पंजाब में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, तब हर सुबह किसी न किसी परिवार के हिस्से एक ताबूत आता था। थाने किलों में बदल चुके थे और वर्दी पहनना स्वयं शहादत का व्रत स्वीकार करने जैसा था। उस दौर में अनेक स्वयंभू मानवाधिकार कार्यकर्ता या तो पूरी तरह मौन थे या मानो अपनी-अपनी कंदराओं में छिपे बैठे थे। यदि उनकी उस चुप्पी की तुलना मुचकुंद की निद्रा से की जाए, तो अंतर स्पष्ट है—मुचकुंद की निद्रा कठोर तपस्या का वरदान थी, जबकि यह मौन सुविधाजनक, चयनित और वैचारिक था। जब पुलिसकर्मियों के सीने गोलियों से छलनी हो रहे थे, जब आतंकवादी निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाबलों को निशाना बना रहे थे, तब मानवाधिकार की सबसे ऊँची आवाज़ें कहीं सुनाई नहीं दीं।

देश के पुलिस बल के अदम्य साहस, संकल्प और बलिदान ने अंततः आतंकवाद पर नियंत्रण स्थापित किया। पंजाब में फिर सामान्य जीवन लौटा, बाज़ार खुले, स्कूलों में रौनक आई और लोगों ने राहत की साँस ली। लेकिन विडंबना यह रही कि जैसे ही आतंक का दौर समाप्त हुआ, वही मानवाधिकार कार्यकर्ता सक्रिय होकर सामने आए और अनेक पुलिस अधिकारियों तथा जवानों पर हजारों मुकदमे दायर होने लगे। जिन हाथों ने वर्षों तक आतंकवाद का मुकाबला किया था, वे स्वयं अदालतों के चक्कर लगाने को विवश हो गए। अनेक पुलिसकर्मी और उनके परिवार वर्षों तक कानूनी लड़ाइयों, सामाजिक तनाव और मानसिक पीड़ा से गुजरते रहे, पर उनकी त्रासदी सार्वजनिक विमर्श का विषय नहीं बन सकी।

इसी बीच सिनेमा और ओटीटी मंचों पर भी एक अलग प्रवृत्ति दिखाई दी। आतंकवादियों की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि, उनकी कथित विवशताओं और उनके दृष्टिकोण पर अनेक फिल्में और श्रृंखलाएँ बनीं, लेकिन उन पुलिसकर्मियों, उनके परिवारों और आतंकवाद के असंख्य निर्दोष पीड़ितों की कहानियाँ शायद ही कभी उसी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत की गईं। प्रश्न यह नहीं है कि किसी भी पक्ष की कहानी क्यों कही जाए; प्रश्न यह है कि क्या सभी पीड़ितों की पीड़ा समान संवेदना की अधिकारी नहीं है? यदि आतंकवाद से लड़ने वालों की कुर्बानियाँ और उनके परिवारों का संघर्ष लगातार उपेक्षित रह जाए, तो यह इतिहास और समाज—दोनों के साथ अन्याय प्रतीत होता है।

यही कारण है कि चयनात्मक संवेदनशीलता पर प्रश्न उठते हैं। जब एक घटना पर बनी फिल्म को "प्रोपेगंडा" कहकर खारिज किया जाता है, जबकि दूसरी वैचारिक दृष्टि से अनुकूल कथा को सहज स्वीकार कर लिया जाता है, तब निष्पक्षता पर स्वाभाविक रूप से बहस होती है। सहानुभूति यदि व्यक्ति, विचारधारा या राजनीतिक सुविधा के आधार पर बाँटी जाने लगे, तो वह न्याय का नहीं, पक्षधरता का रूप ले लेती है। इतिहास अंततः उन्हीं लोगों के योगदान को भी दर्ज करता है जिन्होंने बिना किसी प्रचार, कैमरे या प्रशंसा की अपेक्षा के अपने कर्तव्य का निर्वहन किया और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

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