सगोत्र विवाह भारतीय वैदिक परम्परा मे निषिद्ध माना जाता है। वैसे गोत्र शब्द का प्रयोग वैदिक ग्रंथों मे कहीं दिखायी नही देता। सपिण्ड (सगे बहन भाइ) के विवाह निषेध का उपदेश , ऋग्वेद 10वें मण्डल के 10वें सूक्त मे यम यमि जुडवा बहन भाई के सम्वाद के रूप में एक आख्यान द्वारा मिलता है।
यमी अपने सगे भाई यम से विवाह द्वारा संतान उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा प्रकट करती है। परन्तु यम उसे यह अच्छे तरह से समझाता है, कि ऐसा विवाह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होता है, और जो इस प्रकार संतान उत्पन्न करते हैं वे घोर पाप करते हैं।
ऋग्वेद में बताया गया है कि (सलक्ष्मा सहोदर बहन से पीड़ाप्रद संतान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है)। ऋग्वेद में बताया गया है कि (जो अपने सगे बहन भाई से संतानोत्पत्ति करते हैं, भद्र जन उन्हें पापी कहते हैं)
इस विषय पर स्पष्ट जानकारी पाणिनी कालीन भारत से भी मिलती है। अष्टाध्यायी के अनुसार एक पुरखा के पोते, पडपोते आदि जितनी संतान होगी वह एक गोत्र की कही जायेगी। यहां पर सपिण्ड का उद्धरण करना आवश्यक हो जाता है।
मनु: के अनुसार सगापन तो सातवीं पीढी में समाप्त हो जाता है। और घनिष्टपन जन्म और नाम के ज्ञात ना रहने पर छूट जाता है। आधुनिक जेनेटिक अनुवांशिक विज्ञान के अनुसार ही अंत:प्रजनन से उत्पन्न विकारों की सम्भावना का गुणांक इकाई से यानी एक से कम सातवीं पीढी में जा कर ही होता है।
गणित के समीकरण के अनुसार, अंत:प्रजनन विकार गुणांक= (0.5)क &100, ( क पीढी का सूचक है,) पहली पीढी मे क=1,से यह गुणांक 50 होगा, छटी पीढी में क=6 से यह गुणांक 1.58 हो कर भी इकाई से बडा रहता है। सातवी पीढ़ी मे जा कर क=7 होने पर ही यह अंत: प्रजनन गुणांक 0.78 हो कर इकाई यानी एक से कम हो जाता है।
मतलब साफ है कि सातवी पीढ़ी के बाद ही अनुवांशिक रोगों की सम्भावना समाप्त होती है। यह एक अत्यंत विस्मयकारी आधुनिक विज्ञान के अनुरूप सत्य है जिसे हमारे ऋषियों ने सपिण्ड विवाह निषेध कर के बताया था।
सगोत्र विवाह से शारीरिक रोग, अल्पायु , कम बुद्धि, रोग निरोधक क्षमता की कमी, अपंगता, विकलांगता सामान्य विकार होते हैं। भारतीय परम्परा मे सगोत्र विवाह न होने का यह भी एक परिणाम है कि सम्पूर्ण विश्व मे भारतीय सब से अधिक बुद्धिमान माने जाते हैं।
सपिण्ड विवाह निषेध भारतीय वैदिक परम्परा की विश्व भर मे एक अत्यन्त आधुनिक विज्ञान से अनुमोदित व्यवस्था है। पुरानी सभ्यता चीन, कोरिया, इत्यादि मे भी गोत्र /सपिण्ड विवाह अमान्य है। परन्तु मुस्लिम और दूसरे पश्चिमी सभ्यताओं मे यह विषय आधुनिक विज्ञान के द्वारा ही लाया जाने के प्रयास चल रहे हैं। एक जानकारी भारत वर्ष के कुछ मुस्लिम समुदायों के बारे मे भी पता चली है। ये मुस्लिम समुदाय इस्लाम को अपनाने से पहले के अपने हिंदू गोत्रों को अब भी याद रखते हैं और विवाह सम्बंध बनाने समय पर सगोत्र विवाह नही करते।
आधुनिक अनुसंधान और सर्वेक्षणों के अनुसार फिनलेंड मे कई शताब्दियों से चले आ रहे शादियों के रिवाज मे अंत: प्रजनन के कारण ढेर सारी ऐसी बीमारियां सामने आंयी हैं जिन के बारे वैज्ञानिक अभी तक कुछ भी नही जान पाए हैं। मेडिकल अनुसंधानो द्वारा, कोरोनरी हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर, गठिया, द्विध्रुवी अवसाद (डिप्रेशन), दमा, पेप्टिक अल्सर, और हड्डियों की कमजोरी। मानसिक दुर्बलता यानी कम बुद्धि का होना भी ऐसे विकार हैं जो अंत:प्रजनन से जुडे पाए गए हैं।
बीबीसी की पाकिस्तानियों पर तैयार की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, उन के बच्चों मे 13 गुना आनुवंशिक विकारों के होने की संभावना अधिक मिली, बर्मिंघम में पहली चचेरे भाई से टीवी विवाह के दस बच्चों में एक या तो बचपन में मर जाता है या एक गंभीर विकलांगता विकसित करता है। बीबीसी ने यह भी कहा कि, पाकिस्तान में ब्रिटेन के पाकिस्तानी समुदाय में प्रसवकालीन मृत्यु दर काफी अधिक है। इस का मतलब यह है कि ब्रिटेन में अन्य सभी जातीय समूहों के मुकाबले में जन्मजात सभी ब्रिटिश पाकिस्तानी शिशु मौते 41 प्रतिशत अधिक पाई गयी। इसी प्रकार Epidermolysis bullosa अत्यधिक शारीरिक कष्ट का जीवन, सीमित मानवीय और संपर्क शायद त्वचा कैंसर से एक जल्दी मौत भी आनुवंशिक स्थितियों की संभावना बताती है।
माना जाता है, कि मूल पुरुष ब्रह्मा के चार पुत्र हुए, भृगु, अंगिरा, मरीचि और अत्रि। भृगु के कुल मे जमदग्नि, अंगिरा के गौतम और भरद्वाज, मरीचि के कश्यप,वसिष्ट, एवं अत्रि के विश्वामित्र हुए।
इस प्रकार जमदग्नि, गौतम, भरद्वाज, कश्यप, वसिष्ट, अगस्त्य और विश्वामित्र ये सात ऋषि आगे चल कर गोत्रकर्ता या वंश चलाने वाले हुए। अत्रि के विश्वामित्र के साथ एक और भी गोत्र चला बताते हैं। इस प्रकार के विवरण से प्राप्त होती है आदि ऋषियों के आश्रम के नाम।
अपने नाम के साथ गुरु शिष्य परम्परा, पिता पुत्र परम्परा, अपने नगर, क्षेत्र, व्यवसाय समुदाय के नाम जोड कर बताने की प्रथा चल पडी थीं। परन्तु वैवाहिक सम्बंध के लिए सपिंड की सावधानी सदैव वांछित रही है। आधुनिक काल मे जनसंख्या वृद्धि से उत्तरोत्तर समाज आज इतना बडा हो गया है कि सगोत्र होने पर भी सपिंड होंने की सम्भावना नही होती। इस लिए विवाह सम्बंध के लिए आधुनिक काल मे केवल गोत्र छोड देना आवश्यक नही रह गया है। परंतु सगोत्र होने पर सपिण्ड की वैज्ञानिक परीक्षा आवश्यक हो जाती है। यह इतनी सुगम नही होती। सात पीढी पहले के पूर्वजों की जानकारी भी साधारणत: उपलब्ध नही रह्ती। इसी लिए सगोत्र विवाह न करना ही ठीक माना जाता है।
इसी लिए 1955 के हिंदू विवाह सम्बंधित कानून मे सगोत्र विवाह को भारतीय न्याय व्यवस्था मे अनुचित नही माना गया। परंतु अंत: प्रजनन की रोक के लिए कुछ मार्ग निर्देशन भी किया गया है।
वैदिक सभ्यता मे हर जन को उचित है के अपनी बुद्धि का विकास अवश्य करे। इसी लिए गायत्री मंत्र को सब अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
निष्कर्ष यह निकलता है कि सपिण्ड विवाह नही करना चाहिये। गोत्र या दूसरे प्रचलित नामों, उपाधियों को बिना विवेक के सपिण्ड निरोधक नही समझना चाहिये।





