एक तरफ पाकिस्तान और अरब देश इज़राइल को एक देश के रूप में मान्यता देने की सोच रहे हैं- वे जो दशकों से इज़राइल को एक राज्य के रूप में मान्यता देने से इनकार करते आए थे — अब अब्राहम समझौतों और उनसे परे की कूटनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से इज़राइल की संप्रभुता को स्वीकार करने की दिशा में धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं

दूसरी तरफ इंडिया और भारत की पहचान के एक देश के रूप में वर्जित या निषिद्ध करने की भी एक गुपचुप कोशिश हो रही है।

विकिपीडिया की अधिकतर कोशिश भारत को भारत न कहकर साउथ एशिया कहने की है। विकिपीडिया आज विश्व का सर्वाधिक देखा जाने वाला संदर्भ स्रोत है। किन्तु इसकी 'तटस्थता' की आड़ में एक सुसंगत प्रवृत्ति दिखती है। भारत से सम्बन्धित अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक लेखों में 'India' की बजाय 'South Asia' या 'South Asian subcontinent' पदावली का अत्यधिक और असंगत प्रयोग होता है।

उदाहरण के लिए, वैदिक सभ्यता, बौद्ध धर्म, मौर्य साम्राज्य, या हिन्दू दर्शन से सम्बन्धित लेखों की भूमिकाएँ प्रायः 'the Indian subcontinent' या 'South Asia' से आरम्भ होती हैं — न कि 'India' से। जबकि उसी काल और स्थान को यूनानी लेखकों ने 'Indica' कहा, फ़ारसी ग्रन्थों में 'हिन्द' लिखा गया, और अरबी भूगोलवेत्ताओं ने 'al-Hind' से सम्बोधित किया। 'साउथ एशिया' एक बीसवीं सदी का भू-राजनीतिक निर्माण है — जो शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी क्षेत्रीय अध्ययन (Area Studies) परम्परा की देन है।विकिपीडिया पर यह पैटर्न यादृच्छिक नहीं है। इसके सम्पादकीय समुदाय में एक सुव्यवस्थित विचारधारात्मक झुकाव है जो भारत-केन्द्रित वर्गीकरण को 'राष्ट्रवादी पूर्वाग्रह' मानता है और 'क्षेत्रीय' दृष्टिकोण को 'वैज्ञानिक तटस्थता'। किन्तु प्रश्न यह है कि जब चीन के बारे में लेख 'China' से आरम्भ होते हैं, जापान के बारे में 'East Asia' नहीं बल्कि 'Japan' लिखा जाता है — तो भारत के लिए यह अपवाद क्यों?

कई अमेरिकी विश्वविद्यालयों के विमर्शों में यह पैटर्न उभरता दिखता है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में 'South Asian Studies' विभागों का उदय 1950-60 के दशक में हुआ — उसी काल में जब अमेरिका अपनी वैश्विक प्रभुसत्ता को बौद्धिक ढाँचा देने में जुटा था। कोलम्बिया, शिकागो, पेनसिल्वेनिया, और टेक्सास विश्वविद्यालयों के दक्षिण एशिया केन्द्र आज भी भारत को एक ऐसे क्षेत्र के हिस्से के रूप में पढ़ाते हैं जिसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका सब बराबर हैं।
इस ढाँचे की समस्या यह है कि यह भारत की उस ऐतिहासिक केन्द्रीयता को मिटाता है जो वास्तविक है। बौद्ध धर्म का उद्गम, संस्कृत का प्रसार, मौर्य और गुप्त साम्राज्यों का विस्तार, इन सबका केन्द्र 'साउथ एशिया' नहीं, भारत था। जब हार्वर्ड का 'South Asia Initiative' भारतीय दर्शन को 'South Asian thought' कहता है, तो यह मात्र शब्दावली नहीं — यह ज्ञान की उत्पत्ति को भूगोल में घोलने का प्रयास है। इससे भी अधिक चिन्ताजनक यह है कि कई अमेरिकी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भारतीय मुसलमान, दलित, या पाकिस्तानी — सभी को एक साझा 'South Asian identity' दी जाती है। इस प्रक्रिया में भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक विशिष्टता का सचेत विलोपन होता है। शोधकर्ता विजय प्रसाद जैसे विद्वान इस 'साउथ एशियन' पहचान को प्रगतिशील राजनीति का औज़ार बताते हैं — किन्तु यह औज़ार उसी भारत की राष्ट्रीय सत्ता को क्षरित करता है जिसकी बहुलता का वे उत्सव मनाते हैं।

कई कंपनियाँ ऐसा कर रहीं हैं। वैश्विक कम्पनियों में 'South Asia' एक मानक क्षेत्रीय इकाई बन चुकी है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेज़न — सभी के संगठनात्मक ढाँचे में 'South Asia Region' एक श्रेणी है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भारत की बाज़ार में प्रधानता — जो जनसंख्या, GDP और डिजिटल उपभोक्ताओं के आधार पर स्पष्ट है — को पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ एक टोकरी में रख दिया जाता है। यह वर्गीकरण निर्दोष नहीं है। जब किसी कम्पनी की नीति 'South Asia' के लिए बनती है, तो वह भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक संवेदनाओं को अनदेखा कर सकती है। कन्टेन्ट मॉडरेशन नीतियाँ, भाषाई प्राथमिकताएँ, और यहाँ तक कि विज्ञापन लक्ष्यीकरण — सब में यह अस्पष्टता हानिकारक हो सकती है। लिंक्डइन और इंडीड जैसे प्लेटफार्मों पर जब किसी भारतीय पेशेवर की प्रोफ़ाइल 'South Asia' में वर्गीकृत होती है, तो नियोक्ता के लिए यह पहचान धुंधली हो जाती है।

सोशल मीडिया के कुछ प्लेटफार्म अकाउंट का ओरिजिन साउथ एशिया बता रहे हैं, इंडिया नहीं

इसके नतीजे निर्दोषों को भुगतने भी पड़ रहे हैं

वेदान्त श्रीवास्तव इसका ताजा उदाहरण है, कहें कि विक्टिम है। वह प्रकरण इस प्रवृत्ति का सबसे मूर्त और पीड़ादायक उदाहरण है। जब किसी सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने उनके खाते का उद्गम 'India' की बजाय 'South Asia' दर्शाया — और इस आधार पर उनके साथ उस बच्चे की पहचान संदिग्ध बनी — तो यह स्पष्ट हो गया कि यह वर्गीकरण केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, वास्तविक जीवन में असर डालने वाला निर्णय है।

मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम), ट्विटर/X, और टिकटॉक के एल्गोरिदम खातों का 'ओरिजिन' निर्धारित करने में IP पते, फ़ोन नम्बर के देश कोड, और उपयोगकर्ता की भाषा सेटिंग का उपयोग करते हैं। किन्तु जब इन प्लेटफार्मों की आन्तरिक श्रेणी-व्यवस्था में 'India' की जगह 'South Asia' प्रमुख इकाई बन जाती है, तो भारतीय उपयोगकर्ताओं की जियो-टैगिंग में अस्पष्टता आती है। यह अस्पष्टता चुनावी विज्ञापन नियमों, विदेशी हस्तक्षेप की जाँच, और यहाँ तक कि वीज़ा आवेदन सत्यापन में भी समस्याएँ उत्पन्न कर सकती है।

वेदान्त श्रीवास्तव जैसे लोग इस तंत्र के पहले पीड़ित हैं — जो न तो नीति-निर्माता हैं, न विचारधारा के पैरोकार। वे बस भारतीय हैं, और यही उनका 'अपराध' है — कि एक मंच ने उनकी भारतीयता को 'साउथ एशियनता' में बदल दिया।

पश्चिम की जो मानसिकता औपनिवेशिक काल में इसे सब-कान्टिनेंट कहकर एक राष्ट्र के रूप में इसकी पहचान के अस्वीकार में झलकती थी जब मैक्स मूलर जैसे विद्वानों ने भारतीय ग्रन्थों को 'Oriental texts' की श्रेणी में रखा था — न कि किसी राष्ट्र की विरासत के रूप में।

इस उत्तर-आधुनिक युग में इसे साउथ एशिया कहने में झलकती है।

एडवर्ड सईद ने 'ओरिएंटलिज़्म' में दिखाया था कि पश्चिमी ज्ञान-तंत्र 'पूर्व' को एक समरूप, निष्क्रिय इकाई के रूप में परिभाषित करता है ताकि उसे नियंत्रित किया जा सके। 'साउथ एशिया' की अवधारणा इसी परम्परा का एक परिष्कृत रूप है — जिसमें भारत की विशिष्टता को एक क्षेत्रीय औसत में घोल दिया जाता है।

एक पाँच सहस्र वर्ष पुरानी सभ्यता और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की पहचान को वैश्विक विमर्श, शैक्षणिक संस्थानों, डिजिटल प्लेटफार्मों और बहुराष्ट्रीय निगमों में धीरे-धीरे 'दक्षिण एशिया' (South Asia) में घोलने की एक सुनियोजित प्रक्रिया चल रही है।

यह प्रतिस्थापन मात्र भौगोलिक वर्गीकरण की सुविधा नहीं है। यह एक गहरे औपनिवेशिक मानसिकता का उत्तर-आधुनिक अवतार है — जिसमें कभी 'उपमहाद्वीप' (Sub-continent) कहकर भारत की राष्ट्रीय चेतना को विखण्डित करने का प्रयास किया जाता था, आज उसी चेतना को 'साउथ एशिया' के भूगोल में विलीन करने की कोशिश हो रही है। और इस प्रक्रिया के निर्दोष शिकार भी बन रहे हैं — जैसे वेदान्त श्रीवास्तव जैसे बच्चे , जो केवल इसलिए भेदभाव का सामना करते हैं क्योंकि किसी मंच ने उनकी पहचान 'भारतीय' की बजाय 'साउथ एशियन' लिखी।

यहाँ एक सूक्ष्म किन्तु महत्त्वपूर्ण बिन्दु है। 'साउथ एशिया' की अवधारणा को प्रायः प्रगतिशील, समावेशी, और उपनिवेशवाद-विरोधी रूप में प्रस्तुत किया जाता है। तर्क यह दिया जाता है कि 'India' या भारत नाम ब्राह्मणवादी या हिन्दू-राष्ट्रवादी विमर्श से जुड़ा है, और 'South Asia' अधिक तटस्थ और लोकतांत्रिक है।जबकि यह तर्क कई कारणों से खोखला है। प्रथम, 'India' नाम स्वयं संस्कृत के 'सिन्धु' से व्युत्पन्न है और इसका प्रयोग यूनानी, फ़ारसी, अरबी और चीनी स्रोतों में सहस्राब्दियों से है — यह किसी आधुनिक राजनीतिक परियोजना का उत्पाद नहीं। द्वितीय, 'South Asia' स्वयं एक पश्चिमी शीत-युद्धकालीन निर्माण है — यह भी 'तटस्थ' नहीं। तृतीय, इस अवधारणा के प्रयोग से सर्वाधिक लाभ उन्हें होता है जो भारत की वैश्विक उपस्थिति को कम करना चाहते हैं — चाहे वे पाकिस्तान समर्थक पैरवीकार हों, या वे पश्चिमी थिंक-टैंक जो भारत को एक 'उभरती शक्ति' के रूप में देखने में असहज हैं।

उत्तर-आधुनिकता का यह विचित्र विरोधाभास है — वह राष्ट्र-राज्य को एक 'निर्मित' श्रेणी बताकर उसे विघटित करती है, किन्तु यह विघटन सभी राष्ट्रों पर समान रूप से नहीं लागू होता। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस कभी 'North Atlantic region' नहीं बनते — वे राष्ट्र हैं। किन्तु भारत 'South Asia' बन जाता है।

किसी राष्ट्र का नाम केवल भाषाई प्रतीक नहीं होता — वह उसकी संप्रभुता, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना का वाहक होता है। जब भारत को विकिपीडिया पर 'South Asia' में समेटा जाता है, जब अमेरिकी विश्वविद्यालय 'Indian philosophy' की जगह 'South Asian thought' पढ़ाते हैं, जब सोशल मीडिया प्लेटफार्म भारतीय खातों को 'South Asian origin' बताते हैं — तो यह एक संचयी प्रभाव उत्पन्न करता है जो भारत की वैश्विक पहचान को धुंधला करता है।

वेदान्त श्रीवास्तव जैसे बच्चों के लिए यह सैद्धान्तिक समस्या नहीं — यह एक ठोस, जीवित अनुभव है जिसमें उनकी राष्ट्रीय पहचान किसी तकनीकी श्रेणी में खो जाती है और वे उसके परिणाम भुगतते हैं।

इस प्रवृत्ति का प्रतिरोध आवश्यक है — किन्तु यह प्रतिरोध केवल प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद के रूप में नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, भारत को अपनी बौद्धिक परम्परा की शक्ति से — उसी तर्क, साक्ष्य और वैश्विक परिप्रेक्ष्य के साथ — यह प्रश्न उठाना होगा कि जब चीन चीन रहता है, जापान जापान रहता है — तो भारत 'साउथ एशिया' क्यों बने? यह प्रश्न न केवल एक नाम के लिए है — यह एक सभ्यता की आत्म-पहचान के अधिकार के लिए है।