एवं अखंडता की बात की जा रही है, किन्तु यह एकता और अखंडता केवल परिहास बनकर रह गई है। हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध रामकाव्य पर गहनता से विचार करना अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन होगा। प्रत्येक प्रदेश की संस्कृति एवं सभ्यता की धरोहर इन काव्य-ग्रंथों पर विचार करना निश्चित ही भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकसूत्रता का परिचायक है। अतः प्रमुख भारतीय भाषाओं एवं बोलियों का रामकाव्य इस प्रकार है—
रामायण और महाभारत भारतवर्ष की सामासिक संस्कृति के ग्रंथ हैं, जिनसे प्रेरित होकर भारतवर्ष के प्रत्येक प्रांत एवं अंचल में अपनी क्षेत्रीय भाषा में रामकथा पर काव्य रचे गए।
- तमिल-रामकाव्य:
तमिल भाषा का प्रदेश भी इसका प्रमाण है। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व तमिल में रचित ‘पुरनानूरु’ नामक कृति में रामचरित का उल्लेख मिलता है। ईसा की दूसरी शताब्दी में रामकथा संबंधी महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम्’ मिलता है। 8वीं शताब्दी में 12 आलवारों के भक्ति संबंधी पद ‘नालायिर प्रबन्धम्’ नामक ग्रंथ में प्रकाशित हुए।
इनमें से कुलशेखर आलवार ने अपने ग्रंथ ‘पेरुमाल तिरुमोली’ में बाल राम के प्रति माता कौशल्या के वात्सल्य एवं विरही दशरथ का चित्रण किया है। रामकथा संबंधी विधिवत महाकाव्य की सर्जना का श्रेय महाकवि कम्बन को जाता है। इनकी कृति ‘कम्ब रामायण’ (12वीं शताब्दी) ने तमिल साहित्य में क्रांति उपस्थित कर दी।
महाकवि कम्बन के समय तमिल प्रदेश में चोल राजाओं का राज्य था। इन धर्मवर्धक राजाओं के कारण तमिल प्रदेश धन-धान्य से परिपूर्ण था। यही कारण है कि उनकी रामायण में तमिल प्रदेश का प्राकृतिक वैभव एवं सामाजिक समृद्धि चित्रित हुई है।
- तेलुगु रामकाव्य:
तेलुगु साहित्य में रामकथा तो उसके प्रारंभ से ही उपलब्ध है, लेकिन रामकाव्यों में सर्वप्रथम गोन बुद्धा रेड्डी द्वारा रचित ‘रंगनाथ रामायण’ उपलब्ध है, जो तेरहवीं शताब्दी की रचना है। डॉ. परमलाल गुप्त ने इसका समय 1230 ई. स्वीकार किया है।
‘रंगनाथ रामायण’ ‘वाल्मीकि रामायण’ के बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक की घटनाओं का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करती है। ‘रामचरितमानस’ से लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व की यह रचना अत्यंत सरल, सुबोध एवं लोकप्रिय है। गाँवों एवं जनपदों में भी इसका गायन किया जाता था।
यद्यपि ‘रंगनाथ रामायण’ का समूचा कथानक ‘वाल्मीकि रामायण’ पर आधारित है, किन्तु इसमें कुछ मौलिक उद्भावनाएँ भी हैं।
इसके पश्चात तेलुगु रामकाव्य में ‘भास्कर रामायण’ प्रमुख है। दोनों का रचनाकाल लगभग समान है, किन्तु ‘रंगनाथ रामायण’ जनमानस को ध्यान में रखकर द्विपद नामक देसी छंद में लिखी गई, जबकि ‘भास्कर रामायण’ प्रौढ़, प्रांजल एवं परिमार्जित भाषा तथा विविध छंदों में रचित है।
15वीं–16वीं शताब्दी में आतुकूरि मोल्ल नामक कवयित्री द्वारा रचित ‘मोल्ल रामायण’ उपलब्ध होती है। इसके बाद काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ अय्यलराजु रामभद्रुडु ने ‘रामाभ्युदयम्’ नामक काव्यशास्त्रीय रामकथा लिखी।
- मलयालम रामकाव्य
रामकथा की अमृतधारा मलयालम भाषा में भी प्राचीनकाल से ही बहती आ रही है। तिरुवितांकुर के राजा श्री वीररामवर्मा द्वारा रचित 12वीं शताब्दी का ‘रामचरितम्’ सबसे प्राचीन एवं महत्वपूर्ण रामकाव्य ग्रंथ है। रामायण के युद्धकाण्ड की कथा को ही इस काव्य-ग्रंथ में विषय बनाया गया है। यह कृति मलयालम की प्रस्तुति काव्य-शैली ‘पाट्टु’ में लिखी गई है।
इसी परंपरा में दूसरी रचना पूनम नंपूतिरि कृत ‘रामायण चंपू’ उपलब्ध है। इस काव्य में रावण के उद्भव से लेकर राम के स्वर्गारोहण तक की कथा संस्कृत-मिश्रित मलयालम शैली में चित्रित हुई है। इसके अतिरिक्त पंद्रहवीं शताब्दी में कवि कण्णष पणिकर कृत ‘कण्णष रामायण’ मिलती है।
मलयालम की रामकाव्य परंपरा में सबसे प्रसिद्ध कृति एषुत्तच्छन कृत ‘अध्यात्म रामायणम्’ है। ‘रामचरितमानस’ की तरह यह रामायण भी मलयालम प्रदेश के लोगों में अत्यंत लोकप्रिय है। इसका रचनाकाल डॉ. मलिक मोहम्मद के अनुसार उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर सोलहवीं शताब्दी है। डॉ. कामिल बुल्के ने इसका रचनाकाल 1575 ई. से 1650 ई. के बीच माना है।
संस्कृत की ‘अध्यात्म रामायण’ इसका मूल स्रोत है। मलयालम ‘अध्यात्म रामायणम्’ का कथानक वाल्मीकि के अनुसार है, किन्तु इसका उत्तरकाण्ड भी प्रक्षिप्त माना जाता है। इसकी कथा रामावतार से आरंभ होती है, जिसमें अवतार-लीला पर विशेष जोर दिया गया है। यह रामकाव्य लगभग तुलसीकालीन है, यही कारण है कि इसमें युगीन परिवेश की छाप एवं ‘मानस’ का प्रभाव देखने को मिलता है।
- कन्नड़ रामकाव्य
कन्नड़ साहित्य में रामकथा की दो परंपराएँ विद्यमान हैं—एक जैन परंपरा और दूसरी जैनेतर परंपरा।
कन्नड़ जैन रामकाव्य परंपरा ‘पउमचरिउ’ के आधार पर चली। कन्नड़ साहित्य का सर्वप्रथम लक्षण-ग्रंथ ‘कविराजमार्ग’ जैन नरेश नृपतुंग द्वारा 850 ई. में रचित है, जिसमें यत्र-तत्र रामायण के उद्धरण मिलते हैं। जैन काव्य-परंपरा में प्रथम काव्य सन् 950 ई. में पोन्न कवि द्वारा रचित ‘भुवनैक रामाभ्युदय’ है।
दूसरी कृति सन् 971 ई. में लिखित चावुण्डाराय की ‘चावुण्डराय पुराण’ है। समूचे रामकथानक पर आधारित प्रथम कन्नड़ जैन रामकाव्य नागचंद्र कृत ‘परम्परामाण’ है, जिसका रचनाकाल लगभग ग्यारहवीं शताब्दी है।
तेरहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कुमुदेन्दु मुनिकृत ‘कुमुदेन्दु रामायण’ मिलती है, जिस पर नागचंद्र का प्रभाव है। कन्नड़ जैन रामकाव्यों में रामायण की कथावस्तु जैन धर्म के सिद्धांतों एवं दर्शन पर आधारित है।
- बंगला रामकाव्य
बंगला रामकाव्य का आरंभ ‘कृतिवासी रामायण’ से माना जाता है। इसका रचनाकाल पंद्रहवीं शताब्दी है। इसमें मूल कथा वाल्मीकि पर आधारित है। इसकी कथा राम के वनगमन से लेकर सीता के पृथ्वी में समा जाने तक चलती है।
डॉ. कामिल बुल्के ने राक्षसों की रामभक्ति से संबंधित अंशों को प्रक्षिप्त माना है। डॉ. रामनाथ त्रिपाठी ने ‘कृतिवासी रामायण’ के आधार स्रोत ‘आनंद रामायण’, ‘पद्मपुराण’, ‘जैमिनी भारत’, ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ एवं ‘अध्यात्म रामायण’ माने हैं।
इस रामायण में लोकप्रचलित कथानक, युगीन परिवेश तथा बंगाली संस्कृति से प्रभावित नवीन उद्भावनाएँ मिलती हैं। इसमें वर्णन की पांचाली शैली का प्रयोग किया गया है, जिसके कारण यह जनसाधारण में अत्यंत लोकप्रिय हुई।
आधुनिक युग (बीसवीं शताब्दी) में ‘कृतिवासी रामायण’ के पश्चात माइकेल मधुसूदन दत्त कृत ‘मेघनाद-वध’ महाकाव्य सबसे प्रसिद्ध रचना है। इससे पूर्व डॉ. कामिल बुल्के ने रघुनंदन गोस्वामी कृत ‘रामरसायन’ को साहित्यिक दृष्टि से श्रेष्ठ माना है।
‘मेघनाद-वध’ में कवि ने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक रूढ़ियों को तोड़कर एक नया आयाम प्रस्तुत किया है। राम-लक्ष्मण की अपेक्षा रावण और मेघनाद के चरित्र को अधिक महत्व देना कवि की संतुलित दृष्टि का परिचायक है।
- उड़िया रामकाव्य
उड़िया रामकाव्य में रामकथा के प्रथम कवि सारलादास माने जाते हैं और उनकी रचना ‘विलंका रामायण’ है। इसका रचनाकाल पंद्रहवीं शताब्दी माना जाता है। सारलादास का वास्तविक नाम सिद्धेश्वर परिडा था। उनकी इष्टदेवी सरला चंडी थी, इसलिए उन्होंने अपना नाम सारलादास रखा।
उनकी रामायण का आधार भी वाल्मीकि है, किन्तु कथानक संक्षिप्त है। पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अर्जुनदास कृत ‘रामविभा’ मिलती है, जिसमें पौराणिकता की अपेक्षा राग-रागिनियों का प्राधान्य है।
उड़िया में सबसे प्रसिद्ध रामकाव्य सोलहवीं शताब्दी में बलरामदास द्वारा रचित ‘दांडी रामायण’ है। इसके अन्य नाम ‘जगमोहन रामायण’ और ‘बलरामदास रामायण’ हैं।
- असमीया रामकाव्य
डॉ. कामिल बुल्के ने प्रादेशिक आर्य भाषाओं का प्राचीनतम रामसाहित्य असमीया, बंगला और उड़िया में सुरक्षित बताया है। कृत्तिवास एवं बलरामदास के समान असमीया साहित्य में भी माधवकंदली कृत ‘रामायण’ सबसे प्रमुख मानी जाती है। यह रचना चौदहवीं शताब्दी की है। इसका आधार भी वाल्मीकि है।
डॉ. कामिल बुल्के के अनुसार इसकी रचना तीन लब्धप्रतिष्ठ कवियों द्वारा की गई है। अयोध्या से युद्ध तक के पाँच काण्ड माधवकंदली ने लिखे, उत्तरकाण्ड शंकरदेव ने और आदिकाण्ड शंकरदेव के शिष्य माधवदेव ने लिखा।
माधवकंदली कृत पाँच काण्ड ‘वाल्मीकि रामायण’ के गौड़ीय पाठ पर आधारित हैं। शंकरदेव कृत उत्तरकाण्ड की कथा भी वाल्मीकि के अनुसार है। माधवदेव कृत बालकाण्ड ‘कृत्तिवासी बंगला रामायण’ पर आधारित है।
माधवकंदली ने अपनी रामायण के आरंभ में वाल्मीकि को आधार स्वीकार किया है। यह रामायण निःसंदेह असमीया संस्कृति का दर्पण है।
- मराठी रामकाव्य
हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्यकाल का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि तुलसीदास का आविर्भाव इसी काल में हुआ। मराठी साहित्य में भी एकनाथ का आविर्भाव लगभग सोलहवीं शताब्दी में हुआ। उनकी ‘भावार्थ रामायण’ 1596 ई. की रचना है।
एकनाथ के तीन मुख्य आधार हैं—‘वाल्मीकि रामायण’, ‘अध्यात्म रामायण’ एवं ‘आनंद रामायण’। डॉ. बुल्के के अनुसार ‘भावार्थ रामायण’ पर ‘आनंद रामायण’ की गहरी छाप है। इसके कुछ प्रसंग ‘पउमचरियम्’ से भी मिलते हैं।
इसका उत्तरकाण्ड वाल्मीकि के उत्तरकाण्ड के समान है। ‘भावार्थ रामायण’ में आध्यात्मिक विषयों के साथ-साथ सामयिक सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति पर भी व्यंग्य किए गए हैं।
1605 ई. में कृष्णदास मुद्गल कृत ‘रामायण’ मिलती है, जिसमें वीर रस प्रधान उक्तियाँ हैं। 1658 ई. में समर्थ रामदास की ‘द्विकाण्डात्मक रामायण’ में अकर्मण्यवादी हिंदुओं को प्रयत्नवाद की शिक्षा दी गई है।
- गुजराती रामकाव्य
गुजराती साहित्य में रामकथा की अपेक्षा कृष्णकथा को अधिक स्थान मिला है। फिर भी पंद्रहवीं शताब्दी से रामकाव्य की परंपरा मिलती है।
इस शताब्दी की प्रमुख रचनाएँ हैं—भालण कृत ‘रामबालचरित’ तथा ‘सीता-विवाह’। सोलहवीं शताब्दी में विष्णुदास कृत ‘रामायण’ एवं ‘उत्तरकाण्ड’ तथा कर्मण मंत्री कृत ‘सीताहरण’ मिलते हैं।
सत्रहवीं शताब्दी की रचनाओं में मधुसूदन कृत ‘युद्धकाण्ड’, श्रीधर कृत ‘रावण-मंदोदरी संवाद’, काशी-सुत राय कृत ‘हनुमान चरित्र’, प्रेमानंद कृत ‘रणयज्ञ’ तथा हरिदास कृत ‘सीता-विरह’ प्रमुख हैं।
डॉ. कामिल बुल्के के अनुसार भालण के पुत्र उद्धव और विष्णुदास ने सोलहवीं शताब्दी में संपूर्ण रामायण की रचना की थी, किन्तु वह प्रचलित नहीं हो सकी।
वर्तमान में गुजरात में अठारहवीं शताब्दी का गिरधरदास कृत ‘रामायण’ सबसे श्रेष्ठ और लोकप्रिय माना जाता है। आधुनिक काल में ‘रामचरितमानस’ एवं ‘अध्यात्म रामायण’ का गुजराती में अनुवाद हुआ।
- कश्मीरी रामकाव्य
कश्मीरी साहित्य में रामकथा का प्रवेश अपेक्षाकृत देर से हुआ। वास्तव में कश्मीरी रामकाव्य का प्रारंभ उन्नीसवीं शताब्दी में लोकगीतों के संग्रह ‘प्रकाश रामायण’ से होता है।
इस ग्रंथ में कुछ प्रसंग विचित्र हैं, जैसे—सीता का मंदोदरी की पुत्री होना, सीता के वनवास का कारण उसकी ननद, तथा कुश जन्म की कथा आदि।
इस काव्य-ग्रंथ में दशरथ यज्ञ से लेकर सीता के पृथ्वी-प्रवेश एवं स्वर्गारोहण तक की कथा ‘वाल्मीकि रामायण’ के अनुसार वर्णित है। डॉ. कामिल बुल्के ने ‘कश्मीरी रामायण’ या ‘रामावतारचरित’ की रचना अठारहवीं शताब्दी में दिवाकर प्रकाश भट्ट द्वारा मानी है।
- पंजाबी रामकाव्य
गुरुओं और संतों की पावन स्थली पंजाब भी रामकथा से अनभिज्ञ नहीं रहा। पंजाब में रामकाव्य की एक सुदृढ़ परंपरा मिलती है।
डॉ. मनमोहन सहगल ने पंजाब में रामकाव्य की शुरुआत विक्रम संवत् 1661 से मानी है। ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में राम की सत्ता स्वीकार की गई है। भाई गुरदास की वाणियों में भी रामकथा के कुछ प्रसंग मिलते हैं।
साहित्यिक दृष्टि से पंजाबी रामकाव्य की पहली कड़ी ‘आदि रामायण’ है, जिसके रचयिता सोढ़ी मेहरबान थे। इसके बाद हिरदेराम भल्ला कृत ‘हनुमन्नाटक’ तथा गुरु गोबिंद सिंह कृत ‘रामावतार’ प्रमुख रचनाएँ हैं।
सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दी में कई अन्य रचनाएँ भी हुईं। समस्त पंजाबी रामकाव्य का आधार ‘वाल्मीकि रामायण’, ‘रामचरितमानस’ एवं ‘अध्यात्म रामायण’ रहे हैं।
( लेखक कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के पूर्व कुलसचिव हैं)
साभार- www.isrj.org से




