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हिंदुत्व को बचाना है तो ये कविताएँ याद रखिये

दशमेश पिता गुरू गोविंद सिंह जी सैनिको में उत्साह भरने के लिये जो भाषण देते थे, उनका संग्रह ‘चंड़ी दी वार’ कहलाता है । गुरू गोविंद सिंह जी ने सैकड़ों साल पहले अपनी कविताओँ के माध्यम से जो दर्द व्यक्त किया था वो आज बंगाल में भयावह रूप में दिखाई दे रहा है। अगर आपको हिंदुत्व को बचाना है तो इतिहास को खंगालिए और अपने बच्चों को ये कविताएँ याद करवाईये।

मिटे बाँग सलमान सुन्नत कुराना ।
जगे धमॆ हिन्दुन अठारह पुराना ॥
यहि देह अँगिया तुरक गहि खपाऊँ ।
गऊ घात का दोख जग सिऊ मिटाऊँ ॥
अर्थात :- हिंदुस्तान की धरती से बाँग (अजान), सुन्नत (इस्लाम) और कुरान मिट जाये, हिन्दू धर्म का जागरण होकर अट्ठारह पुराण आदर को प्राप्त हों। इस देह के अंगों से ऐसा काम हो कि सारे तुर्कों को मारकर खत्म कर दूँ और गोवध का दुष्कृत्य संसार से नष्ट कर दूँ ।

गुरु का स्वप्न है..
सकल जगत में खालसा पंथ गाजै। जगै धर्म हिन्दू तुरक भंड भाजै।।
अर्थात् दशमेश पिता गुरु गोविन्द सिंह जी कहते हैं – सम्पूर्ण सृष्टि में खालसा पंथ की गर्जना हो। हिन्दू धर्म का पुनर्जागरण सारे संसार में हो और पृथ्वी पर से सारी अव्यवस्था, पाप और असत्य के प्रतीक इस्लाम का नाश हो।

महाकवि भूषण ने वीर शिवाजी के पराक्रम की प्रशंसा करते हुए आशंका व्यक्त की थी कि अगर शिवाजी न होते तो हिंदुओं की क्या दुर्गति होती, आज बंगाल से लेकर कश्मीर और तमिलनाडु से लेकर आधंद्र प्रदेश तक हिंदुओं के साथ जो हो रहा है वो महाकवि भूषण ने बहुत पहले ही जान लिया था।

पीरा पयगम्बरा दिगम्बरा दिखाई देत,सिद्ध की सिधाई गई, रही बात रब की।
कासी हूँ की कला गई मथुरा मसीत भईशिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी॥

कुम्करण असुर अवतारी औरंगजेब,कशी प्रयाग में दुहाई फेरी रब की।
तोड़ डाले देवी देव शहर मुहल्लों के,लाखो मुसलमाँ किये माला तोड़ी सब की॥

भूषण भणत भाग्यो काशीपति विश्वनाथऔर कौन गिनती में भुई गीत भव की।
काशी कर्बला होती मथुरा मदीना होती, शिवाजी न होते तो सुन्नत होती सब की ॥

कवि भूषण ने महाराज छत्रसाल की प्रशंसा में ‘छत्रसाल दशक’ की रचना की थी | यह कविता उसी का अंश है | इन पंक्तियों में युद्धरत छत्रसाल की तलवार और बरछी के पराक्रम का वर्णन किया है|

निकसत म्यान तें मयूखैं प्रलैभानु कैसी,
फारैं तमतोम से गयंदन के जाल कों|

लागति लपटि कंठ बैरिन के नागिनी सी,
रुद्रहिं रिझावै दै दै मुंडन के माल कों|

लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाहु बली,
कहाँ लौं बखान करों तेरी कलवार कों|

प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि,
कालिका सी किलकि कलेऊ देति काल कों|

भुज भुजगेस की वै संगिनी भुजंगिनी – सी,
खेदि खेदि खाती दीह दारुन दलन के|

बखतर पाखरन बीच धँसि जाति मीन,
पैरि पार जात परवाह ज्यों जलन के|

रैयाराव चम्पति के छत्रसाल महाराज,
भूषन सकै करि बखान को बलन के|

पच्छी पर छीने ऐसे परे पर छीने वीर,
तेरी बरछी ने बर छीने हैं खलन के|

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