प्रसिद्ध विद्वान डॉ. रामजी मिश्र की श्रेष्ठ पुस्तक ‘शंकराचार्य और उनकी परम्परा’ (शिवम प्रकाशन, प्रयागराज से 2023 में प्रकाशित) इस विषय पर एक पठनीय सद्ग्रंथ है। निश्‍चय ही इस विषय पर पूर्व में भी अनेक श्रेष्ठ पुस्तकें लिखी गई है। तथापि आदि शंकराचार्य की परम्परा को संक्षेप में और सार रूप में प्रामाणिक विवरणों के साथ जानने की दृष्टि से यह पुस्तक उपादेय है। इसमें विद्वान लेखक ने वेदांत दर्षन पर संक्षेप में टिप्पणी करने के बाद वेदांत दर्षन की 10 शाखाओं का परिचय दिया है जो बहुत महत्वपूर्ण है।

जैसा लेखक ने लिखा है, सामान्यतः लोग आदि शंकराचार्य के ‘शारीरक भाष्य’, श्री रामानुजाचार्य के ‘श्री भाष्य’ और वल्लभाचार्य के ‘अणु भाष्य’ से अधिक परिचित है। श्री मध्वाचार्य का ‘पूर्णप्रज्ञ भाष्य’ निम्बार्काचार्य का वेदान्त ‘पारिजात भाष्य’ और विज्ञान भिक्षु का ‘विज्ञानामृत भाष्य’ भी पर्याप्त चर्चित ग्रंथ है। महामहोपाध्याय आचार्य बलदेव उपाध्याय ने ‘आर्य संस्कृति के आधार ग्रंथ में’ अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का विवरण दिया है।
तीसरे अध्याय में विद्वान लेखक ने अद्वैत वेदान्त आचार्य परम्परा का संक्षिप्त उल्लेख किया है और पांचवे अध्याय में शंकराचार्य के उत्तरवर्ती आचार्यों का भी विवरण दिया है।

भगवान वेदव्यास और उनके पुत्र शुकदेव तथा आचार्य उपवर्ष प्रभृति आचार्यों के क्रम में आचार्य गौडपाद और आचार्य गोविन्दपाद तथा उनके विलक्षण शिष्य आचार्य शंकर तक का उन्होंने उल्लेख करते हुए भगवत्पाद शंकराचार्य के षिष्यों - सुरेश्वरर, पद्मपाद, हस्तामलक, तोटक के उपरांत सर्वज्ञात्म मुनि, आचार्य वाचस्पति मिश्र, श्रीकृष्ण मिश्र यति, प्रकाशात्म यति, आचार्य अद्वैतानंद, श्री हर्ष मिश्र, श्री आनंद बोध, आचार्य अमलानंद, आचार्य चित्सुख, आचार्य भारती तीर्थ, आचार्य माधव (विद्यारण्य मुनि) आनंद गिरि, प्रकाशानंद, अखण्डानन्द, नृसिंहाश्रम, अप्पय दीक्षित, भट्टोजि दीक्षित, नीलकंठ सूरि, सदानंद योगीन्द्र, मधुसूदन सरस्वती, ब्रह्मानंद सरस्वती, स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ, स्वामी करपात्री जी महाराज, स्वामी श्रीकृष्ण बोधाश्रम, स्वामी अखण्डानन्द सरस्वती, स्वामी महेश्वीरानन्द सरस्वती, स्वामी शंकरानन्द सरस्वती, स्वामी निरंजन देव तीर्थ, स्वामी सदानंद सरस्वती, स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती आदि श्रेष्ठ आचार्यों का परिचय दिया है।

छठे अध्याय में उन्होंने मठाम्नाय और शंकर पीठां का महत्व बताया है तथा सात शांकर पीठों का स्वयं आचार्य शंकर के द्वारा प्रतिपादित स्वरूप दर्शाया है जो अतिश्यप महत्वपूर्ण है, जिसमें प्रत्येक मठ का नाम, सम्प्रदाय, पद, क्षेत्र, देवता, देवी, आचार्य, तीर्थ, संबंधित वेद और महावाक्य आदि गिनाते हुए संकल्प वाक्य दिये है। इसके बाद मठाम्नाय सेतु या, महानुशासन का भी सार दिया है जिसमें शंकराचार्यों की योग्यता तथा उनके क्षेत्रों का विधिवत वर्णन है। इसके साथ ही प्रत्येक पीठ की जगद्गुरू शंकराचार्य परम्परा दी गई है जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण और प्रामणिक है। इसी अध्याय में विद्वान लेखक ने शंकराचार्य पद की योग्यता के प्रश्‍न की भी विवेचना की है। वे बताते है कि शंकराचार्य का दायित्व शांकर सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करना तथा सत्य सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार, संरक्षण और संवर्धन है। अतः उन्हें वेद-वेदांग आदि का विषारद और समस्त शास्त्रों के समन्वय का ज्ञाता ब्राह्मण होना चाहिए तथा नैष्ठिक ब्रह्मचारी होना चाहिए। यद्यपि सद्ग्रहस्थ भी सन्यासी बनने के बाद अभिषिक्त हो सकते है, जैसे स्वयं मण्डन मिश्र जी हुये जो सुरेश्वाराचार्य के रूप में आदि शंकर के शिष्य हुए।

इस प्रकार पवित्र, जितेन्द्रिय, वेद-वेदांग विषारद और सभी शास्त्रों में निपुण सन्यासी ही आचार्य पद को सुषोभित कर सकते है। लेखक पुस्तक में पृष्ठ 113 पर लिखते है कि जिनमें इन गुणों का अभाव हो, उन्हें पीठच्युत करने का जनता को अधिकार है। इसके प्रमाण के लिए वे मठाम्नाय का 57वां और 58वां श्लोक उद्धृत करते है, जिसमें कहा है कि पीठ पर आरूठ आचार्य शुचि, जितेन्द्रिय, वेद-वेदांग विशारद, योगज्ञ, सर्वशास्त्रों का ज्ञाता हो। यदि उक्त लक्षणों से रहित कोई व्यक्ति पीठारूढ हो जाये तो मनीषियों को उसे हटा देना चाहिए।

इसका तो यह अर्थ है कि पीठ पर आरूठ होने के लिए पूर्ववर्ती आचार्य द्वारा उत्तराधिकारी की नियुक्ति जैसा कोई स्पष्ट प्रावधान पर्याप्त नहीं है। लोक द्वारा यानी मनीषियों के द्वारा मान्य होना पीठारूठ होने के लिए आवश्‍यक है।

सामान्यतः गुरू शिष्यों को अपनी पीठ सौंपते है। परन्तु शंकर पीठ सामान्य गुरू परम्परा का अंग मात्र नहीं है। उसका दायित्व केवल अध्यात्म ज्ञान का प्रवाहित रखना नहीं है। उसका दायित्व धर्म का संरक्षण और संवर्धन भी है। इसीलिए वह केवल गुरू और शिष्य के बीच का मामला नहीं है। उसमें लोक की यानी मनीषियों की निर्णायक भूमिका है। इस विषय पर टीका करते हुए अनेक आचार्यों ने पीठ पर आचार्य की नियुक्ति के विषय में अनेक व्याख्यायें की हैं जिन पर अलग से विचार करना उचित होगा। अतः उनका हम यहां उल्लेख नहीं कर रहे है।

स्वयं लेखक ने प्रस्तुत पुस्तक में उसी पृष्ठ (113) में बताया है कि ‘शंकराचार्य जी के उक्त श्लोक में ‘मनीषी’ का तात्पर्य शांकर मतावलम्बी, सनातनी, सच्चरित्र, प्रकाण्ड विद्वान सन्यासी और उनके वर्ग तथा सद्गृहस्थ से है।’

उन्होंने आगे लिखा है कि इस संबंध में शांकर सम्प्रदाय से भिन्न परम्पराओं के आचार्यों अथवा विद्वानों या विद्वत् परिषदों की भूमिका सहायक सिद्ध हो सकती है, निर्णायक नहीं।

आगे आप ने सन्यासोपनिषद तथा नारद परिव्राजकोपनिषद का उद्धृण देते हुए बताया है कि यदि अनधिकारी व्यक्ति सन्यास ग्रहण कर भी ले तो वह आचार्य पद के लिए योग्य नहीं होता। यदि आचार्य पद धारण कर लिया हो तो मनीषियों को उसे आचार्य पद से च्युत कर देना चाहिए।

उल्लेखनीय है कि इस प्रकार मनीषियों को ही सब अधिकार वर्णित है, शासन को नहीं। यदि सनातन धर्म की परम्परा है। परन्तु सनातन धर्म का संरक्षण न करने वाले शासन की सनातन धर्मी जन क्या आचरण करें, यह तो वर्तमान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जो राजनीति शास्त्र का विषय है।

समस्या यह है कि मठाम्नाय महानुशासनम् के 71वे श्लोक मं स्वयं भगवत्पाद का आदेश है -
तानाचार्योपदेशांश्च राजदण्डाँश्चश पालयेत्।
तस्मादाचार्य राजानावनवद्यौ न निन्दयेत्।।
(लोगों का आचार्य के उपदेशों और राजा द्वारा दिये गये दण्ड का पालन करना चाहिए, क्योंकि आचार्य और राजा दोनों शुद्ध और पवित्र है। उनकी निंदा नहीं करनी चाहिए)।

वर्तमान में भारत राज्य का एक अंग है- ज्यूडिशियरी। जो सनातन धर्म के प्रति उदासीन और उससे निरपेक्ष है और वही राज्य की ओर से दंड देती है। शंकराचार्य पद पर किसी की वैधता या वर्जना का निर्णय 80 वर्षों से भारत की ज्यूडिशियरी करती रही है। तब क्या उसे भी शुद्ध और पवित्र माना जाये?

आदि शंकराचार्य ने अपने द्वारा निरूपित पद्धति को धर्म पद्धति कहा है और उसे जगत की रक्षा एवं गतिशीलता का हेतु बताया है। उनका कहना है कि शास्त्रों में जो कहा गया है, वही मर्यादा है और उसी से समस्त वर्णों और आश्रमों की स्थिति है। परन्तु वर्तमान शासक वर्णों को कोई विधिक मान्यता नहीं देते और आश्रमों की मर्यादा का भी कोई आग्रह नहीं रखते। तब ? क्या कर्तव्य है ? यह विवेच्यं है।

विद्वान लेखक डॉ. रामजी मिश्र ने शंकराचार्य और उनकी परम्परा में महाराज सुधन्वा की ताम्रपत्र-विज्ञप्ति दी है जो अत्यन्त महत्वपूर्ण संदर्भ है। यह विज्ञप्ति युधिष्ठिर शक 2663 में आष्विन पूर्णिमा को प्रसिद्ध (प्रसारित की गई थी) यानी ईसा पूर्व 475 में भगवत्पाद शंकराचार्य की वय उस समय 32 वर्ष होगी यानी उनके अवतारी जीवन का शिखर काल।

उसमें प्रारंभ में ही कहा गया है कि बौद्ध आदि समस्त वादों के समक्ष भगवत्पाद ने वर्णाश्रम युक्त वैदिक सिद्धांत की सर्वोपरिता प्रतिष्ठित की है। वहा केवल बौद्ध वाद का आग्रह नहीं है। यद्यपि अवैदिक मत के रूप में बौद्ध वाद की प्रधानता निर्दिष्ट है।
विज्ञप्ति यह संकेत देती है कि उन दिनों सनातन धर्म के पालक राष्ट्र में समस्त सनातन धर्मी मतों, शास्त्रों आदि के शीर्ष विद्वानों को समान महत्व प्राप्त था तथा उन्हें स्वमत प्रतिपादन का पूर्ण अधिकार था। विद्वानों के सभा में राजा के अनुशासन में प्रत्येक वाद के मनीषियों को प्रज्ञा के स्तर पर स्वमत की निर्दोषिता और श्रेष्ठता सिद्ध करनी होती थी। भगवत्पाद शंकर की श्रेष्ठता सभी ने मान ली।

यूरोपीय ईसाई प्रचारकों ने इसे वर्तमान राजनैतिक मतवादों अथवा अपने मजहबी मतों के भीषण संघर्ष की तरह प्रस्तुत किया या ख्रीस्त आदि मजहबी उन्मादी तंत्रों से सनातन धर्म के संघर्ष की तरह प्रस्तुत किया और आज कुशिक्षा के कारण बहुत से हिन्दू भी इसी भ्रम में है। परन्तु यह तो भीषण भ्रांति है। अन्य विचारों, मतों, ज्ञान और जीवन के सम्पूर्ण नाश के लिए तत्पर मतवादों से कोई वाद-विवाद न तो संभव है, न ही सम्यक। उनको तो आततायी की तरह ही देखना चाहिए और अवसर आते ही उनका सम्पूर्ण विनाश धर्म है। वाद या शास्त्रार्थ शास्त्रज्ञों के मध्य होता है। राक्षसों, पिशाचों और दैवी सम्पत्ति के धारकों के मध्य शास्त्रार्थ का कही कोई विधान नहीं है।
दूसरी बात यह है कि महाराज सुधन्वा की राजकीय विज्ञप्ति आचार्य की महत्ता की सार्वजनिक प्रतिष्ठापक है। अतः इस विषय में राज्य की विज्ञप्ति का भी निर्णायक महत्व है। यह राज्य-निरपेक्ष विषय नहीं है। महाराज ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक माना, इसी से लोक ने भी माना। महाराज को लोक मान्यता इसलिए प्राप्त है कि वे सनातन धर्म के, वर्णाश्रम धर्म के संरक्षक है अर्थात भिन्न-भिन्न प्रथाओं और परम्पराओं से सम्पन्न सनातन धर्म की विविध शाखाओं की परस्पर मर्यादाओं के पालक और संरक्षक है। इस प्रकार यह परस्पराश्रित मान्यता है। वर्तमान शासन 80 वर्षों से सनातन धर्म का संरक्षक पालक नहीं है ऐसी स्थिति में क्या करणीय है?

एक महत्पूर्ण तथ्य यह है कि इस ग्रंथ में भी तथा विविध ‘शंकरविजय’ काव्यों में भी भगवत्पाद का मुख्य शास्त्रार्थ और विवाद भी मीमांसकों (कुमारिल भट्ट - मण्डन मिश्र), शैवों, कापालिकों, गाणपत्यों, शाक्तों, भैरवों आदि से ही वर्णित है। बौद्धों से सर्वज्ञपीठ आरोहण के समय जो शास्त्रार्थ हुआ, वह यही दर्शाता है कि बौद्ध एक हिन्दू सम्प्रदाय ही है। अतः केवल बौद्धों पर बल देने का चलन यूरोपीय प्रोपेगडा के बाद बड़ा क्योंकि यूरोपीय ईसाई प्रचारक हिन्दुओं के विरूद्ध बौद्ध नामक एक नया रिलिजन खड़ा करना चाह रहे थे और चाहा रहे है। परन्तु किसी भी दिग्गज बौद्ध दार्शनिक से भगवत्पाद का कोई महत्वपूर्ण शास्त्रार्थ कही वर्णित नहीं है। स्वयं रामजी मिश्र ने पाण्ड्यों, चोलों, चालुक्यों, महाराष्ट्र या गुर्जर क्षेत्र में कही भी बौद्ध आधिपत्य का कोई उल्लेख नहीं किया है। सर्वत्र सनातन धर्म के ही अनुयायी थे और उन पर मीमांसकों आदि विविध सम्प्रदायों का प्रभाव था।

प्रायः सभी दिग्गज बौद्ध दार्शनिक ब्राह्मण हुए है। उनसे अन्य सनातन धर्मियों का केवल शास्त्रार्थ हुआ है, कोई युद्ध नहीं, राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई नहीं, राज्य की छीना झपटी नहीं। यानी यह शीर्ष दार्शनिकों, ज्ञानियों, पंडितों के बीच की ज्ञान चर्चा है। ख्रीस्त पादरियों ने इसे राजनैतिक युद्ध की तरह प्रचारित किया और उनके चेले भी यही करने लगे।

भगवान बुद्ध का काल ईसापूर्व 1800 है। उनके बाद ईसापूर्व 1250 से ईसापूर्व 550 तक क्रमश :अश्वघोष, नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग, कुमारजीव, दिड.नाग, चंद्रकीर्ति, धर्मकीर्ति आदि दिग्गज बौद्ध दार्शनिक हो चुके थे।

भगवत्पाद के समय कोई बड़ा बौद्ध दार्शनिक नहीं था। महान मीमांसक कुमारिल भट्ट ने बौद्ध दार्शनिकों को परास्त कर दिया था तथा दक्षिण भारत के राजाओं ने वैदिक सनातन धर्म की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली थी। भगवत्पाद के समय कोई बड़ा राजा बौद्ध नहीं था और लोक में बौद्धों का कोई विशेष प्रभाव बचा नहीं था। अतः किसी बौद्ध अंधकार के व्याप्त होने की बात अतथ्य है।

परन्तु मुख्य बात यह है कि दार्शनिक वाद-विवाद से प्रजा का धर्म बदल जाये, ऐसी कोई परम्परा सनातन धर्मी भारत में कभी नहीं थी। ईसाई और मुसलमान समाज यह तथ्य नहीं समझ पाये, यह स्वाभाविक है। क्योंकि उनके लिए मजहबी मत वस्तुतः राजनैतिक उन्माद का आवरण है। परन्तु परिपक्व भारतीय समाज ऐसी क्षुद्रताओं से पूर्ण अपरिचित रहा है।
राजा के अत्याचारों से ही सनातन धर्म पर आघात होता है। शास्त्रार्थों से नहीं। इसीलिए बौद्धों का लोक से विलोप जैसा कुछ भारत में घटित नहीं हुआ। बौद्ध दर्शन लोक धर्मी नहीं है। वह अति उच्च अभिजनों की प्रज्ञा से जुड़ा एक विचार विशेष है। बौद्ध दर्शन के अनुसार लोक जीवन का प्रवाह असंभव है। आज तक भारत में कभी भी बौद्ध दर्शन लोक जीवन में कोई स्थान नहीं ले सका है क्योंकि ऐसा होना असंभव है। बौद्धों का कोई भी राज शास्त्र या समाज शास्त्र है ही नहीं। वर्तमान में स्वयं को बौद्ध या नवबौद्ध कहने वाले राजनैतिक समूह प्रज्ञा की दृष्टि से भारत के लिए एक अपरिचित और अजनबी जीव है। उनका बौद्ध प्रज्ञा और बौद्ध शील से कही कोई संबंध है ही नहीं। प्रज्ञा के स्तर पर बौद्ध दर्शन अभिजात मनीषियों का एक बोध जगत है। उसका किसी भी भाव जगत या व्यवहार जगत से कोई संबंध न कभी रहा है, न कभी संभव है। मूर्ख ईसाई पादरी यह सब समझ ही नहीं सकते थे क्योंकि वे मतांध थे।

प्रबुद्ध यूरोप ऐसी किसी भ्रांति में नहीं है। प्रबुद्ध यूरोपीयों ने बारम्बार लिखा है कि बौद्ध मत अभिजनों के लिए ही है, जनसामान्य के लिए नहीं। अतः महानतम दार्शनिक आदि शंकराचार्य के द्वारा बौद्ध मत का निराकरण उच्च दार्शनिक विमर्श मात्र है। वह कोई राजनैतिक घटना नहीं है। उसके कारण कोई राजनैतिक घटना संभव भी नहीं थी। सनातन धर्म का उपासक समाज अध्यात्म के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ मनीषी को सर्वाधिक पूज्य मानता और जानता है। परन्तु इसीलिए वह अन्य मनीषियों का कोई अपमान नहीं करता। उन्हें भी पूज्य ही मानता है। इस विषय में एक उच्चावच्च क्रम का बोध सनातन धर्म में सदा से रहा है।

(लेखक ऐतिहासिक, धार्मिक व अध्यात्मिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं और इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है)