मरते वक्त उस आदमी के पास कुल दो चीजें थीं। एक किट बैग। और एक छड़ी। और आज उसी आदमी की वजह से मिथिला के हजारों घरों में कागज, रंग और रोटी एक साथ आते हैं। उसने एक तेरह साल की लड़की से तीन तस्वीरें डेढ़ रुपये में खरीदी थीं। आज उसी लड़की के नाम के आगे पद्मश्री लिखा जाता है।

जितवारपुर। मधुबनी जिला। साठ का दशक।

एक गांव, जहां फसल जल चुकी थी और लोग दाने-दाने को मोहताज थे। उन्हीं दिनों उस इलाके में एक अफवाह दौड़ रही थी कि कोई बच्चों के सिर काट रहा है। लोग उसे मुड़ीकटवा कहते थे। डर इतना गहरा था कि कोई भी अजनबी चेहरा शक की चीज बन जाता था। और ठीक उन्हीं दिनों कच्ची सड़क पर एक गोरा-सा आदमी साइकिल चलाता हुआ गांव-गांव घूम रहा था। बच्चे उस पर ईंट-पत्थर फेंकते थे। कहीं-कहीं लोगों ने उससे बदतमीजी भी की। वह हर बार वापस आता था। वह आदमी न पुलिस का था, न ठेकेदार का। वह किसी से कुछ मांगने नहीं आया था। वह औरतों के दरवाजे पर जाकर एक ऐसी बात कह रहा था, जो उस वक्त की मिथिला में बेतुकी लगती थी कि जो चित्र आप अपनी दीवार पर बनाती हैं, वही कागज पर बना दीजिए, और मैं उसके बदले आपको पैसे दूंगा।

औरतें घर से बाहर नहीं निकलती थीं। पर्दा था। और पेंटिंग उनके लिए पूजा थी। पूजा के बदले पैसा लेना पाप था। तो जवाब हर घर से एक ही मिलता था।

न। उस आदमी की जिद का नतीजा आज आपके घर की किसी दीवार पर टंगा हो सकता है। मछलियां। कमल। दोहरी लकीरों का बॉर्डर। और खाली जगह से नफरत हर कोना भरा हुआ।

नाम मधुबनी पेंटिंग।

और वह आदमी भास्कर कुलकर्णी। मुंबई का कलाकार। महाराष्ट्र का आदमी। मैथिली का एक शब्द नहीं जानता था। और एक बात, जिस पर शायद किसी की नजर नहीं गई। आज जिस मधुबनी पेंटिंग पर पूरा बिहार गर्व करता है, उसका सारा व्यापारिक ढांचा जिस आदमी ने खड़ा किया, उसकी अपनी जीवनी आज तक ठीक से दर्ज नहीं हो पाई। जन्म का साल नहीं। परिवार का ब्योरा नहीं। कला जगत में वह हमेशा बाहरी रहा। आगे जो आप पढ़ेंगे, उसका बड़ा हिस्सा कला लेखक अशोक कुमार सिन्हा ने पद्मश्री बौआ देवी और पद्मश्री गोदावरी दत्त से बात करके दर्ज किया है। उस आदमी के जाने के लगभग सैंतीस साल बाद।

अब शुरू से शुरू करते हैं...मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में उन्होंने कमर्शियल आर्ट पढ़ी, और आखिरी साल में मन बदलकर फाइन आर्ट में चले गए। दोस्तों के घर तीन-चार दिन ठहरते, अपनी डायरी के पन्ने सुनाते, फिर निकल जाते। डायरी ही जैसे उनका घर थी।

फिर वे मुंबई के बुनकर सेवा केंद्र से जुड़े और ठाणे की तरफ के जंगलों में जाने लगे, जहां आदिवासी औरतें दीवारों पर सफेद रंग से आकृतियां बनाती थीं। आज उस कला को दुनिया वारली कहती है। वहाँ भी उन्होंने वही किया जो बाद में मिथिला में करने वाले थे दीवार को कागज पर उतारा, और उस कागज के लिए बाजार खोजा।

1964 में वे दिल्ली आ गए। हैंडीक्राफ्ट एंड हैंडलूम एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन में डिजाइनर।

और इन्हीं बरसों में मिथिलांचल में भीषण अकाल पड़ा। कहते हैं मधुबनी का मतलब होता है, शहद का वन। उस बरस उस वन में कुछ भी मीठा नहीं बचा था।

अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड की निदेशक पुपुल जयकर ने उन्हें मधुबनी भेजा। निर्देश साफ था वहां की परंपरागत कला को ऐसा रूप दो कि कलाकारों को पैसा मिले।

कागज पर उतारना सुनने में आसान लगता है। असल में वही सबसे मुश्किल हिस्सा था। दीवार पर रेखा ऊपर से नीचे की ओर आती है। हाथ पूरा खुलता है, कलाई नहीं मुड़ती, और इसीलिए उसमें एक लय बनी रहती है। कागज छोटा होता है। हाथ सिमट जाता है। वही रेखा टूट जाती है। तो पहले योग्य हाथ चाहिए थे। कुलकर्णी ने एक साइकिल खरीदी और जितवारपुर, रांटी, मंगरौनी गांव-दर-गांव भटकने लगे। किसी ने बताया कि जितवारपुर में एक बाल-विधवा रहती है, जिसकी दीवारों पर बने चित्र देखने लायक़ हैं।

अगले ही दिन वे उस कुटिया के दरवाजे पर थे। अंदर की मिट्टी की दीवारों पर रामायण और महाभारत के कथानक बने हुए थे। वे देर तक वहीं खड़े रहे। फिर उस औरत से अनुरोध किया कि बाजार से सस्ता कागज लाकर उस पर यही सब बना दीजिए, पैसे लेकर। उस बाल-विधवा का नाम जगदम्बा देवी था।

उसी गांव में एक और घर था, महापात्र परिवार का, जहां सीता देवी रहती थीं। वे ब्याह होकर जितवारपुर आई थीं। दोनों पहले झिझकीं। फिर मान गईं।

इन्हीं दिनों की एक और याद है, जो अब तक बची हुई है क्योंकि जिसने वह देखा, वह आज भी जिंदा है। जितवारपुर की बौआ देवी उस समय तेरह बरस की थीं। घर में चचेरे देवर का जनेऊ था, मंडप सजा था, और मंडप पर जगह-जगह चित्र बने थे उनकी चचेरी सास भुमा देवी के बनाए हुए।

कुलकर्णी वहीं आ गए। बौआ देवी के पास शंकर, दुर्गा और काली की तीन कलाकृतियां थीं, जो उन्होंने धागे से कढ़ाई करके बनाई थीं। कुलकर्णी ने तीनों डेढ़ रुपये में खरीद लीं। फिर वे एक हफ्ते मधुबनी रुककर दिल्ली लौट गए। कुछ महीनों बाद वे दोबारा आए। इस बार वे दिल्ली से हैंडमेड पेपर लेकर आए थे। और इस बार उन्होंने किसी सरकारी विश्रामगृह में डेरा नहीं डाला उन्होंने बौआ देवी की झोपड़ी को ही अपना अस्थायी ठिकाना बना लिया।

उसी कागज पर बौआ देवी ने दुर्गा, पार्वती और काली बनाईं। उन्हें पंद्रह रुपये मिले। रांटी की गोदावरी दत्त का बयान और भी साफ है। उन्होंने बताया है कि अकाल के दिनों में एक आदमी उनसे मिलने घर आया, नाम था भास्कर कुलकर्णी, पर लोकलाज के डर से वे उससे मिली ही नहीं। वह बार-बार आता रहा और चित्र के बदले पैसे लेने का आग्रह करता रहा। यह बात उन्हें बड़ी विचित्र लगती थी। आखिर उसकी जिद और जेठ के समझाने पर वे मिलीं।

उन्होंने आगे जो कहा, वह इस पूरी कहानी की सबसे साफ पंक्ति है उस समय मुझे क्या पता था कि मेरी पेंटिंग उनके माध्यम से विश्वविख्यात होगी। पर कुलकर्णी सिर्फ दलाल नहीं थे। वे कारीगर थे।

उन्होंने देखा कि औरतें रंग खुद बनाती हैं पीपल की छाल से भूरा, गुलाब से लाल, हरसिंगार की डंठल से नारंगी, सेम के पत्तों से हरा, और बरतन के नीचे जमी कालिख से काला। रंग सुंदर थे, पर टिकाऊ नहीं।

तो उन्होंने एक तरकीब दी। गोबर और मिट्टी के घोल में चारकोल पाउडर मिलाकर कागज पर लेप कर दो। इससे दो चीजें हुईं। पेंटिंग की उम्र बढ़ गई। और कागज पर वह हल्का मटमैला रंग आ गया, जो दीवार जैसा लगता है। मिथिला के कलाकार आज भी वही तकनीक इस्तेमाल करते हैं।

फिर वे चित्र दिल्ली गए। जनपथ स्थित सेंट्रल कॉटेज इंडस्ट्रीज एम्पोरियम में उनकी प्रदर्शनी लगी, जिसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया।

और उसके बाद जो हुआ, वह मिथिला की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा मोड़ है। जो हुनर सदियों से दीवार के साथ बरसात में धुल जाता था, उसकी क़ीमत लगने लगी।

अब कहानी का वह हिस्सा, जो सबसे कम लिखा गया है।

उस वक़्त तक यह चित्रकला ब्राह्मण और कायस्थ घरों तक सीमित थी। पर कुलकर्णी की नजर वहां भी गई जहां किसी की नहीं जाती थी।

मधुबनी की एक दलित औरत मिट्टी के भित्ति-चित्र बनाती थीं। नाम यमुना देवी। उन्हें कागज पर काम करने के लिए उकसाया गया। उन्होंने कागज को गोबर के घोल से धोकर उस पर होली के रंगों से चित्र बनाए वही होली के रंग, जिनका इस्तेमाल तब तक ऊंची जातियों के घरों तक सीमित था। वह एक नई शैली की शुरुआत थी।

आज उसी परंपरा से निकली एक और चीज दुनिया भर में जाती है गोदना। शरीर पर गुदे जाने वाले निशान, जो कागज पर उतर आए।

और आज उसी गोदना शैली के लिए मधुबनी जिले की शांति देवी पासवान और शिवन पासवान को पद्मश्री मिल चुका है। दोनों दुसाध समाज से हैं। दोनों ने मिलकर बीस हजार से ज्यादा कलाकारों को यह कला सिखाई है।

जिस समाज को कभी देवताओं के चित्र बनाने से रोका गया था, उसके हाथ का काम आज दुनिया के सामने भारत की तरफ से रखा जाता है।

कुलकर्णी की आँख कितनी बारीक थी, इसका सबसे अच्छा प्रमाण चित्रकार ए. रामचंद्रन के एक संस्मरण में है। उन्होंने लिखा है कि भास्कर ने उन्हें गंगा देवी और सीता देवी के चित्रों का सूक्ष्म फर्क़ समझाया कि एक साधारण रेखा भी कितने अलग-अलग तरीक़ों से खींची जा सकती है, और गंगा देवी के चित्रों में किसी भी रेखा की पुनरावृत्ति नहीं है। रामचंद्रन ने यह भी लिखा कि भास्कर ने जो बारीक़ियाँ देखी थीं, वे किसी नामचीन कला समीक्षक के लिए देख पाना भी मुश्किल था।

छह-सात साल तक वे दिल्ली और मधुबनी के बीच आते-जाते रहे। फिर एक दिन आना बंद हो गया।

कहते हैं कि उन्होंने दीक्षा ले ली और नर्मदा के किनारे साधना में चले गए। क्यों गए, यह किसी को ठीक-ठीक मालूम नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि जीवन के अकेलेपन से ऊब चुके थे। और फिर 1982 में मिथिला ने उन्हें दोबारा देखा।

जो आदमी पहली बार सूट-बूट में आया था, इस बार कमर में सफेद धोती थी, गोल गले की गंजी थी, बाल बिखरे थे और दाढ़ी बढ़ी हुई थी।

बौआ देवी ने बताया है कि उनके हाथ में फूटी कौड़ी तक नहीं थी। पूछने पर वे सिर्फ इतना कहते थे सब कुछ लुट गया। वे लगातार खांस रहे थे। बाद में पता चला कि क्षय रोग है, और बहुत बढ़ चुका है।

बौआ देवी का परिवार तब तक बड़ा हो चुका था, इसलिए वे कुछ क़दम दूर दुखनी देवी के घर रहने लगे। पर दिन उनका बौआ देवी के आम के बगीचे में ही कटता था।

कभी तालाब के किनारे बैठकर ध्यान। कभी मिथिला शैली में गणपति का एक चित्र। रुग्ण शरीर, और हाथ में वही क़लम।

उन्हें अपनी मौत का आभास हो चुका था। उन्होंने सीता देवी के बेटों से कह दिया था कि जब मैं मरूँ तो मेरा दाह-संस्कार इसी बगीचे में करना। और यह कहते हुए उन्होंने जमीन पर एक जगह चुनकर वहां एक ईंट गाड़ दी थी।

हालत बिगड़ती गई। जब खाट से उठना बंद हो गया, तो जितवारपुर के कलाकार उन्हें उठाकर लहेरियागंज के सरकारी अस्पताल ले गए।

जनरल वार्ड। करीब डेढ़ महीने इलाज चला। गांव के कलाकार हर रोज खबर लेने पहुंचते रहे।

24 अप्रैल, 1983।

पैंतालीस साल की उम्र में वे चले गए। संपत्ति के नाम पर एक किट बैग और एक छड़ी। उनके भाई और भतीजा वही दो चीजें निशानी के तौर पर साथ ले गए।

खबर सुनकर चित्रकार मनु पारेख उनके भाई और भतीजे के साथ जितवारपुर पहुंचे। बौआ देवी ने बताया है कि गाँव में घुसते ही वे बच्चों की तरह सुबक-सुबक कर रोने लगे थे, और बहुत मुश्किल से चुप हुए। उनकी आखिरी इच्छा पूरी नहीं हो सकी। दाह-संस्कार दरभंगा में हुआ।

अब समझिए कि यह कहानी असल में किस बारे में है।

यह कला की कहानी नहीं है। कला तो पहले से थी, सैकड़ों साल से थी, हर बरसात में दीवार के साथ बह जाती थी और अगली बार फिर बन जाती थी।

यह उस आदमी की कहानी है जो बंद दरवाजे पर बार-बार लौटा। पत्थर खाकर लौटा। दुत्कार खाकर लौटा। शक की नजरों में लौटा। और जिस दिन दरवाजा खुला, उस दिन उसने अपना नाम उस दरवाजे पर नहीं लिखा।

मैं दरभंगा का हूं। बचपन में मिथिला के चित्र मेरे लिए कोई कला नहीं थे, वे बस घर की दीवार थे। अठारह साल खबरें लिखने के बाद मुझे यह पता चला कि उन दीवारों को कागज पर उतारने वाला आदमी महाराष्ट्र से आया था, और उसका दाह-संस्कार मेरे अपने शहर में हुआ था।

अब आज की मिथिला देखिए।

जितवारपुर देश का संभवतः पहला गांव है जहां से तीन कलाकारों को पद्मश्री मिला जगदम्बा देवी, सीता देवी और बौआ देवी। दस लोगों को राष्ट्रीय पुरस्कार और साठ के क़रीब को राज्य पुरस्कार। सीता देवी ने अपनी शोहरत का इस्तेमाल अपने लिए नहीं किया। उन्होंने उसे गाँव के लिए खर्च किया सड़क, बिजली के खंभे, स्कूल। और लगभग एक हजार लोगों को यह कला सिखाई।

बिहार सरकार के अपने आंकड़े कहते हैं कि आज मिथिला पेंटिंग बीस से पच्चीस हजार कारीगर परिवारों को आजीविका दे रही है।

2007 में इस कला को जीआई टैग मिला। मधुबनी रेलवे स्टेशन की दीवारें स्थानीय कलाकारों ने खुद रंगीं हजारों वर्गफुट, बिना पैसे लिए।

जापान के बर्फीले इलाक़े तोकामाची में एक बंद पड़े प्राइमरी स्कूल को एक जापानी संगीतकार ने मिथिला संग्रहालय में बदल दिया, और आज वहां दुनिया के सबसे बड़े मिथिला संग्रहों में से एक है। गंगा देवी वहां काम करने गई थीं।

पिछले महीने, स्वतंत्रता दिवस के दिन, मधुबनी में रामायण पर आधारित एक सौ आठ मीटर लंबी मिथिला पेंटिंग बनी और विश्व रिकॉर्ड में दर्ज हुई। उसी दिन कलाकारों के लिए एक ई-कॉमर्स पोर्टल भी शुरू हुआ, ताकि गांव का चित्र सीधे विदेश के खरीदार तक जाए।

दिल्ली में ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन है। राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय में इस वक़्त 'मिथिला की लोक परंपरा' नाम की एक प्रदर्शनी लगी हुई है। इकतीस कलाकार। चौंसठ कलाकृतियाँ। उनमें एक कृति पद्मश्री बौआ देवी की है।

वही बौआ देवी।

जिसकी तीन तस्वीरें एक अजनबी ने डेढ़ रुपये में खरीदी थीं, जब वह तेरह बरस की थी।

और उसी गैलरी में राजा सलहेस के चित्र भी टँगे हैं दुसाध समाज के अपने देवता। उसी समाज के, जिसे कभी देवताओं के चित्र बनाने से रोका गया था।

साठ बरस पहले जिस दरवाजे पर एक आदमी को पत्थर पड़े थे, आज उस दरवाजे के भीतर की कला दुनिया के सामने भारत की तरफ से खड़ी है। और ठीक इसी हफ्ते, सत्रह सितंबर को, पूरे मिथिला और बंगाल में विश्वकर्मा पूजा है। उस दिन लोग अपने औजार पूजते हैं। मशीन, हथौड़ा, गाड़ी, कलम।

मिथिला में सबसे ज्यादा जिस औजार ने बदलाव किया, वह एक साइकिल थी।

उस पर किसी ने कभी फूल नहीं चढ़ाए।

हर बड़ा बदलाव किसी ऐसे आदमी से शुरू होता है, जिसे उस वक्त गांव पागल समझ रहा होता है।

भास्कर कुलकर्णी ने असल में तीन काम किए, और तीनों आज भी किसी के काम आ सकते हैं। एक। उन्होंने हुनर को नया बाजार नहीं दिया, नया माध्यम दिया। दीवार से कागज पर। जो चीज बिक नहीं पा रही, अक्सर उसमें खराबी नहीं होती उसका माध्यम गलत होता है।

दो। उन्होंने पहली मुलाक़ात में सौदा नहीं किया। पहले वे सुनते रहे, देखते रहे, बार-बार लौटे। भरोसा बनने में महीनों लगे, और वही भरोसा साठ साल चला।

तीन। उन्होंने अपना नाम काम पर नहीं लिखा। चित्रों पर उन औरतों के नाम गए, जिन्होंने उन्हें बनाया था। इसीलिए यह कला किसी एक आदमी के साथ खत्म नहीं हुई।

यह कहानी उस इंसान तक पहुंचनी चाहिए जो आज किसी बंद दरवाजे के सामने खड़ा है और सोच रहा है कि अब आखिरी बार जाकर क्या फायदा।

इस पन्ने पर कोई काल्पनिक कहानी नहीं छपती। हर नाम असली है, हर तारीख जांची हुई, और जहां रिकॉर्ड खामोश है वहां मैं भी खामोश रहता हूं।

आज दिल्ली में उस कला के सामने दुनिया खड़ी है। और जितवारपुर के उस आम के बगीचे में एक ईंट अब भी जमीन में गड़ी हुई है, जिस पर कोई नाम नहीं लिखा।

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