मेरे हाथ में एक किताब आई- ‘द राइज एंड फॉल ऑफ द ग्रेट पावर्स’। पॉल केनेडी की। यह पुरानी पुस्तक है। इस पुस्तक को मैंने पहले पढ़ा था 1990 में और दोबारा इसको पढ़ा 15 जनवरी 2022 को 32 साल बाद। आज 26 हो रहा है। यानी चार साल बाद दोबारा हाथ में लिया। जब लिया तो यह कोई 500 साल के मूवमेंट पर बात कर रहा है। तो मैंने 20वीं शताब्दी के पन्ने पलटने शुरू किए। जैसे ही पन्ना पलटना शुरू किया ध्यान में अनेकानेक बातें आई। पहले उन बातों को आपसे साझा करती हूं। उसके बाद कुछ पढ़कर भी सुनाऊंगी। हो सकता है आज ही पूरा कर लूं और यदि विस्तार से बात किया तो हो सकता है कल या परसों एक वार्ता इस पर और करें।
स्टालिन का नाम तो हम लोगों ने सुना ही है। लेनिन का भी सुना है। कैसा भयंकर मारकाट इसने रूस में या जिसको सोवियत संघ कहते हैं यूएसएसआर उसमें कैसा भयंकर मारकाट मचाया। एक दो सैकड़ा हजार ही नहीं, 100 हजार, लाख, 10 लाख, 20 लाख, 50 लाख, 100 लाख, 150 लाख, 200 लाख।
200 लाख मतलब दो करोड़। इससे भी अधिक जाने कितने करोड़ लोगों को ओवर अ पीरियड ऑफ टाइम स्टालिन ने मार दिया। यह तो जो सोवियत रूस में हुआ उसको देखे तो मार दिया, जिस तरह तड़पा तड़पा कर तिल तिल करके मारे गए और स्टालिन सोवियत रूस का शासक था। मोदी जी भारत के शासक हैं। स्टालिन नेहरू का आदर्श था। और भी बहुतों का आदर्श था।
और केवल स्टालिन क्यों ? पड़ोस में जिसको पीआरसी कहते हैं पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना वहां एक माओ जे तुंग था। उस के जीवन काल में जो भयंकर उपद्रव हुए हैं चीन में, तीन चार, जिनकी बहुत चर्चा होती है। कल्चरल रेवोल्यूशन, द ग्रेट लीप फॉरवर्ड। उसमें सैकड़ों नहीं हजारों नहीं लाखों 10 लाख 20 लाख 50 लाख 100 लाख 150 लाख 200 लाख 300 लाख 400 लाख 500 लाख तड़पा तड़पा के मारे गए। मर गए, पागल हो गए, सड़ गए, सूख के वर्षों में हड्डी के ढांचे हो गए। चमड़ियां लटक गई। क्या क्या क्या किया। मैंने सुनाया भी है बहुत वार्ताओं में।
मैंने अनेकानेक वार्ताएं इस पर की है और आप लोगों में बहुतों की जानकारी भी होगी। चीन में केवल माओ के समय क्यों, उसके पहले जो भयंकर सिविल वॉर चला। कब से? 1945 से 1949 तक। सिविल वॉर। वहीं का चांगकाई शेक, सनयात सेन, वहां के स्वयं को बेताज बादशाह कहने वाले। आजकल मोदी जी बेताज बादशाह है। बेताज तो नहीं ताज सहित बादशाह है। वहां भी चांगकाई शेक को और सनयात सेन को लोगों का नेता कहते थे। मोदी जी को भी लोगों का नेता कहते है। उस चार साल के सिविल वॉर में कितने मारे गए ? और केवल वही क्यों? उसके पहले तुरंत पहले जो जापानीज ऑक्यूपेशन ऑफ चीन था, चीन भी नहीं था। तब मांचो एंपायर था। तो जो जापानीज ऑक्यूपेशन है उसमें लाखों लाखों मारे गए। लाखों लाखों स्त्रियों को पकड़ कर एक लाख से अधिक दो लाख भी हो तो लाखों होंगे। वहां तो अनेक अनेक लाखों स्त्रियों को पकड़ कर वेश्यावृत्ति में झोंका गया।
 यह भी एक बात को स्पष्ट नहीं करता। छोटी बच्चियों को, बड़ी बच्चियों को भी उठा ले रहे हैं घर से। इसी चीन में मानचू एंपायर में। पूरे इलाके से और उनको जिस बेरहमी से सेक्सुअली असॉल्ट कर रहे हैं। जिस बेरहमी से उसके जो वीडियोस हैं कुछ रियल भी हैं ज्यादा तो जैसे वार्ता में बनता है वैसे वीडियो हैं YouTube पर। नानकिंग उस समय मानचू साम्राज्य की राजधानी है। नानकिंग मतलब दक्षिण की राजधानी नान किंग तो जापानियों ने जो किया उसको कहा गया रेप ऑफ नानकिंग। इतना बलात्कार इतना बलात्कार और केवल बलात्कार तो नहीं हो रहा। स्त्रियों के साथ हो रहा है। पुरुषों के साथ हो रहा है। मार काट। केवल मारकाट तो नहीं हो रहा है। इसके कारण देश में मारकाट के कारण जो हाहाकार है, जो तनाव है, जो घबराहट है, जो डर है। अच्छा, केवल इतना तो नहीं है। सामानों की जो कमी है, अभाव है। क्योंकि प्रोडक्शन सब डिसरप्टेड है, इकोनमी डिसरप्टेड है, सोसाइटी डिसरप्टेड है। जो कुछ उत्पादन हो भी रहा है, तो कोई एक पक्ष की सेना या लड़ने वालों का झुंड और गिरोह आ रहा है, वह उठा ले जा रहा है। और ऐसा कब तक चला? 50-60 साल तक चला। इसके पहले भी कोई बहुत सुंदर नहीं था।
अब चलिए जापान की बात कर ले।  जापान को सेकंड वर्ल्ड वॉर में 1945 में जब सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म हो गया। जैपनीज तो वॉर खत्म कर नहीं रहे थे। जबरदस्ती सरेंडर कराया गया। एटम बम का तो हम लोगों को पता है कि नागासाकी और हिरोशिमा पर एटम बम डाला गया।
इसके अलावा एक और बम है उसका नाम मुझे नहीं याद आ रहा है। यहां की घनी बस्तियों पर राजधानी टोकियों पर लगातार डाला गया और हम सबको पता है जापान में भूकंप बहुत आते हैं। इसलिए लकड़ी के घर है। तो लकड़ी के घर धू धू करके जल रहे हैं। भयंकर धूधू करके घर जल रहे हैं, मतलब युद्ध का जो अशांत माहौल है, उसकी दशा की कल्पोना कीजिए।
युद्ध पुराने समय के युद्ध की तरह किसी मैदान में किसी सेना द्वारा किसी सीमा पर नहीं लड़ा जा रहा है कि जहां दो सेनाएं आ गई, खड़ी हुई लड़ रही है भारत में अभी भी जो पाकिस्तान से चीन से युद्ध हुआ हमारी सीमाओं पर युद्ध हुआ। पर वहां पर अमेरिका आ रहा है और सिविलियन इलाकों में जहां लोग रह रहे हैं वहां बम गिरा रहा है। पुरुष मर रहे हैं। मतलब बेटा, पति, भाई मर रहा है। वर्किंग पापुलेशन मेल वर्किंग पापुलेशन सेना में मर रही है। कट रही है। तो नॉर्मल जो प्रोडक्शन है उसमें बहुत कम उम्र के बच्चे बूढ़े स्त्रियां लग रही हैं। अभाव। भयंकर अभाव, भयंकर राशनिंग, भयंकर कड़ाई और इसके बाद जापान का जो राजा है, एम्पबरर है उससे एक इकरारनामा करवाया गया सरेंडर का और युद्ध खत्म हुआ और युद्ध खत्म होने के बाद जापान पर आज तक कैसी भयंकर शर्तें हैं निशस्त्रीकरण अपनी सुरक्षा के लिए नन्हा सा सैन्य बल रखने के अलावा तुम सशस्त्र सेना नहीं रख सकते हो। तुम लड़ाई का साजो सामान नहीं बना सकते हो। जापान की सुरक्षा पूरा का पूरा अमेरिकियों के हवाले यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के हवाले। ऐसा घनघोर अपमान का वातावरण है। क्षोभ है। उबल रहा है जापान। कारण जापान के सेना के जो बड़े-बड़े अधिकारी हैं उनको भरोसा था कि हम लोग जीत लेंगे। यह अमेरिका कुछ ना बिगाड़ पाएगा। शायद उन लोगों को पता था कि वहां पर छह एटम बम ही है। दो गिर गया चार और गिरा दो देख लेंगे। उसमें राजा का यह जो सरेंडर है वो भयंकर अपमानजनक है। अपमान के बाद जो यह शर्तें ला दी गई हैं।
वहां के लोगों का जो युद्ध में ट्रायल हो रहा है और जो उनको वॉर क्रिमिनल घोषित कर दंडित किया जा रहा है। उसके बाद जापान फिर खड़ा होता है। उसमें बहुत सारे फैक्टर है उसकी अभी मैं चर्चा नहीं कर रही हूं लेकिन खड़ा होने में जिसको कमर तोड़ मेहनत कहते हैं। कमर तोड़ मेहनत। जिसके कारण घनघोर अवसाद। संसार में कदाचित सबसे अधिक आत्महत्या की दरें जापान में है। हम लोगों को। जापान की बुलेट ट्रेन तो पता है पर यह सब नहीं पता है। हम में से बहुतों को पता है कि वहां कैप्सूल की तरह का घर, होटल, सोने की व्यवस्था। घर नाम की चीज का मतलब हम लोग का ट्रेन में जो टू टियर या थ्री टियर जो सेकंड क्लास होता है स्लीपर क्लास होता है जिसमें एक दो तीन खाना है जिसमें हम कभी एक आध रात को सोते हैं वैसा जापान में सामान्य है और पता नहीं क्या क्या है। तो केवल रूस चीन जापान ही क्यों, इन के तो शासक ऐसे थे, जिनकी इतनी भयंकर महत्वाकांक्षा थी कि पूरे देश की जनता को के जीवन को नारकीय बना दिया।
अब इस संदर्भ में अपनी स्थिति समझिये तो कही कोई अवसाद या हतासा नहीं होगी। कोई हाय-हाय नहीं होगी। मोदी जी यूजीसी लाए हैं। समाज में विष घोल दिया है। सार्वजनिक व्य वहार में सामान्यीत: लोग इस तरह जातपात जानते नहीं थे। अब लगता है किसी से व्यवहार करने के पहले अंदाज तो बैठा लो कि क्या है। कहीं किसी एक्टइ में झूठे फंसा तो नहीं देगा।
लेकिन यह चीन में जो हुआ, रूस में जो हुआ, जापान में जो हुआ, उसकी तुलना में क्या है? यह मैं क्यों कह रही हूं? यह मैं इस लिए कह रही हूं कि यदि पुरुषार्थ करें तो उस भयंकर चीज से वहां के लोग पुरुषार्थ करके बाहर आ गए। हमारे लिए पुरुषार्थ करके मोदी जी और भाजपा को हैंडल करना अपेक्षाकृत बहुत आसान है।
स्टालिन कैसी मौत मरा ? माओ कैसी मौत मरा ? जापान को बचाने के लिए हम लोग थोड़े गए थे। चीन को बचाने के लिए हम लोग थोड़ी गए थे। रूस को बचाने के लिए हम लोग थोड़ी गए थे तो हमारे लिए यह लोग थोड़ी आएंगे। यह पुरुषार्थ तो हमको स्वयं करना पड़ेगा।
 और तीनों इन्हींे को ? क्यों यूरोप और अमेरिका से शिक्षित भारतीय बड़ा अभिभूत है। समझदार भारतीय अच्छे भारतीय पढ़े लिखे भारतीय सभी प्रकार के भारतीय बड़े अभिभूत है। सोचते हैं, वाह, इनके जीवन में तो कोई कष्ट ही नहीं है। तो थोड़ा सा पढ़ के सुना रही हूं।
 इसी पुस्तक से यह मास्टर पीस बेस्ट सेलर और क्या-क्या है यह पुस्तसक। पृष्ठ संख्या पढ़ दे रही हूं 421 और मैं केवल 20वीं शताब्दी की चर्चा कर रही हूं। पुराने समय की चर्चा नहीं कर रही। क्यों केवल 20वीं शताब्दी की चर्चा कर रही हूं? हम समकालीन विश्व में रह रहे हैं। हमारे आसपास जो हो रहा है उसी से तुलना करके सुखी और दुखी होते हैं। तो यह जाने तो सही कि वस्तुतः हमारे अगल-बगल क्या हो रहा था, क्या हो रहा है और हमारे साथ कितना हो रहा है। अगर वह पुरुषार्थ करके उस दलदल से बाहर आ सकते हैं। वैश्विक परिस्थितियां उथलपुथल की भी और निरंतर वोलेटाइल निरंतर बदलती हुई परिस्थितियों में कैसी-कैसी चुनौतियां हैं। तो कैसे-कैसे संभावनाएं भी आ रही है कैसे-कैसे अवसर भी आ रहे हैं। यदि वो नारकीय दलदल से बाहर आ सकते हैं तो हम भाजपा को झेलकर फिर से नयी स्फूयर्ति से खडे हो सकते है। लोगों को लगता है या मोदी जी को लगता है कि कोई विकल्प नहीं है। किसका विकल्प नहीं है भाई? आप बहुत होगा शतायु होंगे। अमर होने का वरदान तो आपने भगवान शंकर से लिया नहीं। तो आपके बाद विकल्प ही विकल्प है। दूसरे आप राजा हैं नहीं।
यह पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी है। हर 5 साल बाद चुनाव होता है। चुनाव में कमजोर जीत है कि मजबूत जीत है। इससे कितना फर्क पड़ता है? यह आपसे अधिक कौन जानता है? क्योंकि मजबूत जीत के लिए यह बड़ी गलती हो गई। जिस गलती को बड़े आराम से सुधारा जा सकता है। बड़े आराम से भारत का संविधान कहता है संविधान ना भी कहे संसार कहता है कि भाई किसी के साथ भेदभाव ना हो। तो कुछ लोगों ने जानबूझकर अनजान में गलत प्रत्याशा में ऐसे भयंकर भेदभाव का यह एक्ट बना दिया। अच्छा भाई बन गया। हटाते हैं। नया ड्राफ्टिंग कर लेते हैं। कैसा ड्राफ्टिंग जिसमें किसी के प्रति भेदभाव नहीं हो। तो अपने यहां मोदी जी को हो गया है कि शायद उनका कोई विकल्प नहीं है। तो कब तक और आप मान लीजिए 29 तक टिक गए या 29 में भी कोई बड़ी प्लानिंग आप लोगों की है तो इतने से कई सीटें खो के कमजोर ही तो आएंगे तो हम भारतीयों के पास यह समस्या तो बहुत बड़ी है लेकिन अन्यों की तुलना में कितनी छोटी है।
अभी यूरोप की भी कथा सुना रही हूं। पेज संख्या 421 और यह बात कब की कर रहा है? सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद यूरोप की स्थिति और यूरोप में जो पुनः उछाल आया 70 के दशक तक आते-आते उनका गोल्डन पीरियड आ गया। 1945 में जो समाप्त से थे चर्चिल कहता है व्हाट इज योर अप? अ हिप ऑफ रबल्स। यह जब मैं दोबारा पढ़ रही थी आज सबेरे तो मुझे लगा मैं ऐसा सोचती हूं मैं गलत भी हो सकती हूं कि लोगों ने तो यह सब पढ़ा भी नहीं है। जो शब्द अभी आएंगे वह शब्द ही कान में अटपटे लगेंगे। हम लोग यूरोप को, अमेरिका को, जर्मनी को, फ्रांस को, इंग्लैंड को किस शब्दावली में देखते हैं और वहां का एक बड़ा विश्लेषक कैसे बात कर रहा है। फॉर टू लॉन्ग मच ऑफ द कॉन्टिनेंट (कॉन्टिनेंट से मतलब यूरोप) हैड सफर्ड फ्रॉम इन्वेजंस। कह रहे है कि बहुत समय तक यूरोपीय महाद्वीपय बाहरी आक्रमणों से भीषण हानि उठाता रहा है। (क्रमश:...)
नोट:- यह धर्म मीमांसा यू-टयूब चैनल पर दिये गये उनके व्यामख्या न का अंश  है।
(लेखिका अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मामलों की विशेषज्ञ हैं और राष्ट्रवादी विचारों पर लेखन करती हैं)