इस वर्ष नवरात्र में गुरु की उच्च स्थिति, बुध-शुक्र का तुला में संयोग तथा मंगल की कर्क स्थिति ज्योतिषीय अध्ययन के प्रमुख विषय हैं। परंतु नवरात्र को सर्वथा शुभ या अशुभ घोषित करने के लिए केवल एक-दो ग्रहों की स्थिति पर्याप्त नहीं है। वास्तविक शास्त्रीय विश्लेषण में पंचांग, ग्रहबल, राशि-दृष्टि, अंश, लग्न और मुहूर्त सभी को साथ देखना चाहिए।  इस विश्लेषण में मुंबई को स्थानीय पंचांग का आधार, निरयण राशि-चक्र तथा लाहिड़ी अयनांश को गणना की पद्धति मानेंगे। इसमें केवल सामान्य राशिफल नहीं, बल्कि तिथि, नक्षत्र, योग, करण, ग्रहों की राशि, युति और दृष्टि का अलग-अलग महत्व समझना आवश्यक है।
यह ध्यान रखिये पंचांग में बनने वाला योग और जन्मकुंडली में बनने वाला राजयोग एक ही चीज नहीं हैं। इसी तरह किसी ग्रह की उच्च राशि में स्थिति अपने आप हर व्यक्ति के लिए शुभ फल की गारंटी नहीं होती। ग्रहों की दृष्टि और योगों की व्याख्या करते समय राशि, अंश, भाव और लग्न भी देखना पड़ता है।
शारदीय नवरात्र 2026 का आरंभ 11 अक्टूबर को होगा। मुंबई के पंचांग के अनुसार उस दिन शुक्ल प्रतिपदा, चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग हैं। घटस्थापना का मुहूर्त चुनते समय इन सभी पंचांग-अंगों को साथ देखकर निर्णय करना चाहिए।

नौ दिनों का पंचांग: तिथि, नक्षत्र और योग

मुंबई के स्थानीय पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्र 2026 के दौरान 11 अक्टूबर को शुक्ल प्रतिपदा, चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग रहेगा। 12 अक्टूबर को शुक्ल द्वितीया, स्वाती नक्षत्र और विष्कुम्भ योग होगा। 13 अक्टूबर को शुक्ल तृतीया, विशाखा नक्षत्र और प्रीति योग रहेगा। 14 अक्टूबर को शुक्ल चतुर्थी, अनुराधा नक्षत्र और आयुष्मान योग होगा। 15 अक्टूबर को शुक्ल पंचमी, ज्येष्ठा नक्षत्र और सौभाग्य योग रहेगा।

इसी क्रम में 16 अक्टूबर को शुक्ल षष्ठी, ज्येष्ठा से मूल नक्षत्र का परिवर्तन तथा शोभन के बाद अतिगण्ड योग बताया गया है। 17 अक्टूबर को शुक्ल सप्तमी, मूल नक्षत्र और अतिगण्ड योग रहेगा। 18 अक्टूबर को शुक्ल सप्तमी, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र और सुकर्मा योग बताया गया है। 19 अक्टूबर को शुक्ल अष्टमी के बाद नवमी तिथि तथा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र और धृति योग रहेगा।

ध्यान दें: ये पंचांग-अंग दिन भर एक जैसे नहीं रहते। तिथि, नक्षत्र, योग और करण के आरंभ तथा समाप्ति के समय अलग-अलग हो सकते हैं। विशेष रूप से अष्टमी, नवमी, हवन और कन्या-पूजन के लिए मुंबई के स्थानीय पंचांग में दिए गए समय की पुष्टि करना उचित होगा।

ध्यान देने योग्य बात: 18 अक्टूबर को सप्तमी का सूर्योदय पड़ने और 19 अक्टूबर को अष्टमी के बाद नवमी आने के कारण देवी-पूजा की परंपरागत तिथियों में स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है। पूजा, हवन और कन्या-पूजन के लिए स्थानीय निर्णय को प्राथमिकता दें।
2. नवरात्र के दौरान प्रमुख ग्रहों की स्थिति
बृहस्पति — कर्क राशि
वैदिक ज्योतिष में गुरु कर्क राशि में उच्च के माने जाते हैं। इसे धर्म, ज्ञान, शिक्षा, सदाचार और मार्गदर्शन के लिए अनुकूल माना जाता है। व्यक्तिगत फल जानने के लिए गुरु की भावस्थिति और दृष्टियों का परीक्षण जरूरी है।
शनि — मीन राशि में वक्री
शनि को मीन राशि में वक्री बताया गया है। पारंपरिक व्याख्या में इसे अनुशासन, कर्म, जिम्मेदारी और पुराने कार्यों की समीक्षा से जोड़ा जाता है। केवल वक्री होने से शनि को अशुभ घोषित नहीं किया जा सकता।
मंगल — कर्क राशि
उपलब्ध मुंबई ग्रह-सारणी में मंगल कर्क राशि में है, जहाँ उसे नीच का माना जाता है। पारंपरिक ज्योतिष में इसे ऊर्जा, साहस और क्रोध के संतुलित उपयोग के संदर्भ में देखा जाता है। नीचभंग या अन्य बलों की जाँच किए बिना अंतिम निर्णय नहीं करना चाहिए।
शुक्र और बुध — तुला राशि
दोनों ग्रहों की तुला में स्थिति को कला, संवाद, संबंधों, व्यापार और रचनात्मकता के संदर्भ में देखा जा सकता है। शुक्र तुला राशि का स्वामी है; शुक्र के वक्री होने की स्थिति में परंपरागत ज्योतिषी संबंधों और आर्थिक निर्णयों की समीक्षा पर बल देते हैं।
ग्रहों की इन स्थितियों के लिए मुंबई की दैनिक ग्रह-सारणी देखें।
3. गुरु, शनि और मंगल की दृष्टियाँ
पराशरी वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की दृष्टि का आकलन केवल राशि के नाम से नहीं, बल्कि संबंधित ग्रहों की स्थिति और दृष्टि-नियमों से किया जाता है।
गुरु की विशेष दृष्टियाँ: पाँचवीं, सातवीं और नौवीं।
शनि की विशेष दृष्टियाँ: तीसरी, सातवीं और दसवीं।
मंगल की विशेष दृष्टियाँ: चौथी, सातवीं और आठवीं।
उदाहरण के लिए, यदि गुरु कर्क राशि में हों, तो उनकी राशि-दृष्टियाँ वृश्चिक, मकर और मीन पर पड़ेंगी। शनि मीन राशि से वृषभ, कन्या और धनु पर दृष्टि डालेंगे। मंगल कर्क से तुला, मकर और कुंभ पर दृष्टि डालेंगे।
यहाँ एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है: गुरु और मंगल दोनों कर्क में होने पर एक ही राशि में उनकी युति बनती है। गुरु की स्थिति मंगल की नीचता के संदर्भ में कुछ पारंपरिक बल-विचारों को प्रभावित कर सकती है, लेकिन केवल युति से मंगल का नीचभंग स्वतः सिद्ध नहीं होता। इसके लिए जन्मकुंडली अथवा चुने गए मुहूर्त की पूरी संरचना देखनी होगी।
4. क्या इस नवरात्र में गजकेसरी योग और शश राजयोग बन रहे हैं?
गजकेसरी योग: गुरु और चंद्रमा का परस्पर केंद्र संबंध आवश्यक माना जाता है। 11 अक्टूबर की उपलब्ध ग्रहस्थिति में चंद्रमा कन्या और गुरु कर्क में हैं; इसलिए उस दिन केवल इन राशियों के आधार पर गजकेसरी योग नहीं बनता।
शश महापुरुष योग: इसके लिए शनि का स्वराशि या उच्च राशि में होकर लग्न से केंद्र में होना आवश्यक है। शनि का मीन राशि में होना मात्र इस योग का प्रमाण नहीं है।
शुक्रादित्य योग: 17 अक्टूबर के आसपास सूर्य के तुला में प्रवेश के बाद सूर्य-शुक्र युति की संभावना है। इसे शुभ या अशुभ कहने से पहले ग्रहों की सटीक अंशगत दूरी और अन्य बल देखना चाहिए।
5. घटस्थापना के लिए विशेष सावधानी
मुंबई के लिए उपलब्ध गणना में 11 अक्टूबर को प्रतिपदा सुबह से लागू है, लेकिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के कारण घटस्थापना के मुहूर्त पर विशेष विचार आवश्यक है। 
अतः केवल किसी ग्रह के उच्च होने या किसी योग के नाम पर मुहूर्त तय करना उचित नहीं। स्थानीय पंचांग, उदया तिथि, नक्षत्र, योग और परंपरा के अनुसार निर्णय करें।