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वैदिक अग्निहोत्र क्रिया ११: पञ्चाहुत्या=शुद्ध घृत की पांच आहुतियाँ

विगत मन्त्रों के माध्यम से हमने चार मन्त्रों के द्वारा घी से सनी हुई तीन समिधाएं यज्ञ कुण्ड में उस स्थान के ऊपर रखीं, जहाँ अग्नि जल रही थी, ताकि यह घी से सनी हुई समिधाएँ शीघ्र ही अग्नि को पकड़ लें| अब हम यज्ञ की अगली ग्यारहवीं क्रिया के साथ आगे बढ़ते हुए एक ही मन्त्र को पांच बार बोलते हुए प्रत्येक मन्त्र के अंत में स्वाहा बोलने के साथ ही एक एक आहुति गर्म घी की डालते जावेंगे| मन्त्र इस प्रकार है:-दशम विधि के अंतर्गत हमने तीन समिधाओं को चार मन्त्रों का उच्चारण करते हुए स्वाहा के साथ यज्ञ की अग्नि को भेंट किया था|

ओम् अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्व वर्धस्व चेद्धवर्धय
चास्मान् प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन समेधय, स्वाहा| इदमग्नये
जातवेदसे, इदन्न मम||१||
आश्वलायन गृह्य. १.१०.१२

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आश्वलायन गृह्यसूत्र में से लिया गया यह मन्त्र वैदिक अग्निहोत्र की दशम क्रिया समिधानम् के अंतर्गत प्रथम मन्त्र तथा प्रथम समिधा डालने के रूप में भी आया है किन्तु जब हम इस मन्त्र को ग्यारहवीं क्रिया के रूप में प्रयोग करते हैं तो इस मन्त्र को इस क्रिया के अंतर्गत पांच बार बोलना होता है और पांच बार ही इस मन्त्र के स्वाहा के साथ एक एक करते हुए उबलते हुए देशी गाय के देशी घी की आहुतियाँ दी जानी होती हैं|

वैदिक अग्निहोत्र की दशम विधि के अंतर्गत हमने चार मन्त्रों के गायन के साथ स्वाहा आने पर गर्म घी से डुबोई गई समिधा डालते हुए तीन समिधायें यज्ञ कुण्ड में डालीं थीं| यहाँ गयाराह्वीं क्रिया के अंतर्गत हमने देखा कि समिधायें तो हमने रख दीं किन्तु यह धीरे धीरे अग्नि को पकड़ती जा रही हैं| कहावत है एक तो आग ऊपर से घी इस कहावत से भाव होता है कि जलाई आग में घी डालने से आग और तीव्र जलती है| यज्ञ की अग्नि भी तीव्र से तीव्रतर जलनी चाहिए, इसलिए इस गयाराह्वीं क्रिया के अंतर्गत हम यज्ञ में केवल घी की ही आहुतियाँ देते हैं ताकि इस घी की सहायता से अग्नि अपना तीव्र वेग दिखाने लगे| तीव्र वेग में दी गई आहुतियाँ एक दम से हल्की हो कर वायुमंडल में दूर दूर तक फ़ैल जाती हैं|

इस प्रकार दूर दूर तक जहाँ तक यह जा पाती है, वहां तक के सब प्रकार के दुर्गंधों को यह दूर करती हुई वातावरण को सुगन्धित करती है| घी की पौष्टिकता से वातावरण भी पौष्टिक हो जाता है| इस पौष्टिक वातावरण में जब हम श्वास लेते हैं तो हमारा शरीर इस पुष्टि वर्धक वायु का सेवन करते हुए पुष्टि को प्राप्त होता है| यज्ञ की यह वायु एक और काम करती है| यह वायु वातावरण में जहाँ जहाँ भी जाती है, वहां वहां से यह रोग के कीटाणुओं का नाश करती है| इस प्रकार रोगरहित वायु का सेवन करते हुए हम शुद्ध रोग रहित वायु को प्राप्त करते हैं और इस वायु के सेवन से हमारे अन्दर के रोगाणु भी नष्ट हो जाते हैं| इस प्रकार हम रोग रहित हो जाते हैं|

इस मन्त्र का विशद् अर्थ हम दशम विधि के अंतर्गत दे आये हैं, यहाँ उसे ही एक बार फिर से दोहरा देते हैं ताकि आप सब इसे आत्मसात् कर सकें| इस मन्त्र में श्ब्दानुसार अर्थ इस प्रकार है:-
जातवेद: अयं इध्म: ते आत्मा
हे सब ऐश्वर्यों के स्वामी प्रभो! यह काष्ठ तेरा आत्मा है| यहाँ काष्ठ से अभिप्राय: लकड़ी की समिधा से है| यहाँ हम यज्ञ की अग्नि को तीव्र करने के लिए कार्य कर रहे हैं और यह तीव्रता घी से सनी हुई लकड़ी ही दे सकती है| इस कारण यह लकड़ी इस यज्ञ स्वरूप प्रभु की आत्मा कही गई है| यह काष्ठ ही तेरा(यज्ञ का) जीवन भी है| अग्नि का अस्तित्व लकड़ी के बिना संभव ही नहीं होता इसलिए यहाँ इस यज्ञ में डाली जाने वाली समिधा को अग्नि स्वरूप प्रभू का जीवन कहा गया है|

तेन इध्यस्व च वर्धस्व
इस प्रकार अग्नि स्वरूप परमात्मा को यहाँ सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि यह जो( लकड़ी की समिधा) घी से पूरी तरह से लिपटी हुई है, आप इस समिधा के द्वारा प्रकाशित हों अर्थात् यह समिधा यज्ञ की इस अग्नी को तीव्रता दे|

इत्-ह अस्मान् च वर्धय
अग्नि का काम है, इस के अन्दर जो भी डाला जावे, उसके गुणों को बढ़ा कर लौटा देवे अर्थात् इन गुणों को वायुमंडल में, परयावरण में फैला देवे ताकि इनका लाभ जन सामान्य अथवा प्राणी मात्र को बिना कसी प्रकार का भेदभाव किये मिल सके| इस कारण यहाँ कहा गया है कि हे अग्नि देव! यज्ञ में डाली इस समिधा अथवा गर्म उबलते हुए घी की आहुतियों के द्वारा न केवल आप ही प्रचंड होकर बढ़ें अपितु हमें भी आगे बढ़ने के लिए अपने साथ ले चलें अथवा हमें मार्ग दिखावें|

प्रजया पशुभि: ब्रह्मवर्चसेन अन्नाद्येन सम-एधय
इस के साथ ही हम अग्निदेव से एक याचना इस आहुति के माध्यम से और भी करते हैं, वह यह कि प्रजा अर्थात् इस जगत् में तेरी प्रजा स्वरूप जितनी भी जीवात्माएं हैं| इन जीवात्माओं में चाहे कोई मनुष्य है, पशु है या अन्य किसी प्रकार का कोई भी प्राणी है, इन सब के अन्दर ज्ञान का तेज भर दो| भाव यह है कि इस यज्ञ को करने से सब प्राणियों की बुद्धि तीव्र हो| केवल बुद्धि ही तीव्र न हो अपितु हे अग्निदेव! इन सब प्राणियों का हाजमा भी अच्छा हो| यदि हाजमा अच्छा रहेगा तो ही यह जो कुछ भी उपभोग करेंगे, चाहे वह क्षुधा को शांत करने के लिए हो अथवा बौद्धिक हो, को पचा पाने में और समझ पाने में सक्ष्म हो सकेंगे| इस प्रकार प्रकांड पंडित बनकर तथा प्राप्त किये हुए को पचा पाने में अथवा सम्भाल पाने में सक्ष्म हो सकें|

स्वाहा इदं जातिवेदसे अग्नये मम न
हे अग्नि देव! हम अपने मन, वचन और कर्म से यह ठीक ही कह रहे हैं कि यह जो काष्ठ रूप समिधा अथवा देशी गाय के शुद्ध देशी घी को आप के समर्पण कर रहे हैं, यह वास्तव में ही सब प्रकार के धनों के स्वामी अग्निदेव के लिए ही समर्पित है| इस पर मेरा कुछ भी, किसी प्रकार का भी अधिकार नहीं है|

इस सब से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि अग्नि वास्तव में सब प्रकार के ऐश्वर्यों का मुख होता है| देवता लोग अग्नि रूपी मुख से ही सब कुछ खा पाते हैं किन्तु हमारा यह यज्ञ करने वाला साधक तो परम अग्नि को प्राप्त करने की चाहना रखता हुआ वह परमात्मा का ध्यान करते हुए आत्म चिन्तन कर रहा है| उसके इस आत्म चिन्तन का आधार इस काष्ठ तथा घी से प्रचंड रूप से जलने वाली यह आग ही तो है| इस के उल्ट वह परमात्मा रूप अग्नि, जिसे हम परम अग्नि के नाम से जानते है, वह अग्नि तो इस संसार के कण कण में, अनु अनु में, पत्ते पत्ते में व्याप्त है| इन सबका आधार वह अग्नि बनी हुई है| शुद्ध जीवन जिसे आर्य जीवन के नाम से जाना गया है, यह तो केवल सांसारिक ही नहीं पारलौकिक ऐश्वर्यों को पाने की ही सदा कामना करता रहता है| साधक ने समय समय पर जितनी साधना की होती है उसके अनुसार उसकी रुचियों में भी परिवर्तन होता रहता है| जिस प्रकार स्कूल में पढ़ने वाले बालक की योग्यता के अनुसार कक्षाएं बदलती रहती हैं तो इनके साथ ही उसकी सोच भी बदलती है, यह अवस्था ही साधक और उसकी की जा रही साधना की भी होती है, तो भी साधारण अवस्था में प्रत्येक मनुष्य की सदा यह इच्छा तो कम से कम होनी ही चाहिए कि उसका शरीर स्वस्थ तथा उन्नत हो, उसका ज्ञान निरंतर बढ़ता रहे, उसको सब ओर से यश की प्राप्ति हो तथा सदा ही सब का उपकार करता रहे| यह भावनाएं आहुति देते समय आत्मसमर्पण के भाव से की जाती है| यह आहुतियाँ स्वर्ग प्राप्ति का साधन स्वरूप समझते हुए देनी चाहियें|

व्याख्यान
यह जगत् परमपिता परमात्मा की रचना है| उसकी रची हुई इस रचना में जितने भी छोटे अथवा बड़े प्राणी हैं, सब कुछ न कुछ देने वाले होने के कारण देवता स्वरूप ही माने जाते हैं और इस धारणा के अनुसार सब देवता अपने अपने ढंग से यह अग्निहोत्र तथा यज्ञ कर रहे हैं| जब विश्व के सब प्राणी यज्ञ की आहुतियाँ डाल रहे हैं तो क्या कारण है कि मैं यह आहुतियाँ देते हुए इसे अपना मानते हुए तुच्छ क्यों बनूँ? इस तुच्छता की भावना से ऊपर उठ कर क्यों न इन देवताओं के यज्ञ करने वाली इस मंडली के ही साथ मिल जाऊं? इस अग्निहोत्र को अपनी तुच्छ आहुति भेंट करते हुए मेरी यह अवस्था हो कि मैं एक हाथ से जो भी आहुति डालूं, उसका मेरे दूसरे हाथ तक को भी पता न चल पावे| हे पिता! मेरे अन्दर त्याग का यह भाव पैदा करो|

डॉ.अशोक आर्य
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