मुंबई के चित्रनगरी संवाद मंच में इस बार जाने माने कथाकार सूरज प्रकाश की पुस्तक मेरे लिखने की मेज पर रोचक चर्चा हुई।  इस कार्यक्रम में  रचनाकारों ने पुस्तक के साथ सूरज प्रकाश जी पर भी अपने विचार व्यक्त किए ।
कथाकार सूर्यबाला ने अपने वीडियो संदेश में कहा -
“सूरज प्रकाश हमेशा कुछ न कुछ नया, कुछ न कुछ अनूठा, कुछ न कुछ अलग लेकर साहित्य में आ जाते हैं। अपने लेखन में उन्होंने हमेशा कुछ बहुत परिश्रमी काम किया है और सोचा भी है।
बहुत दिनों पहले जब उन्होंने मेरे पास ये शीर्षक भेजा था- 'मेरे लिखने की मेज़', तभी मुझे इस शीर्षक में कुछ अजीब संजीदगी, कुछ अजीब अपनत्व जैसी बात लगी थी जैसे कोई अपने अंदर, अपने बेहद पास बैठकर मेरा अंतरंग कुरेद रहा है, जानना चाह रहा है। मुझे लगता है कि यही शीर्षक जब बहुत सारे लेखकों के पास गया, युवा और वरिष्ठ, सबने कुछ ऐसा ही सोचा। सबने शायद इस शीर्षक के साथ ऐसी ही अंतरंगता महसूस की।
और एक से एक नायाब संस्मरण, एक से एक नायाब आत्मकथ्य इस पुस्तक में, 'मेरे लिखने की मेज़' में, संग्रहीत होते चले गए। ऐसा बहुत कम होता है, कोई लेखक जो सोचे, जो परिकल्पना करे, वो जिन लेखकों के पास जाए, वो उसकी कल्पना को और-और छोर-अछोर विस्तृत करते चले जाएँ। तो सूरज बहुत भाग्यशाली भी रहे हैं परिश्रमी के साथ-साथ।
इन लेखकों ने जो कुछ लिखा है और इस मेज़ को, लिखने की मेज़ को लिखने का आकाश, लिखने की ज़मीन, लिखने की धरती, लिखने के क्षितिज तक पहुँचा दिया है। तो बड़ा अच्छा लगा देखकर कि इस शीर्षक ने लेखकों की परिकल्पना को जैसे पंख लगा दिए और वे उड़ चले।
अब ये एक लेखक की चीज़, एक लेखक के पास तमाम सारे लेखकों के एहसास, आहट और कितनी चीज़ें एक तरह से पूरी रचना प्रक्रिया आ गई कि कैसे किसी रचना की आहट, उसका एहसास, आभास हमारे अंदर आता है, लेखक के अंदर। और कैसे फिर वो धीरे-धीरे विकसित होता है, कैसे उसे लेकर लेखक चलता है और यात्रा करता है।
तो ये यात्रा, ये जो है, ये बहुत-बहुत महत्वपूर्ण है और मुझे बेहद ख़ुशी है कि आज इस पर ये कार्यक्रम हो रहा है। मैं शहर से बहुत दूर अपने कुटुंब के साथ हूँ और वहीं से मैं अपनी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, बहुत-बहुत मुबारकें और आशीर्वाद भेजती हूँ सूरज को और आप सबको।”
मुम्बई में अपनी तरह का शायद यह पहला कार्यक्रम था जिसमें वक्ताओं को 3 मिनट का समय दिया गया था और सभी वक्ताओं ने इस समय सीमा का सराहनीय ढंग से साथ दिया। चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की ओर से रविवार 22 मार्च 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट गोरेगांव के मृणालताई हाल में कथाकार सूरज प्रकाश द्वारा सम्पादित और अद्विक पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'मेरे लिखने की मेज' पर चर्चा का आयोजन किया गया।
वक्ताओं की सूची में शामिल थे- मधु अरोड़ा, विभा रानी, ममता सिंह, रीतादास राम, सुमन शर्मा, विवेक अग्रवाल और रमाकांत शर्मा। यह ऐसे लेखक हैं जो 'मेरे लिखने की मेज' पुस्तक में शामिल हैं। यह पुस्तक उनके लिए क्या महत्व रखती है और इसमें शामिल होकर इन्हें कैसा लगा? इसके तहत इन लेखकों ने रोचक और महत्वपूर्ण बातें श्रोताओं के सामने रखीं जिसका लाइव प्रसारण फेसबुक पर हुआ। सिर्फ़ तीन मिनट में वक्ताओं ने अपने शब्द सामर्थ्य और अपने नज़रिए से श्रोताओं के सामने अभिव्यक्ति की एक मिसाल क़ायम की।
प्रदीप गुप्ता और सोनाली बोस दो ऐसे रचनाकार थे जो पुस्तक में शामिल नहीं हैं मगर इन्होंने पुस्तक पढ़ी है। इन दोनों रचनाकारों ने भी समय सीमा के भीतर अपना वक्तव्य पेश किया। प्रदीप गुप्ता की यह बात ग़ौरतलब है कि मेज कैसी भी हो सकती है मगर काग़ज़ पर उतरने के बाद रचना कहां तक पहुंचती है यह महत्वपूर्ण है।
श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए संपादक सूरज प्रकाश ने विस्तार से कुछ रोचक अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि कैसे कुछ लेखकों ने उन्हें अपेक्षा के प्रतिकूल मैटर भेज दिया और उसे संपादित करने में उनको बहुत अधिक श्रम करना पड़ा। दिल्ली की प्रतिष्ठित पत्रिका #व्यंग्य_यात्रा का ज़िक्र सूरज प्रकाश ने आत्मीयता के साथ याद किया जिसमें 'मेरे लिखने की मेज पर' देश-विदेश के 16 रचनाकारों की संक्षिप्त और सारगर्भित टिप्पणियां प्रकाशित हुई हैं।
'धरोहर' के तहत संचालक देवमणि पांडेय ने पांच शायरों के ऐसे शेर पेश किये जो कहानी पर केंद्रित थे। सुभाष काबरा का समसामयिक व्यंग्य लेख "हम तो पीछे रह गए,आगे ज़माना बढ़ गया" पसंद किया गया। लिखने की मेज पर उन्होंने बढ़िया कटाक्ष किया। मुम्बई के चुनिंदा कवियों ने गीत, ग़ज़ल और विविधरंगी कविताएं सुनाईं। कवियों में शामिल थे- पूनम विश्वकर्मा, आभा बोधिसत्व, रीतादास राम, कृष्णा गौतम, प्रज्ञा मिश्र, अनामिका शर्मा, अलका अग्रवाल, रेनू शर्मा, मनजीत सिंह कोहली, हेमंत शर्मा और नरोत्तम शर्मा।
शुरुआत में मधुबाला शुक्ला ने प्रस्तावना पेश की। कार्यक्रम का संयोजन सोनाली बोस ने किया। इस अवसर पर कवि अनूप सेठी, स्क्रीन राइटर संजय छेल, कथाकार अलका अग्रवाल सिगतिया, अभिनेता शैलेंद्र गौड़, अभिनेता सोनू पाहुजा, डॉ आर एस रावत और दीनदयाल मुरारका विशेष रूप से मौजूद थे।