आप यहाँ है :

धर्म और आधात्म की सरिता बहाती सप्तपुरी नगरियाँ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्तपुरी के शहर सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के बावजूद भारत की एकता को दर्शाते हैं। ये शहर हमारे देवताओं और अवतारों की जन्म भूमि रही हैं। इन शहरों में धर्म और आध्यात्म की सरिता बहती हैं और श्रद्धालु इनकी यात्रा कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। सप्तपुरी शहरों में अयोध्या, मथुरा, द्वारका, वाराणसी, हरिद्वार, उज्जैन, और कांचीपुरम धार्मिक नगर शामिल हैं। आइए ! इन सप्त पुरी शहरों की धार्मिक और आध्यात्मिक विशेषताओं के दर्शन करते हैं।

अयोध्या का प्राचीन महत्व इसी से है कि यह भगवान राम की जन्मभूमि और इक्ष्वाकु वंश की राजधानी रहा। राम के पिता दशरथ इसी वंश के थे। सप्त पुरियो में महत्वपूर्ण यह नगर सरयू नदी के तट पर स्थित है और रामजन्म भूमि में तेजी से किए जा रहे श्रीराम मन्दिर के भव्य निर्माण की वजह से विश्व मानचित्र पर आ गया हैं। पुरातात्विक और साहित्यिक संदर्भों के अनुसार इस स्थान की ऐतिहासिक विरासत छठी शताब्दी ईसा पूर्व की है।

भगवान राम का जन्म होने की वजह से इसे राम जन्मभूमि कहा जाता है । यहां 100 सेे अधिक मन्दिर होने का अनुमान है। महत्वपूर्ण मंदिरों में राम और उनकी पत्नी सीता का मंदिर , जिसे कनक भवन कहा जाता है। राघव मन्दिर देश का अकेला ऐसा मन्दिर है जहां केवल राम की प्रतिमा स्थापित है। हनुमान मंदिर को एक पहाड़ी की चोटी पर हनुमान गढ़ी कहा जाता है, जहां बैठी हुई मुद्रा में हनुमान की मूर्ति के अलावा, हनुमान की एक 6 इंच (15 सेमी) लंबी छवि भी है जो हमेशा फूलों से सजी रहती हैै। कौशल्या द्वारा स्थापित सीता का क्षीरेश्वरनाथ मंदिर है। राम के पु त्र कुश ने सरयू के निकट नागेश्वरनाथ मन्दिर की स्थापना की थी। इस मंदिर के बारे में प्रचलित कथानक के मुताबिक सरयू नदी में कुश ने जो बाजूबंद खोया था, वह शिव भक्त एक नाग-कन्या को मिल गया और उसे कुश से प्यार हो गया था। कुश द्वारा उनके सम्मान में यह मंदिर बनाया गया था और कहा जाता है कि यह विक्रमादित्य के शासनकाल का एकमात्र जीवित प्राचीन मंदिर है। सरयू नदी के घाटों में राम जानकी, लक्ष्मण,अहिल्या और स्वर्ग द्वार मुख्य हैं। यहाँ ब्रह्मा की यात्रा के सम्मान में निर्मित पौराणिक पात्रों से जुड़े ब्रह्मा कुंड, सीता कुंड, भरत कुंड, लक्ष्मण घाट जहाँ लक्ष्मण, राम के भाई ने स्नान किया, राम घाट प्रसिद्ध हैं।अयोध्या, लखनऊ से 130 किमी, वाराणसी से 209 किमी एवं दिल्ली से 799 किमी दूरी पर स्थित है।
मथुरा
हर दिन कृष्ण भक्ति संगीत एवं कथा की रस धारा बहाता मथुरा न केवल भारत का वरन् विदेशों में भी सर्वलोकप्रिय धार्मिक शहर है। महाभारत काल से ही ग्रंथों में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म होने से यह स्थान विशेषकर हिन्दुओं में पूज्यनीय, पावन एवं आस्था स्थल है। इसे सप्तपुरियों में एक पवित्र स्थल माना जाता है। मथुरा प्राचीन समय में सुरसेन के राज्य की राजधानी थी जो कृष्ण के मामा थे। मथुरा के साथ गोकुल, बरसाना और गोर्वधन जैसे कृष्ण से जुड़े धार्मिक स्थल है। कृष्ण का मथुरा में जन्म होने के बाद उन्हें गोकुल ले जाया गया था। बरसाने में उनकी पत्नि राधा रहती थी तथा यहां की लठमार होली विश्व प्रसिद्ध है। गोर्वधन वह स्थान है जहां श्रीकृष्ण ने अपनी कन्नी अंगुली पर गोर्वधन पर्वत को उठाया था। कृष्ण ने अपने मामा और मथुरा के शासक कंस को मार कर उसके कस्टों से जनता को मुक्त कराया था। पावन यमुना नदी के किनारे स्थित इस स्थान को मथुरा मंडल या ब्रज भूमि भी कहा जाता है।

कृष्ण जन्म के स्थान काराग्रह के स्थल पर प्राचीन समय में केशव देव मंदिर का निर्माण किया गया था। यह स्थान अब केशव देव मंदिर के रूप में है। यहां जन्म भूमि में गर्भगृह, दर्शन मण्डप, केशव देव मंदिर, भागवत भवन, श्रीकृष्णा कठपुतली लीला एवं वैष्णव देवी गुफा दर्शनीय है। जिस जगह कृष्ण ने जन्म लिया था वहां खुदाई में प्राप्त 1500 वर्ष प्राचीन गर्भ गृह एवं सिंहासन को सुरक्षित रखा गया है। गर्भ गृह के ऊपर एक बरामदा बना हैं जिस पर संगमरमर के पत्थर लगे हैं। इन पत्थरों पर भगवान श्रीकृष्ण की कई छवियां नजर आती हैं। यहां केशव देव मंदिर सबसे प्राचीन है। भागवत भवन बाद में बनाया गया जहां 12 फरवरी 1982 को विधिवत राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस भवन में सीता-राम-लक्ष्मण, जगन्नाथ, महादेव बाबा, हनुमान जी एवं माँ शेरावाली के मंदिर भी बने हैं। धार्मिक दृष्टि से मथुरा में प्रेम मंदिर वृंदावन , राधा गोविंद देव जी मंदिर, राधा मदन मोहन मंदिर , राधा दामोदर मंदिर , राधा गोपीनाथ मंदिर, बांके बिहारी मंदिर , कृष्ण बलराम मंदिर , रंगाजी मंदिर, राधा वल्लभ मंदिर , निधिवन और सेवा कुंज आदि प्रमुख मन्दिर हैं।

मंदिरों और यमुना के घाटों आदि की वजह से यह धार्मिक नगर का स्वरूप लिए हैं। यमुना नदी पर 25 पवित्र घाट बने हैं एवं प्रतिदिन सांय काल घाट पर आरती दर्शनीय होती है। मथुरा के निकट धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व के स्थलों में 15 कि.मी. पर गोकुल, 18 कि.मी. पर महावन, 27 कि.मी. पर बलदेव, 50 कि.मी. पर बरसाना एवं 60 कि.मी. पर नन्दगांव दर्शनीय स्थलों में शामिल हैं। मथुरा से 12 किमी दूर वृंदावन में मंदिरों की आकाशगंगा है, जो तीर्थयात्रियों के लिए बहुत ही पवित्र स्थान है।

पुरातत्व प्रमाणों के अनुसार यहां से लगभग 1200 ईसा के समय के मिट्टी के बर्तन एवं औजार आदि सामग्री प्राप्त हुई हैं। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से मौर्य साम्राज्य का प्रभाव जैन और बौद्ध मूर्तियों में यहां देखने को मिलता है। इस अवधि के दौरान मथुरा एक वाणिज्यिक केंद्र था। मुगलों के समय केशव मन्दिर को ध्वस्त कर दिया गया और उसके स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया जो आज भी मन्दिर की बगल में स्थापित है। ब्रिटिश पुरातत्ववि दों ने शहर की प्राचीन ऐतिहासिकता को फिर से बनाने और भारतीय संस्कृति को अंतर्दृष्टि प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। कृष्ण मंदिर और प्राचीन इतिहास दोनों अब शहर के प्रमुख आकर्षण हैं। इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण पुरा सम्पदा मथुरा के संग्रहालय में दर्शनीय है।

कृष्ण जन्म यहां भव्य रूप से मनाया जाता है जिसमें विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में शामिल होते हैं। इसके साथ-साथ बरसाने की लठ मार होली विदेशों में भी लोकप्रिय है। वृंदावन की 24 कोसिय परिक्रमा करना पुण्यकरी माना जाता है। इसमें गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगाने के साथ – साथ कई मंदिरों के दर्शनों का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। मथुरा, आगरा से उत्तर में लगभग 50 किलोमीटर और दिल्ली से दक्षिण में 150 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। मथुरा दिल्ली – मुंबई बड़ी रेलवे लाइन पर प्रमुख स्टेशन है।

द्वारका
गुजरात राज्य के जिला देवभूमि द्वारका में स्थित द्वारका एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ स्थल है। यह भारत के पश्चिम में समुद्र के किनारे स्थित है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान कृष्ण ने इस नगरी को बसाया था और यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि रही। भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण मथुरा से द्वारका चले गए थे और गोमती के किनारे द्वारका को बसा कर अपनी राजधानी बनाया। लेकिन कृष्ण की मृत्यु के बाद, उनके वंश, यादवों का पतन हुआ । यह आगे बाढ़ और अरब सागर में कृष्णा के शहर के जलमग्न होने से और बढ़ गया था । वर्तमान में, द्वारका गुजरात राज्य में सौराष्ट्र प्रायद्वीप के पश्चिमी सिरे पर अरब सागर के तट पर स्थित एक छोटा शहर है।

यहां आदिगुरू शंकराचार्य ने यहां शारदा मठ की स्थापना की थी। उन्होंने द्वारकाधीश मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और देवी आद्या शक्ति का एक मंदिर भी जोड़ा। सात मंजिला द्वारकाधीश मंदिर की ऊंचाई 43 मीटर है और सुंदर नक्काशीदार मंदिर एक विशाल ध्वज से सुशोभित है। गोमती नदी के छोर से मंदिर के पीछे की ओर जाने का रास्ता है जहां 56 सीढ़ियां बनी हैं। मंदिर में एक बड़े हॉल के भीतर एक गर्भगृह है, जिसमें तीन तरफ से प्रवेश द्वार है जबकि बाहरी नक्काशी कामुक दृश्यों को दर्शाती है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य छवि विस्तृत रूप से अलंकृत है। कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी को समर्पित एक मंदिर द्वारका से 2 किमी दूर बेट द्वारका में स्थित है जो 2500 साल पुराना बताया जाता है लेकिन वर्तमान स्वरूप में इसे 12वीं शताब्दी का माना जाता है। यह एक समृद्ध नक्काशीदार मंदिर है जिसे बाहरी रूप से देवी-देवताओं की मूर्तियों से सजाया गया है और गर्भगृह में रुक्मिणी की मुख्य छवि है।

गोमती के किनारे नौ घाटों पर सांवलिया जी, गोवर्धननाथ जी, हनुमान जी के मंदिर व महाप्रभु की बैठक बनी है। संगम घाट के उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट को चक्रतीर्थ कहा जाता है, जिसके पास रत्नेश्वर महादेव का मंदिर बना है। यहां गुलाबी रंग के पानी का कैलाश कुण्ड, गोपीसागर, शंख तालाब भी दर्शनीय है। प्रमुख दर्शनीय स्थलों में भेंट द्वारका है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भक्त नरसी की हुण्डी भरी थी। भेंट द्वारका टापू के ऊंचे टीले पर हनुमान जी का मंदिर बना है, जिससे हनुमान टीला कहा जाता है। बड़ी चारदीवारी के भीतर पांच बड़े-बड़े महल, जो दुमंजिले और तिमंजिले हैं, बने हैं। पहला और सबसे बड़ा महल श्री कृष्ण का है तथा इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्वती के महल हैं।

उत्तर में राधा व रूकमणी के महल हैं। इन पांचों महलनुमा मंदिरों के किवाड़ों और चैखटों पर चांदी के पतरे जड़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी चारों रानियों की मूर्तियों के सिंहासन पर भी चांदी मंढ़ी है। रणछोड़ जी के मंदिर से द्वारका शहर की परिक्रमा शुरू होती है। द्वारका का नजदीकी घरेलू हवाई अड्डा 137 किमी दूर जामनगर में स्थित है। मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से जामनगर के लिए नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं। यह रेल एवं बस सेवाओं से जुड़ा है। द्वारका स्टेशन अहमदाबाद – ओखा ब्रॉड गेज रेलवे लाइन पर स्थित है जहाँ से राजकोट, अहमदाबाद और जामनगर के लिए रेल सेवा उपलब्ध है।

वाराणसी
उत्तर प्रदेश में पावन गंगा नदी के किनारे अर्द्ध चंद्राकर तट पर स्थित शहर वाराणसी को काशी भी कहा जाता है। प्राचीन समय में बनारस शहर को अविमुक्तक , आनंदकानन , महाश्मासन , सुरंधन , ब्रह्म वर्धा , सुदर्शन और राम्या जैसे कई नामों से पुकारा जाता था। अब इसे बनारस और वाराणसी दोनों नामों से पुकारा जाता था। इसकी प्राचीन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को देखते हुए इसे हिंदू धर्म के सात पवित्र शहरों में सबसे पवित्र” माना जाता है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में यह धार्मिक “ब्राह्मणवादी शिक्षा” का केंद्र रहा है, जिसमें संतों, दार्शनिकों, लेखकों और संगीतकारों ने पिछली कई शताब्दियों में इसे अपना घर बना लिया है। लेकिन इसके अधिकांश मंदिर की विरासत 12 वीं शताब्दी में मोहम्मद गौरी द्वारा विनाश का कारण बनी। शहर में अब देखे जाने वाले मंदिर और धार्मिक संस्थान ज्यादातर 18 वीं शताब्दी के पुराने हैं।

धार्मिक नगर वाराणसी के अधिसंख्य मंदिरों में सबसे अधिक पूजा काशी विश्वनाथ की होती है जो देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। ऋग्वेद में उल्लेख किया गया है कि पुराने समय में इस शहर को काशी या “शिव की नगरी” के नाम से जाना जाता था । अन्य प्रमुख मंदिरों में काल भैरव, संकट मोचन हनुमान मंदिर , दुर्गा मंदिर , बनारस हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में स्थित तुलसी मानस और विश्वनाथ मंदिर हैं। सारनाथ में प्राचीन बौद्ध मठ देखे जाते हैं, लेकिन वे ज्यादातर खंडहर में हैं। महाबोधि सोसाइटी और चीनी, बर्मी और तिब्बती बौद्धों द्वारा निर्मित मंदिर भी यहां हैं। वाराणसी रेलवे स्टेशन के समीप अखंड भारत के मानचित्र लिए भारत माता मंदिर महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि वाराणसी में करीब 2200 से अधिक मन्दिर हैं।

वाराणसी में गंगा नदी पर 84 रमणिक घाट बने हैं और उन पर विभिन्न देवी – देवताओं के मन्दिर बनाए गए हैं। घाटों की रंगत देखते ही बनती हैं। सूर्यास्त के समय नदी में नौकायन का अपना आंनद है। जैसे – जैसे सांध्य गंगा आरती का समय होता है सारी नौकाएं आरती घाट के सम्मुख आ खड़ी होती हैं और नौकाओं में ही बैठ कर श्रद्धालु शास्त्रोक्त चमत्कृत कर देने वाली गंगा आरती की सरिता में गोते लगाते हैं। अद्भुत आरती के साक्षी होते हैं घाट पर हजारों देशी – विदेशी श्रद्धालु। यहां अनेक धार्मिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव का जुलूस महामृत्युंजय मंदिर से काशी विश्वनाथ मंदिर तक ले जाया जाता है।

नवंबर या दिसंबर में गंगा उत्सव में हजारों तीर्थयात्रियों द्वारा दी जाने वाली आरती द्वारा गंगा की पूजा की जाती है, जो घाटों से नदी में तैरने के लिए जले हुए दीपक भी छोड़ते हैं । अक्टूबर या नवंबर के दौरान राम – भरत मिलाप त्योहार मनाया जाता है। तुलसी घाट पर, एक शास्त्रीय संगीतमय कार्यक्रम मार्च के दौरान 5 दिनों के लिए आयोजित होता है जहां भारत के सभी हिस्सों के प्रतिष्ठित कलाकार अपना प्रदर्शन करते हैं। रामनगर की रामलीला विश्व प्रसिद्ध है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय भारत में विख्यात है। वाराणसी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से 780 किलोमीटर और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 300 किलोमीटर दूर है।

हरिद्वार
शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में स्थित हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थानों में है जहां पतित पावनी हर-हर गंगा अपने उद्गम स्थल गंगौत्री हिमनद से 253 कि.मी. की यात्रा तय कर पर्वतों को छोड़कर धरती पर उतरती है। हर की पौड़ी हरिद्वार का सर्वप्रिय दर्शनीय स्थल है। कहा जाता है कि सागर मंथन के दौरान अमृत की एक बूंद यहां गिरी थी जिसे ब्रह्म कुण्ड कहा जाता है। हर की पौड़ी हरिद्वार के सबसे पवित्रतम घाटों में माना जाता है। सूर्यास्त के समय हर की पौड़ी पर की जाने वाली गंगा मईया की आरती का दृश्य लुभावना होता है। गंगा घाट पर अनेक मंदिर भी बने हैं। दूर से नजर आते अडिग पर्वत, कलकल कर बहती पवित्र गंगा, देश-विदेश से आये श्रद्धालु और सैलानी तथा चारों ओर गूंजते गंगा मईया के जय कारे का रमणिक दृश्य सीधा मन को छू जाता है। यहां के बाजारों की रौनक धार्मिक स्वरूप लिए है। आने वाले लोग पवित्र गंगाजल को बोतलों में भरकर अपने साथ ले जाते हैं।

बिल्व पर्वत के शिखर पर स्थित मनसा देवी का मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र हैं। यहां पहुँचने के लिए पैदल मार्ग के साथ रोप-वे बनाया गया है। मनसा देवी के मुख्य मंदिर में दो प्रतिमाएं हैं। एक तीन मुखों वाली व पाँच भुजाओं के साथ एवं दूसरी आठ भुजाओं के साथ। ननील पर्वत की चोटी पर स्थित चण्डी देवी मंदिर दर्शशनी है। अन्य प्रमुख मंदिरों में ग्यारहवीं सदी का सिद्धपीठ माया देवी को समर्पित है। दक्ष महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। आठ मंजिला आधुनिक भारत माता मंदिर राष्ट्रवाद की प्रेरणा देता है। हरिद्वार से ऋषिकेश मार्ग पर 6 किमी. दूर स्थित सप्तार्षि आश्रम एवं सप्त सरोवर के घाटों पर खड़े होकर प्रकृति के मनोरम दृश्य देखे जा सकते हैं। यहां हर 6 साल में अर्द्ध कुंभ एवं 12 साल में महाकुंभ का आयोजन हरिद्वार के लोकप्रिय सांस्कृतिक आयोजन हैं।

हरिद्वार, देहरादून से 52 किमी, देश की राजधानी दिल्ली से 214 किमी दूरी पर स्थित है जो उत्तराखंड के देव धामों का प्रवेश द्वार है। देश के प्रमुख स्थानों से रेल एवं बस सेवाओं से अच्छी प्रकार जुड़ा है।

उज्ज्यिनी ( उज्जैन)
मध्यप्रदेश में शिप्रा नदी के तट पर स्थित उज्जैन को महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के कारण महाकाल की नगरी कह कर बुलाया जाता है। प्राचीन समय में इस शहर का नाम उज्जैयनी था। यह नगर देश का प्रमुख धार्मिक नगर है। बताया जाता है कि समुद्र मंथन के बाद अमृत घट लेकर भाग रहे देवताओं का राक्षसों ने स्वर्ग तक पीछा किया तब इस दौरान घट से बूंदे छलकी जो हरिद्वार, प्रयाग, नासिक एवं उज्जैन में गिरी। इसीलिए इन चारों स्थानों की नदियों पर कुम्भ का आयोजन किया जाता है। उज्जैन का मुख्य आकर्षण है श्रीद्वारिकाधीश अर्थात् ”गोपाल मंदिर“। इसे सिंधिया की रानी बैजाबाई द्वारा 1833 ई. में बनवाया गया था। मराठी शैली में बने मंदिर में श्रीकृष्ण की रजत मूर्ति स्थापित है तथा मंदिर के दरवाजे भी चांदी से बने हैं।

उज्जैन में मंदिरों का बाहुल्य है, इनमें से अधिकांश प्राचीन काल के और ऐतिहासिक मंदिर है। महाकालेश्वर का प्रसिद्ध शिव मंदिर हर वक्त भक्तों की भीड़ से भरा रहा है। यह मंदिर शहर के दक्षिण में शिप्रा नदी के तट पर स्थित हैं। नदी के दूसरे तट पर स्फटिक मणी की अत्यन्त सुन्दर प्रतिमा जैन मंदिर में विराजमान है। उज्जैन में बड़े गणेश जी का मंदिर, चिंतामण गणेश जी, भर्तहरि की गुफाएं, पीर मत्स्येन्द्र नाथ, कालियादेह महल, काल भैरव, वैधशाला, नवग्रह मंदिर एवं कालीदास अकादमी प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं।

उज्जैन विक्रमादित्य और अशोक तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के काल से जुड़ा है । धार्मिक परंपरा इसे भगवान शिव के राक्षस राजा त्रिपुरासुर पर विजय प्राप्त करने और फिर शहर का नाम बदलकर उज्जैनिनी जिसका अर्थ है ‘गर्व से जीत’ से जोड़ती है। कुषाण राजवंश के शासनकाल का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है , जो शिव को अपना दिव्य संरक्षक मानते थे। उनके शासनकाल के दौरान ग्रीक धार्मिक प्रथाओं के प्रभाव के अलावा , शिव की पूजा, विशेष रूप से, ईरान में एक स्वीकृत प्रथा के रूप में भी देखी जाती थी। यह कभी मालवा क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर और राजधानी था। उज्जैन के प्राचीन शहर में जय सिंह द्वितीय ने 18 वीं शताब्दी में शासन किया और यहां एक वेधशाला बनाई, जिसे जंतर मंतर कहा जाता है । उज्जैन भारत की राजधानी दिल्ली से करीब 776 किमी और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 183 किमी दूर है स्थित है। देश के प्रमुख स्थानों से रेल एवं बस सेवाओं से जुड़ा है।

कांचीपुरम
पुराणों में उल्लेखित कांचीपुरम के बारे में मान्यता है कि इस क्षेत्र में प्राचीन काल में ब्रह्माजी ने देवी के दर्शन के लिये तप किया था। इसके दो भाग शिवकांची और विष्णुकांची हैं। उत्तरी तमिलनाडु में मंदिरों की व्यापकता की वजह से इसे पवित्र शहर माना जाता हैं। यहांं एक हज़ार वर्ष से अधिक वर्षो की स्थापत्य कला के दर्शन होते हैं, जिसे पल्लर नदी के तट पर पल्लव राजवंश के समय में 6 टी और 7वीं शताब्दी के मध्य बसाया गया था। यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में प्रारंभिक चोलों की राजधानी थी । पल्लव शासन के बाद यहां विजयनगर साम्राज्य और नायक वंश का शासन रहा। दक्षिण भारतीय वास्तुकला को पल्लव शासन के दौरान बढ़ावा मिला, विशेष रूप से जैन धर्म से हिंदू धर्म में परिवर्तित होने के बाद महेंद्रवर्मन प्रथम के शासनकाल के दौरान चट्टानों को काटकर मंदिरों का निर्माण कराया गया। आदि शंकराचार्य , हिंदू दार्शनिक संत, जिन्होंने अद्वैत दर्शन का प्रचार किया, आठवीं शताब्दी ईस्वी में यहां रहते थे और पढ़ाते थे। कांचीपुरम प्रसिद्धि और विद्या में वाराणसी शहर के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता है। हिंदू दार्शनिक रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन यहाँ का अध्ययन किया।

आदि शंकराचार्य के साथ जुडे शहर का सबसे प्रसिद्ध मन्दिर कामाक्षी अम्मन प्राचीन मंदिर है। किवदंती है कि कामाक्षी ने रेत से बने शिवलिंग की पूजा की और विवाह में शिव का हाथ प्राप्त किया। मंदिर लगभग 2.0 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है और गर्भगृह सोने की परत वाले विमान से ढका हुआ है। कामाक्षी अम्मन मंदिर देवी शक्ति के तीन सबसे पवित्र स्थानों में एक है। मंदिर को पल्लवों ने बनवाया था जिसका पुनरोद्धार 14 वीं और 17वीं शताब्दी में करवाया गया। कामाक्षी देवी मंदिर देश की 51 शक्ति पीठों में संमिलित है। मंदिर में कामाक्षी देवी की आकर्षक प्रतिमा है। मीनाक्षी और विशालाक्षी विवाहिता हैं। इष्टदेवी देवी कामाक्षी बैठी हुई मुद्रा में हैं। देवी पद्मासन (योग मुद्रा) में बैठी हैं और दक्षिण-पूर्व की ओर देख रही हैं। कामाक्षी के नाम में सरस्वती तथा लक्ष्मी का युगल-भाव समाहित है।ब्रह्मोत्सव और नवरात्रि मंदिर के खास त्योहार हैं।

शहर के पश्चिम दिशा में स्थित कैलाशनाथ मंदिर
मंदिर कांचीपुरम का सबसे प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार मंदिरों में एक है। इस मंदिर को आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने अपनी पत्नी के कहने पर बनवाया था। मंदिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन तृतीय के करवाया था। मंदिर में देवी पार्वती और शिव की नृत्य प्रतियोगिता को दर्शाया गया है। भगवान विष्णु को समर्पित बैकुंठ पेरूमल मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में पल्लव राजा नंदीवर्मन पल्लवमल्ला ने करवाया था। मंदिर में भगवान विष्णु को बैठे, खड़े और आराम करती मुद्रा में देखा जा सकता है। मंदिर की दीवारों में पल्लव और चालुक्यों के युद्धों के दृश्य बने हुए हैं। मंदिर में 1000 स्तम्भों वाला एक विशाल हॉल भी है जो पर्यटकों को बहुत आकषित करता है। प्रत्येक स्तम्भ में नक्काशी से तस्वीर उकेरी गई हैं जो उत्तम कारीगर की प्रतीक हैं।

विजयनगर काल के उत्कृष्ट रूप से डिजाइन और निर्मित मंदिरों में एकमबारनाथ मंदिर की मीनार है जो 192 फीट की ऊंचाई पर है, और वरदराज स्वामी मंदिर में एक 1000-स्तंभ हॉल हैं जो भगवान विष्णु को समर्पित है।

कांचीपुरम और इसके आसपास करीब 126 शिव,विष्णु और जैन मंदिर हैं। कांचीपुरम चेन्नई से 75 किमी दूरी पर स्थित है। देश के सभी हिस्सों में सड़कों, रेल संपर्क और परिवहन सेवाओं का अच्छा नेटवर्क है, और निकटतम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे चेन्नई में हैं।

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top