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पर्यटक उठाते हैं पुष्कर में मरुस्थल का लुत्फ

अजमेर जिला रेगिस्तानी जिलों में शामिल नहीं है परन्तु अजमेर का पुष्कर चारों और से रेगिस्तान की रेत से घिरा है। यहां जेसलमेर में सम जैसे आकर्षक रेतीले घोरें नहीं हैं परंतु सेलानियों को राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति से बखूबी परिचित कराते हैं।

आकर्षण
पुस्कर में पर्यटकों के लिए कार्तिक पूर्णिमा पर ऊँट उत्सव, अंतर्राष्ट्रीय हॉट एयर बैलून फेस्टिवल, सावित्री मन्दिर पर केबल राइड, वराह घाट पर पुष्कर आरती, रॉक क्लाइम्बिंग, रैपलिंग, क्वैड बाइकिंग, साइकिलिंग, सनसेट के साथ केमल सफारी, पूरी रात केमल सफारी, केमल सफारी के साथ लक्ज़री नाईट कैंपिंग, केमल कार्ट सफारी, जीप सफारी, हॉर्स राइडिंग, ज़िप्लिनिंग मनोरंजन के प्रमुख आकर्षण हैं। पर्यटक रेगिस्तान के अनदेखे क्षेत्र के इन आकर्षणों का यहाँ लुत्फ उठा सकते हैं।

जयपुर के पास रेगिस्तान देखने की इच्छा रखने वाले पर्यटकों के लिए जयपुर से मात्र 150 किमी. एवं अजमेर से 11 किमी.दूरी पर पुष्कर सर्वश्रेस्ठ विकल्प है। पूरे वर्ष ही भारत एवं अन्य देशों के पर्यटक पुष्कर का डेजर्ट क्षेत्र देखने आते हैं और ग्रामीण केमल सफारी, नाईट कैंपिंग,लजीज व्यंजन औऱ लोक नृत्यों का लुत्फ उठाते हैं।

प्रतिवर्ष यहां पर कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर मेला लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी आते हैं। हजारों हिन्दु लोग इस मेले में आते हैं और अपने को पवित्र करने के लिए पुष्कर झील में स्नान करते हैं। भारत में किसी पौराणिक स्थल पर आम तौर पर जिस संख्या में पर्यटक आते हैं, पुष्कर में आने वाले पर्यटकों की संख्या उससे कहीं ज्यादा है। इनमें बडी संख्या विदेशी सैलानियों की है, जिन्हें पुष्कर खास तौर पर पसंद है। हर साल कार्तिक महीने में लगने वाले पुष्कर ऊंट मेले ने तो इस जगह को दुनिया भर में अलग ही पहचान दे दी है। मेले के समय पुष्कर में कई संस्कृतियों का मिलन देखने को मिलता है। एक तरफ तो मेला देखने के लिए विदेशी सैलानी बडी संख्या में पहुंचते हैं, तो दूसरी तरफ राजस्थान व आसपास के तमाम इलाकों से आदिवासी और ग्रामीण लोग अपने-अपने पशुओं के साथ मेले में शामिल होने आते हैं। मेला रेत के विशाल मैदान में लगाया जाता है। ढेर सारी कतार की कतार दुकानें, खाने-पीने के स्टाल, सर्कस, झूले और न जाने क्या-क्या। ऊंट मेला और रेगिस्तान की नजदीकी है इसलिए ऊंट तो हर तरफ देखने को मिलते ही हैं। वर्तमान में इसका स्वरूप विशाल पशु मेले का हो गया है।

मनोरंजन
दिलचस्प ऊंट सौंदर्य प्रतियोगिता , सजे-धजे ऊंट का नृत्य, मटकीफोड़, लम्बी मूंछें और दुल्हन की प्रतियोगिताएं पर्यटकों का खूब मनोरंजन करती हैं। रात्रि में लोक कलाकारों के सुर-ताल की जुगलबंदी और रंगबिरंगे नृत्यों से पर्यटक आनन्दित होते हैं। अनेक प्रदर्शनियां भी सजाई जाती हैं। परेड और दौड़ को हजारों देशी और विदेशी पर्यटक रुचिपूर्वक देखते हैं। स्मृतियों को संजोने के लिए पर्यटक हर तरफ फ़ोटो खीचते नज़र आते हैं। पर्यटकों के लिए पुष्कर में सरोवर एवं कई मन्दिर भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

ब्रह्ममा मन्दिर
पुष्कर सुरण्य नागा पहाड़ की गोद में रेतीले धरातल पर बसा है। पुष्कर का महात्म्य वेद, पुराण, महाकाव्य, साहित्य, शिलालेख एवं लोक कथाओं में वर्णित है। पुष्कर को मंदिरों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ लगभग 500 मंदिर बताए जाते हैं। ब्रह्माजी का मंदिर देश भर में अकेला प्रसिद्ध मन्दिर है। धरातल से करीब 50 फीट की ऊंचाई पर स्थित मन्दिर के प्रवेश द्वार के भीतरी भाग पर ब्रह्मा का वाहन राजहंस है। प्रमुख मंदिर के गर्भगृह में ब्रह्मा जी की बैठी हुई मुद्रा में प्रतिमा स्थापित है। चतुर्मुखी इस प्रतिमा के तीन मुख सामने से दिखाई देते हैं। प्रतिमा को करीब 800 वर्ष पुराना बताया जाता है। सैंकड़ों वर्षों से प्रतिमा का प्रतिदिन जलस्नान व पंचामृत अभिषेक किया जाता है। मंदिर के आंगन में ब्रिटिशकालीन एक-एक रूपये के सिक्के जड़े हैं। संगमरमर के कलात्मक स्तंभ मोह लेते हैं। मंदिर परिक्रमा मार्ग में सावित्री माता का मंदिर स्थापित किया गया है। परिसर में अन्य मन्दिर भी दर्शनीय हैं।

पुष्कर सरोवर
अर्धचन्द्राकार पवित्र पुष्कर सरोवर प्रमुख धार्मिक पर्यटक स्थल है। यहां 52 घाट बने हैं, जिन पर 700 से 800 वर्ष प्राचीन विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर बनाए गए हैं। देश के चार प्रमुख सरोवरों में माना जाने वाला पुष्कर सरोवर की धार्मिक आस्था का पता इसी बात से चलता है कि यहां स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रातःकाल की वेला में जब सूर्योदय होता है तथा गोधूलि की वेला में जब सूर्यास्त होता है पुष्कर का दृष्य अत्यंत ही मनोरम होता है। इस दृष्य को देखने के लिए घाटों पर सैलानियों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा देखा जा सकता है।

वराह मन्दिर
प्राचीनता की दृष्टि से करीब 900 वर्ष पुराना वराह मंदिर का निर्माण अजमेर के चैहान शासक अर्णीराज ने कराया था। पुष्कर सरोवर के वराह घाट के पास स्थित वराह चौंक से एक रास्ता बस्ती के भीतर इमली मोहल्ले तक जाता है, जहां यह विशाल मंदिर स्थापित है। करीब 30 फुट ऊंचा मंदिर, चौड़ी सीढ़ियां तथा किले जैसा प्रवेश द्वार आकर्षण का केन्द्र है। बताया जाता है कि कभी मंदिर का शिखर 125 फीट ऊंचा था, जिस पर सोन चराग (स्वर्ण दीप) जलता था, जो दिल्ली तक दिखाई देता था। मुख्य मंदिर में विष्णु के अवतार वराह भगवान की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के नीचे सप्त धातु से निर्मित करीब सवा मन वजन की लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा है। यहीं पर बून्दी के राजा द्वारा भेंट किया गया लोहे का सवा मनी भाला रखा गया है। जलझूलनी ग्यारस पर लक्ष्मी-नारायण की सवारी धूमधाम से निकाली जाती है। चैत्र माह में वराह नवमी के दिन भगवान का जन्मदिन मनाया जाता है। जन्माष्टमी व अन्नकूट के अवसर पर उत्सव आयोजित किए जाते हैं। मंदिर में विशेष कर चावल का प्रसाद चढ़ता है। वराह घाट पर संध्या आरती का दृश्य देखे ही बनता है।

श्री रमा वैकुण्ठ मंदिर
ब्रह्मा जी के मंदिर के बाद इस मंदिर का विशेष महत्व है, जिसे रंगा जी का मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर करीब 20 बीघा भूमि पर बना है। मंदिर का प्रवेश द्वार आकर्षक एवं विशाल है। भीतर जाने पर सामने ही रमा वैकुण्ठ का मंदिर नजर आता है। मंदिर के ऊतंग गोपुरम पर 350 से अधिक देवताओं के चिन्ह बने हैं। यह गोपुरम दक्षिण भारतीय स्थापत्य कला शैली का अनुपम उदाहरण है। मंदिर के सामने प्रांगण में ही एक बड़ा स्वर्णिम गरूड़ ध्वज नजर आता है। मंदिर के पास अभिमुख गरूड़ मंदिर स्थापित है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ पक्के दालान के बीच में तीन-चार फीट ऊंचे चैकोर बड़े संगमरमरी चबूतरे पर मंदिर स्थित है। मुख्य प्रतिमा व्यंकटेश भगवान विष्णु की काले पत्थरों की आभूषणों एवं वस्त्रों से सुसज्जित है। इसी को वैकुण्ठ नाथ की प्रतिमा कहा जाता है। मंदिर मंे ही श्रीदेवी, तिरूपति नाथ, भूदेवी, लक्ष्मी व नरसिंह की मूर्तियां भी हैं। परिक्रमा मार्ग में दोनों तरफ दीवारों पर आकर्षक रंगीन चित्र एवं संगमरमर के कलात्मक स्तंभ बने हैं। सम्पूर्ण परिक्रमा मार्ग अत्यंत लुभावना लगता है।

रंगनाथ वेणुगोपाल मंदिर
दक्षिण भारत स्थापत्य शैली पर आधारित भगवान रंगनाथ वेणुगोपाल का विशाल मंदिर वराह चौंक के पास स्थित है। मंदिर का निर्माण दक्षिण भारत के एक सेठ पूरनमल गनेरीवाल द्वारा 1844 ईस्वी में करवाया गया था। मंदिर का गोपुरम और कलश दूर से ही नजर आता है। विशाल द्वार से अंदर प्रवेश करने पर पक्का दालान और कमरे बने हैं। यहीं पर उतंग स्वर्णिम गरूड़ ध्वज है, जिसके पास गरूड़ का छोटा सा मंदिर है, जो भगवान वेणुगोपाल की तरफ मुख किए हुए है। दांयी ओर मुख्य मंदिर की सीढ़ियां जाती हैं। गर्भगृह में बंशी बजाते हुए भगवान वेणुगोपाल की श्याम वर्ण की लुभावनी प्रतिमा है। मंदिर मकराना के श्वेत पत्थर से निर्मित है, जिसके दोनों ओर जय-विजय द्वारपाल हैं। इसी मंदिर में रूकमणी, श्रीकृष्ण, भूदेवी, सत्यभामा की पंचधातु की प्रतिमाएं हैं। चैत्र माह में भगवान रंगनाथ का विवाह उत्सव मनाया जाता है।

सावित्री माता मंदिर
पुष्कर में रत्नगिरी पर्वत शिखर पर ब्रह्मा मंदिर के पीछे सावित्री माता का मंदिर स्थापित है। दो किलोमीटर लम्बा मैदानी रास्ता पार करके पर्वत की सीधी चढ़ाई मंदिर तक जाती है। अब मार्ग में कुछ स्थानों पर पक्की सीढ़ियां भी बनाई गई हैं। जो दर्शनार्थी यहां तक पहुंचने में असमर्थ पाते हैं, उनके लिए ब्रह्मा मंदिर के पीछे की तरफ सावित्री माता का मंदिर स्थापित किया गया है।
सावित्री माता बंगालियों के लिए सुहाग की देवी है। सावित्री माता मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की अमावस के बाद वाली अष्टमी को मेला भरता है। इस मंदिर से पुष्कर का नयनाभिराम दृष्य दिखाई देता है। अब यहाँ तक जाने के लिए रोप-वे बन गया हैं।

बिहारी जी का मंदिर

वल्लभ संप्रदाय की पुष्टिमार्गीय शाखा का एकमात्र बिहारी जी का मंदिर है, जिसे बाईजी का मंदिर भी कहा जाता है। बिहारी जी का मंदिर टयूरिस्ट बंगले ‘सरोवर‘ के समीप स्थित है। मंदिर में राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं विद्यमान हैं। कृष्ण प्रतिमा श्याम स्वरूप में है, जिन्हें बिहारी जी कहा जाता है। पास में ही मदनमोहन और बालकृष्ण के गौरस्वरूप विग्रह हैं। पुष्टिमार्गीय भक्ति परम्परा में प्रतिमा को ही विग्रह कहते हैं। नागा पर्वत पर भी अनेक दर्शनीय मन्दिर हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवँ लेखक हैं व राजस्थान जनसंपर्क विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं)

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