प्रजापति की सन्तान देवों और असुरों में झगड़ा हो पड़ा। देवों ने 'उद्गीथ' को अपने साथ मिलाया, यह सोचकर कि उसकी सहायता से वह असुरों को जीत लेंगे।
तब उन्होंने 'गन्ध' (सूँघने की वायु) के रूप में 'उद्गीथ' की उपासना की। असुरों ने उस 'गन्ध' को पाप से बींध दिया। इसलिये मनुष्य अच्छी वस्तुएं सूँघता है और बुरी भी, क्योंकि गन्ध पाप से बिंधी हुई है।

इसके पीछे देवों ने 'वाणी' के रूप में 'उद्गीथ' की उपासना की। असुरों ने 'वाणी' को पाप से बींध दिया। इसलिये मनुष्य सत्य बोलता है और झूठ भी, क्योंकि 'वाणी' पाप से बिंधी हुई है।

तब देवों ने 'आँख' के रूप में 'उद्गीथ' की उपासना की। असुरों ने 'आँख' को पाप से बींध दिया। इसलिये मनुष्य देखने योग्य वस्तुयें भी देखता है और न देखने योग्य वस्तुयें भी, क्योंकि 'आँख' पाप से बिंधी हुई है।

तब देवों ने 'कान' के रूप में 'उद्गीथ' की उपासना की। 'कान' को असुरों ने पाप से बींध दिया। इसलिये मनुष्य भली बातें भी सुनता है और बुरी भी, क्योंकि 'कान' पाप से बिंधा हुआ है।

तब देवों ने 'मन' के रूप में 'उद्गीथ' की उपासना की। असुरों ने 'मन' को पाप से बींध दिया। इसलिये मनुष्य भले चिन्तन भी करता है और बुरे चिन्तन भी, क्योंकि 'मन' पाप से बिंधा हुआ है।

तब देवों ने 'मुख्यप्राण' (जीवन शक्ति) को 'उद्गीथ' समझकर उसकी उपासना की। जब असुरों ने उस 'प्राण' पर भी आक्रमण किया, तो वे आप टुकड़े-टुकड़े हो गए, जैसे मिट्टी का ढेला कड़े पत्थर पर लगने से चूर-चूर हो जाता है।

उस प्राण से मनुष्य सुगन्ध-दुर्गन्ध में भेद नहीं करता, क्योंकि यह प्राण पाप से मुक्त है। जो कुछ मनुष्य इस प्राण की सहायता से खाता-पीता है वह दूसरी शक्तियों को भी सहारा देता है। जब यह प्राण नहीं रहता तो मनुष्य का जीवन समाप्त हो जाता है और उसका मुँह खुल जाता है (मृत्यु के समय मुँह बन्द करने की भी शक्ति नहीं रहती)। [छान्दोग्य० २/१-९]

[बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि प्राण अन्य सब शक्तियों से बड़ा और सबसे श्रेष्ठ (उत्तम) है। हम आँख और कान से देखते और सुनते हैं, परन्तु जीवन के लिए देखना और सुनना आवश्यक नहीं। बहुत-सी जीवित वस्तुएं हैं जो न देखती हैं न सुनती हैं। हम वाणी की सहायता से दूसरों पर अपने विचार प्रकट करते हैं- जीवन के लिए यह भी आवश्यक नहीं। साँस लेने के लिए हमारे शरीर में एक प्रबन्ध (System) है जिसका केन्द्र 'फेफड़ा' है। यह भी वैरी आवश्यक नहीं। मनुष्यों में मानसिक शक्ति मुख्य शक्ति है। यह भी जीवन के लिए आवश्यक नहीं। जीवन शक्ति इन सबसे पहले उपस्थित थी। वह सबसे अवस्था में बड़ी है। उन दूसरी शक्तियों का विकास पीछे हुआ। जीवन शक्ति अन्य शक्तियों से उत्तम भी है। शेष सब शक्तियों पर पाप का प्रभाव हो सकता है, परन्तु मुख्य प्राण पर पाप प्रभाव नहीं जमा सकता। मनुष्य आँख, कान, मन और वाणी से अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के काम करता है। सूरदास ने जब देखा कि उनकी आँखें उन्हें पाप मार्ग पर ले जाती है, तो उन्होंने आँखों को फोड़ दिया। उनकी दृष्टि में ऐसी आँखें रखने से अन्धा होना अच्छा था। इसी प्रकार दूसरी शक्तियों का भी दुरुपयोग होता है, तो वे हमें पाप के गढे में गिरा देती है। उपनिषद् की इस कथा में यह बताया गया है कि विशुद्ध जीवन शक्ति पर पाप का प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने आप में निर्दोष है और निर्दोष रहती है। वे दूसरी शक्तियां हैं जो मनुष्य को कीचड़ में खींच ले जाती हैं।

पाद टिप्पणी-
* उद्गीथ- सामवेद के विशेष मन्त्र जो एक यज्ञ में पढ़े जाते हैं, या 'ओ३म्'।]

[सन्दर्भ ग्रन्थ- जीवन ज्योति]

साभार
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