ग्रीष्म ऋतु में जेठ अर्थात मई/जून का महीना आते ही गांवों के सार्वजनिक मंदिर सिद्ध स्थलों पर प्रायः यह दृश्य आम हो जाता है जिसमें कोई गांव का तथाकथित ओझा , भगत या बाबा जी अपने चारों ओर आस पास उपले लकड़ी आदि का ईंधन जलाकर दहकते अंगारों के बीच में दोपहर के कुछ घंटे बैठकर कथित तौर पर तपस्या करते है और उस गांव व आसपास के श्रद्धालु उसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं ,जिसमें महिलाएं मुख्यता से होती है।
इस पूरे क्रियाकलाप को अग्नि तपस्या तो कहीं-कहीं पंचाग्निनी तप कहा जाता है।
ऐसा करना क्या धार्मिक आध्यात्मिक क्रियाकलाप है या महज यह आडंबर मात्र है यह समझने से पूर्व या किसी भी निष्कर्ष से पहुंचने से पहले हम तप के शास्त्रीय वैदिक स्वरूप को समझते हैं ।
तप का उलेख महर्षि पतंजलि के योग दर्शन, उपनिषदों आदि में व्यापकता से मिलता है।
महर्षि वेदव्यास योग दर्शन के साधन पाद में लिखते है ।
नातपस्विनो योग: सिध्यति। तच्च चिक्त प्रसादन मबाधमानमनेना सेव्यमिति अर्थात अतपस्वी व्यक्ति का योग सिद्ध नहीं होता।योग अभ्यासी वह तप करें जिससे इंद्रिय व मन के दोष नष्ट हो जाए योग साधक के मन की प्रसन्नता बनी रहे उसके शरीर में पीड़ा व्याधि उत्पन्न न हो। महर्षि व्यास ने तप की सीमा बांध दी है शरीर व मन को पीडा देने वाला व्याधि उत्पन्न करने वाला कोई भी क्रियाकलाप तप नहीं हो सकता।
महर्षि ने तप को क्रियायोग का मुख्य अंग माना है तप की गणना महर्षि ने अष्टांग योग के नियम अंग में पृथक से की है।
महर्षि पतंजलि के अनुसार अविद्या को नष्ट करने के लिए क्लेशों को दग्धबीज करने के लिए समाधि में ईश्वर साक्षातकार करने के लिए जो जो जप तप अध्ययन योगाभ्यास किया जाता है उन कार्यों को भूख- प्यास, मान -अपमान , लाभ- हानि आदि द्वंदों को सहते हुए पूरी निष्ठा से श्रद्धा से पालन करना तप है।
तैक्तिरीय उपनिषद में सत्य बोलना, इंद्रियों मन को बुराइयों से रोकना, मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करना तप माना गया है अध्याय 10 श्लोक 8 में।
महर्षि दयानंद के अनुसार- यथार्थ सुद्धभाव से सत्य मानना सत्य बोलना, सत्य करना, मन को अधर्म में न जाने देना, इंद्रियों को अन्याय आचरण में जाने से रोकना, मन शरीर से शुभ कर्मों का करना ,वेद आदि सत्य विद्याओं का पढ़ना पढ़ना, वेद अनुसार आचरण करना आदि उत्तम धर्मयुक्त कर्मों का नाम तप है ,धातु को तपा के चमड़ी को जलाना तप नहीं कहाता ।
आज तप के नाम से हम जो क्रिया देखते हैं यह विकृत स्वरूप प्राचीन मोक्ष शास्त्रों यहां तक की कर्मकांड के ग्रन्थों में भी नहीं मिलता यज्ञों का विधान करने वाले श्रोतादि सूत्रों में जो तप का उल्लेख मिलता है वह इस तथाकथित तप से भिन्न है। वहां नित्य दैनिक अग्निहोत्र करने वाला अग्निहोत्री तप करने वाला माना गया है। श्रौत यज्ञ के विविध कुंड में आहुति क्रिया करने का विधान मिलता है वायु जल की शुद्धि , पुण्य अदृष्ट के निर्माण के लिए आध्यात्मिक क्रियाकलापों के प्रतीकात्मक कर्मकांड को वहां तप माना गया है। संभवतः ऋषियों के यज्ञीय विधान को न समझकर उपला आदि ईधन को जलाकर बैठ जाने की विकृत परंपरा कर्मकांड को ना समझने के कारण हुई ऐसी विद्वानों की मान्यता है लेकिन मूल परंपरा में ईंधन को जलाकर चमड़ी को तपाने का कोई विधान नही है।
आज जिसे अग्नि तपस्या माना जा रहा है यह मध्यकाल में उपजा पाखंड है वैदिक धर्म संस्कृति में अध्ययन -अध्यापन ,मन आदि पर नियंत्रण को तप माना गया है । शरीर को धर्म अर्थ का मोक्ष का मुख्य साधन माना गया है। शरीर को दिव्य नौका, देवों की पूरी अयोध्या की उत्तम संज्ञा दी गई अथर्ववेद कठोपनिषद में ।शरीर की रक्षा के लिए आयुर्वेदिक शास्त्र रचे गए हैं ना कि शरीर को मुर्खता युक्त कार्यों में नष्ट करके सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने को तप की संज्ञा दी गई है ।दरअसल आज जिन सिद्ध स्थलों पर यह पाखंड होता है इसका मूल कारण यह है वहां महंत पुजारी प्रायः अनपढ़ होते हैं शास्त्रों से अनभिज्ञ होते हैं। इनमें से अधिकांश भांग आदि का सेवन करते हैं।वह शास्त्रो के गूढ सिद्धांतों वैदिक वांगमय व्याकरण दर्शन आदि से परिचित नहीं होते । कभी-कभी ना चाहते हुए भी अपनी लोक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए उन्हें इस पाखंड को करना पड़ता है तो कभी-कभी जानबूझकर वह गुरुडम रचते हैं जनता को ठगने के लिए इसके साथ ही माल चढ़ावे की आवक को वर्ष के शेष महीनों के लिये सुनिश्चित किया जाता है।
कितने ही महंत डिहाइड्रेशन से मर भी जाते हैं। कहावत है "मरे हुए बाबा की मूंछ बढ़ा दी जाती है" यह विकृति ओर बढ़ जाती है।
उपनिषदों ,दर्शन शास्त्रों के ऋषियों याज्ञवल्क्य, कपिल ,जैमिनी, गौतम, महर्षि वेदव्यास आदि ऋषियों के काल में ऐसी कोई तप के नाम पर विकृति प्रचलित नही थी।यहां तक की महाभारत रामायण में भी ऐसे किसी तप के नाम पर होने वाले विकृत क्रियाकलाप का विधान नही मिलता है वहां सत्य के पालन ब्रह्मचर्य, यम नियमों के सेवन,अतिथि ,संन्यासी ,वृद्धो की सेवा अपने अपने आश्रम धर्म के पालन को परम तप माना गया है।
गंगा पुत्र भीष्म ने अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर को जो उपदेश दिये उनमें भी ऐसे किसी तप का उल्लेख नहीं मिलता न हीं मनुस्मृति आदि ग्रंथों में।
यह केवल दिखावटी उत्सव मात्र है। विधर्मियों को मजाक बनाने का अवसर प्रदान करना मात्र है।आये ऋषियों द्वारा अनुमोदित प्रचारित तप के वैदिक निर्दोष स्वरूप को आचरण में लायें सच्चा आत्मिक लाभ शांति प्राप्त करें।
लेखक आर्य सागर खारी





