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आर्यसमाज और हिन्दी

पूर्वी पंजाब ( भारत ) प्रान्त में हुए ‘ हिन्दी रक्षा आन्दोलन ‘ का सूत्रपात आर्यसमाज के नेतृत्व में हुआ । अन्य हिन्दू सम्प्रदायों के होते हुए भी आर्यसमाज ने इसमें शीर्षभूमिका क्यों निभाई ? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें तीन बिन्दुओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा । प्रथम बिन्दु स्वामी दयानन्द , द्वितीय बिन्दु आर्यसमाज और तीसरा बिन्दु हिन्दीभाषा है । इनमें से स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज का क्या सम्बन्ध है ? यह समझ आने पर तीसरा बिन्दु हिन्दीभाषा स्वत : ही समझ में आजाएगा । स्वामी दयानन्द आर्यसमाज के संस्थापक थे । स्वामीजी द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों एवं मन्तव्यों का प्रसार और प्रचार करना आर्यसमाज का मुख्य कर्त्तव्य है । इन सिद्धान्तों एवं मन्तव्यों का प्रसार व प्रचार किसी अन्य भाषा में न होकर सिद्धान्तरूप में हिन्दी में ही होना चाहिए । क्योंकि स्वामी दयानन्द ने इसी भाषा को आर्यावर्त के जनसाधारण एवं संभ्रान्त व्यक्तियों की भाषा माना है ।

आर्यसमाजरूपी शरीर की क्रिया और प्रतिक्रिया स्वामी दयानन्दरूपी प्राणवायु से होती है । और प्राणवायु का श्वसन हिन्दीभाषा की नलिका से होता है ।

आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द भारतभूमि के उन महान् और अग्रणी चिन्तकों में से एक थे जो “ जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ” मानते थे । स्वामीजी के समय में भारतदेश को भारत , हिन्दुस्तान और इण्डिया आदि के भिन्न – भिन्न नामों से पुकारा जाता था । परन्तु स्वामी जी ने इन नामों को छोड़कर अपने भाषणों और लेखों में सर्वत्र इस देश के लिए “ आर्यावर्त ” शब्द का प्रयोग किया है । क्योंकि स्वामीजी की मान्यता के अनुसार इस देश के मूलनिवासी आर्य थे । स्वामीजी आर्यावर्त में वैदिक संस्कृति और सभ्यता को पुनर्जीवित करने का संकल्प लेकर अवतरित हुए थे ।

वे आर्यावर्त में स्वदेशभक्ति , स्वराज्यशक्ति और स्वभाषाप्रयुक्ति के प्रबल समर्थक थे । उनका समग्र चिन्तन अतीत की गौरवमयी वैदिक सांस्कृतिक धुरी पर केन्द्रित था । उपर्युक्त मान्यता की पुष्टि उनके ग्रन्थों के अध्ययन से सरलता से हो जाती है ।

वे अपनी रचना सत्यार्थप्रकाश ‘ में लिखते हैं “ यह आर्यावर्त देश ऐसा देश है , जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नहीं है । इसलिए इस भूमि का नाम सुवर्णभूमि है । ” स्वामी जी की मान्यता के अनुसार चाहे अध्यात्म का क्षेत्र हो , चाहे धर्म का क्षेत्र हो , चाहे समाज का क्षेत्र हो , यदि उसमें स्वदेशप्रेम की कमी वह निन्दनीय है । स्वदेशप्रेम की भावना में चूक दिखानेवाले संगठनों और समाजों की आलोचना करने में वह पीछे नहीं हटते थे , चाहे उनकी मान्यताएं आर्यसमाज की मान्यताओं से मेल खाती हों ।

यह बात ब्राह्मसमाज और प्रार्थनासमाज की आलोचना से स्पष्ट है । ये दोनों समाज आर्यसमाज की भांति समाजसुधारक थे और समाजसुधार के कार्यों में इनके विचारों से बहुत मेल खाते थे । फिर भी स्वामीजी इनकी आलोचना करने से ठिठके नहीं और सत्यार्थप्रकाश में लिख दिया “ इन लोगों की देशभक्ति न्यून है । ईसाइयों के आचरण बहुत से लिए हैं । अपने देश की प्रशंसा या पूर्वजों की बड़ाई करनी तो दूर रही , उसके बदले पेटभर निन्दा करते हैं । ब्रह्मादिक महर्षियों का नाम भी नहीं लेते । प्रत्युत ऐसा भी कहते हैं कि बिना अंग्रेजों के सृष्टि में आज पर्यन्त कोई भी विद्वान् नहीं हुआ । ”

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द भारत में ‘ स्वराज्य ‘ शब्द के मन्त्रदाता और प्रवक्ता थे । उन्हें इस बात का श्रेय प्राप्त है कि कांग्रेस की स्थापना से पूर्व ‘ आर्याभिविनय ‘ नामक पुस्तक में ‘ अदीना स्याम शरदः शतम् ‘ मन्त्र का अर्थ करते हुए वे लिखते है “ हम सौ वर्ष की आयु में कभी पराधीन न रहें और स्वाधीन ही रहें । ” इस पुस्तक में एक अन्य स्थान पर लिखा है “ हमें भी शक्ति – विद्या से युक्त सुनीति देकर साम्राज्याधिकारी सद्य : कीजिए । ” स्वामीजी ने ‘ सत्यार्थप्रकाश ‘ नामक ग्रन्थ में स्वराज्य की अपेक्षा स्वदेशी राज्य ‘ शब्द का प्रयोग किया है और लिखा है “ कोई कितना भी करे परन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है । ” स्वामीजी की स्वदेशी राज्य की शासन पद्धति की कल्पना भी स्वदेशी ग्रन्थों अर्थात् वेदों और स्मृतियों के अनुरूप थी ।

स्वामी दयानन्द द्वारा स्थापित आर्यसमाज के दस नियमों में से एक नियम सार्वभौम मानवता को प्रमुखता देता है । इस नियम के अनुसार “ सब मनुष्यों का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है और सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझना । ” स्वामी दयानन्द का स्वदेश और स्वदेणी राज्य की भावना का और आर्यसमाज के एक नियम के अंश का यहां उल्लेख करना इसलिए आवश्यक प्रतीत हुआ कि कुछ संकुचित विचारवाले और राजनीति से प्रेरित नेता हिन्दी रक्षा आन्दोलन को साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय एकता में बाधक जैसे विशेषण देते हैं जोकि तथ्य और सत्य दोनों ही दृष्टियों से भ्रमपूर्ण हैं ।

आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द मूलत : गुजरात प्रदेश के निवासी थे । उन्होंने अपने जीवन के प्रारम्भिक १९ वर्ष के लगभग इसी प्रान्त की संस्कृति और भाषा में बिताये थे । परन्तु उनके परिवार में संस्कृतभाषा के अध्ययन की परम्परा थी । तत्कालीन भारतवर्ष के शैक्षणिक और सांस्कृतिक परिवेश में उसी व्यक्ति को विद्वान् समझा और माना जाता था जो व्यक्ति संस्कृतग्रन्थों के पंक्तिश : पाण्डित्य का प्रयोक्ता हो । इस प्रकार के पंडितों द्वारा ही सामाजिक और धार्मिक गतिविधियां निर्देशित होती थीं । इस रूढ़िगत परम्परा को देखकर स्वामीजी ने संस्कृत में आगध पाण्डित्य प्राप्त किया और संस्कृत संभाषण उनके लिए हस्तामलकवत् होगया । स्वामीजी ने १८७२ ई ० तक अपने मन्तव्यों और सिद्धान्तों को संस्कृतभाषा द्वारा ही प्रचारित किया ।

१८७२ ई ० में जब कलकत्ता में स्वामीजी की भेंट ब्राह्मसमाज के नेता केशवचन्द्र सेन से हुई तो उन्होंने स्वामीजी से कहा कि स्वामीजी आपके सामाजिक कुरीतियों और अन्धविश्वासों को दूर करनेवाले क्रान्तिकारी विचार मात्र कुछ संस्कृतज्ञ व्यक्तियों तक ही सीमित रहते हैं , इन्हें सार्वजनिक बनाने के लिए आपको हिन्दीभाषा अपनानी चाहिए । स्वामीजी के मन में यह विचार घर कर गया और उन्होंने भविष्य में हिन्दी भाषा में अपने विचार रखने का संकल्प लेलिया । हिन्दी में अपने विचार रखने के पीछे एक कारण यह भी था कि स्वामीजी के संस्कृतभाषणों एवं प्रवचनों का श्रोताओं के लिए अनुवाद करते समय पंडित लोग जानबूझकर स्वामीजी के विचारों के प्रतिकूल अनुवाद कर देते थे । बाद में स्वामीजी को इनका प्रतिवाद और प्रत्याख्यान करना पड़ता था । इस प्रकार सन् १८७४ ई ० में स्वामीजी ने आर्यभाषा ( हिन्दी ) में प्रचार करना आरम्भ कर दिया ।

इस समय ( १८७४ ) तक स्वामीजी की हिन्दीभाषा पर पूर्ण पकड़ नहीं थी । वे चाहते तो गुजरातीभाषा द्वारा भी प्रचार कर सकते थे क्योंकि इस भाषा पर उनका पूरा अधिकार था और हिन्दी समझनेवाले व्यक्ति भी गुजराती को समझ सकते थे । परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और गुजराती की अपेक्षा कश्मीर से कन्याकुमारी तक समझी जानेवाली हिन्दीभाषा को ही अपनाया । स्वामीजी ने हिन्दीभाषा पर अपनी अधूरी पकड़ को स्वीकार करते हुए ‘ सत्यार्थप्रकाश ‘ के द्वितीय संस्करण में लिखा “ सत्यार्थप्रकाश को दूसरी बार शुद्ध करके छपवाया है क्योंकि जिस समय मैंने यह ग्रन्थ बनाया था , पठन – पाठन में संस्कृत बोलने और जन्मभूमि की भाषा गुजराती थी , इत्यादि कारणों से इस भाषा का विशेष परिज्ञान न था । अब इसको अच्छे प्रकार भाषा के व्याकरणानुसार जानकर अभ्यास भी कर लिया है , इस समय इसकी भाषा पूर्व से उत्तम हुई है । कहीं – कहीं शब्द , वाक्य रचना का भेद हुआ है , यह करना उचित था क्योंकि उसके भेद किए बिना भाषा की परिपाटि सुधरनी कठिन थी । ”

हम यहां स्वामीजी की हिन्दीभाषा की साहित्यिक समालोचना के विवाद में पड़ना नहीं चाहते , हमें तो मात्र उनके हिन्दीभाषा के प्रति प्रेम और समर्पण हो ही देखना है जो कि आर्यसमाजियों के लिए प्रेरणास्रोत रहा है । परन्तु इतना तो उनकी भाषा के सम्बन्ध में अवश्य कहा जा सकता है कि उनकी हिन्दी पर लिंग , वचन , क्रिया आदि के विषय में संस्कृतभाषा का प्रभाव था । हिन्दी गद्य के विकास में स्वामीजी का योगदान सभी हिन्दी साहित्य लेखकों ने स्वीकारा है । पद्मश्री आचार्य क्षेमचन्द्र के अनुसार स्वामीजी की भाषा में एक समाजसुधारक का दृष्टिकोण ही लक्षित होता है ।

स्वामीजी के समय में हिन्दीभाषा के लिए भाखा , भाषा , नागरी और हिन्दी इत्यादि शब्द प्रचलित थे । परन्तु स्वामीजी ने लीक से हटकर अपने ग्रन्थ ‘ सत्यार्थप्रकाश ‘ में हिन्दी के लिए ‘ आर्यभाषा ‘ शब्द का प्रयोग किया है । ऐसा करना स्वामीजी के लिए स्वभावत : उचित था । क्योंकि जब वे भारतदेश को ‘ आर्यावर्त ‘ कहते हैं और यहां के निवासियों को ‘ आर्य ‘ नाम देते हैं तो उनकी भाषा को ‘ आर्यभाषा ‘ कहना औचित्यपूर्ण है । उनकी मान्यता के अनुसार ‘ देवनागरी लिपि ही आर्यभाषा की प्रामाणिक एवं मान्य लिपि है । ‘ सत्यार्थप्रकाश ‘ के द्वितीय समुल्लास में देवनागरी अक्षरों में लिखी जानेवाली हिन्दी को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने लिखा है “ जब पांच – पांच वर्ष के लड़का – लड़की होजायें तब देवनागरी अक्षरों का अभ्यास करावें । ”

सन् १८७५ ई० में स्वामीजी ने वैदिक विचारों के प्रचार और प्रसार के लिए मुम्बई ( बम्बई ) में सर्वप्रथम ‘ आर्यसमाज ‘ नामक संस्था की स्थापना की । उस समय आर्यसमाज के अट्ठाईस नियमों के साथ उनके उपनियम भी बनाए गए थे । उन नियमों में से पांचवां नियम आर्यसमाज की भाषानीति का दिग्दर्शन इस प्रकार कराता है : “ प्रधान आर्यसमाज में सत्योपदेश के लिए संस्कृत और आर्यभाषा में नानाप्रकार के ग्रन्थ रहेंगे और एक साप्ताहिक पत्र ‘ आर्यप्रकाश निकलेगा । ये सब समाज में प्रवृत्त किए जाएंगे । ”

उपनियमों में हिन्दी के प्रति पूर्णनिष्ठा प्रकट करते हुए कहा गया है कि ” सब आर्यों और आर्यसमाजियों को संस्कृत और आर्यभाषा जाननी चाहिए । ” इसी प्रकार जब लाहौर में आर्यसमाज का संगठन बनाया गया , तो एक उपनियम बनाकर सब आर्यसमाजियों के लिए आर्यभाषा का सीखना अनिवार्य कर दिया गया था । इस प्रकार आर्यसमाजियों के लिए संस्कृतभाषा आर्यावर्त की सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक है , तो हिन्दी भारतभूमि को भाषा की दृष्टि से एकरूपता प्रदान करने का सशक्त साधन है ।

आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द ने मात्र ‘ सत्यार्थप्रकाश में ही बालकों को नागरी ( हिन्दी ) सिखाने की बात लिखकर अपने हिन्दी प्रेम पर विरामचिह्न लगा दिया हो , ऐसी बात नहीं थी प्रत्युत इसके लिए वे सदा प्रयत्नशील भी रहे । उन्होंने जोधपुर महाराजा को एक पत्र लिखा था कि महाराजा युवराज को २५ वर्ष ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कराते हुए पहले नागरी ( हिन्दी ) भाषा की शिक्षा और पुन : संस्कृतभाषा की शिक्षा दिलवाएं । यदि इसके साथ समय हो तो अंग्रेजी पढ़ानी चाहिए ।

पंजाब प्रान्त में स्वामीजी के भाषणों का प्रभाव रामबाण की तरह अचूक था । परन्तु स्वामीजी के भाषण आर्यभाषा ( हिन्दी ) में होते थे । उस समय का बहुसंख्यक बुद्धिजीवी पंजाबी आर्यभाषा का ज्ञाता नहीं था । अत : यह वर्ग चाहता था कि स्वामीजी की रचनाओं का अनुवाद उर्दू में प्रकाशित कर दिया जाए तो उत्तम रहेगा । इसके लिए जब स्वामीजी की स्वीकृति मांगी गई तो स्वामीजी का उत्तर था – ” अनुवाद तो विदेशियो के लिए होता है अपने देशवासियों को आर्यभाषा आनी ही चाहिए । ”

स्वामीजी का हिन्दी प्रेम – परिचय उस पत्र से भी मिलता है जो उन्होंने थियासोफिस्ट महिला ब्लेवेटस्की को लिखा था । उस पत्र में स्वामीजी ने स्पष्ट रूप से संकेत किया था कि जिस पत्र का उत्तर वे स्वामीजी से चाहें , उसकी नागरी कराकर भेजें । इसी प्रकार १३ जुलाई , १८७६ ई० को अपने विदेशी मित्र कर्नल अल्काट को अपनी भावनाएं प्रकट करते हुए लिखा था “ मुझे यह सुनकर प्रसन्नता हुई कि आपने आर्यभाषा पढ़ना आरम्भ कर दिया है । ” स्वामीजी हिन्दीभाषा के प्रसार और प्रचार में कितने सावधान और प्रयत्नशील थे , इसका प्रमाण वह पत्र भी है , जो उन्होंने १ अक्तूबर १८७८ ई० में दिल्ली से श्यामजी कृष्ण वर्मा को लिखा था । इस पत्र की हिन्दी से सम्बन्धित पंक्तियां इस प्रकार थीं :-

“ इस बार भी वेदभाष्य के लिफाफों पर देवनागरी नहीं लिखी गई । इसलिए तुम बाबू हरिश्चन्द्र चिन्तामणि से कहो अभी इसके देखते ही देवनागरी जाननेवाला एक मुंशी रखले , जिससे कि काम ठीक – ठाक हो , नहीं तो वेदभाष्य के लिफाफों पर रजिस्टर के अनुसार ग्राहकों का पता देवनागरी जाननेवाले से लिखवा लिया करें । ”

सन् १८८२ ई० में कलकत्ता में भारतीय विद्यालयों में शिक्षा के माध्यम के लिए किस भाषा को चुनाव जाये , इसके निश्चयार्थ एक कमीशन बैठा था । इस कमीशन के अध्यक्ष मिस्टर डब्ल्यू हण्टर थे । “ स्वामी दयानन्द के पत्र और विज्ञापन ” नामक पुस्तक के अनुसार मुल्तान आर्यसमाज के मन्त्री मास्टर दयाराम ने १ ९ मार्च , १८८२ ई ० को एक पत्र लिखा । इस पत्र में स्वामीजी से प्रार्थना की गई थी कि अन्य भारतीय समाजों के विद्यालयों में आर्यभाषा पढ़ाए जाने के विषय में कमीशन को पत्र भेजने की प्रेरणा दें । स्वामीजी ने मन्त्रीजी के पत्र के पृष्ठभाग पर फर्रुखाबाद आर्यसमाज को निम्नलिखित लेख लिखा :
“ यह बात बहुत उत्तम है , क्योंकि अभी कलकत्ते में भी इस विषय पर एक सभा होरही है । इसलिए जहां तक बने वहां शीघ्र ही संस्कृत और मध्यदेश ( आर्यावर्त ) की भाषा के वास्ते , बहुत प्रधान पुरुषों की सही ( हस्ताक्षर ) कराके कलकत्ते की सभी सभाओं को भेज दीजिए और भिजवा दीजिए । ”

स्वामीजी मात्र इतना लिखने से सन्तुष्ट नहीं हुए प्रत्युत हिन्दी के प्रति उनकी चिन्ता बाबू दुर्गाप्रसाद को लिखे पत्र के निम्नांश से भी होती है

“दूसरी अतिशोक करने की बात है आजकल सर्वत्र अपनी आर्यभाषा राजकार्य में प्रवृत्ति के अर्थ पंजाब हाथरस आदि से मैमोरियल भेजे गए हैं । परन्तु मध्यप्रान्त , फर्रुखाबाद कानपुर , बनारस आदि स्थानों से नहीं भेजे गए , ऐसा ज्ञात हुआ है । और गतदिवस नैनीताल की सभा की ओर से एक इसी विषय में पत्र आया था । उसके अवलोकन से निश्चय हुआ कि पश्चिमोत्तर देश से मैमोरियल नहीं आए और हमें लिखा है कि आप इस विषय में प्रयत्न कीजिए । अब कहिये हम अकेले सर्वत्र कैसे घूम सकते हैं । जो यही एक काम हो तो कुछ चिन्ता नहीं । इसलिए आपको अति उचित है कि मध्यदेश में सर्वत्र पत्र भेजकर बनारस आदि स्थानों से और जहां – जहां परिचय हो सब नगर और ग्रामों से मैमोरियल भिजवायें । यह काम एक के करने का नहीं और अवसर चूके वह अवसर पाना दुर्लभ है । जो यह कार्य सिद्ध हुआ तो अवश्य ही मुख्य सुधार की नींव पड़ जाएगी । आप स्वयं बुद्धिमान् हैं । इसलिए विशेष लिखना आवश्यक नहीं । ”

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पंजाब के आर्यसमाजी स्वामीजी के जीवनकाल में ही हिन्दी के प्रसार और प्रचार में उद्यत थे । पंजाब के आर्यसमाजियों का यह प्रयास उस समय का है जबकि भारत देश परतन्त्र था । स्वतन्त्र भारत में स्वदेशी शासक ही यदि हिन्दी पढ़ने और पढ़ाने पर अंकुश लगाये , तो आर्यसमाज इसे कैसे सहन कर सकता है । बस इसी अंकुश को हटाने और पंजाबीभाषा की बलात् पढ़ाई कराने के हठ को समाप्त करने की कहानी ही हिन्दी रक्षा आन्दोलन की कहानी है ।

आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द का हिन्दी के प्रति लगाव सिद्धान्तपरक था । स्वामीजी के हिन्दी के प्रति समर्पण का आकलन करते हुए केनबरा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जोर्डन्स ने लिखा है ” बनारस , लाहौर तथा बम्बई तक वे जहां भी गए उन्होंने हिन्दी का व्यवहार किया । क्योंकि हिन्दी समूचे भारत में समझी जाती थी । यह केवल सुविधाजनक नीति न होकर सिद्धान्त की बात थी । ”

स्वामीजी के सिद्धान्त की बात को आर्यसमाजियों ने भी सिर माथे पर लिया और यथाशक्ति हिन्दी के प्रसार में लगे रहे ।
हिन्दी प्रसार की यह कहानी बिना उदाहरणों के अधूरी ही मानी जाएगी , यह विचार करके यहां कतिपय उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं ।

मुम्बई ( बम्बई ) में जिस समय सबसे पहिले आर्यसमाज की स्थापना की गई थी , तो उस समय के आर्यसमाज के नियमों में से एक नियम में यह प्रावधान किया था कि मुख्य आर्यसमाज ‘ आर्यप्रकाश ‘ नाम का एक समाचारपत्र निकालेगा । यह प्रावधान वैदिक सिद्धान्तों को हिन्दी के समाचारपत्र के माध्यम से आर्यसमाजियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया था । हिन्दी पाठकों के अभाव में हिन्दीभाषा में पत्र – पत्रिकाओं को प्रकाशित करने का जोखिम कोई भी नहीं उठाना चाहता था । परन्तु हिन्दीभाषा को प्रोत्साहन देने के विचार से कुछ व्यक्ति सामने आए और प्रत्यक्षरूप से दृष्टिगोचर होनेवाली आर्थिक हानि की चिन्ता न करते हुए इस कार्य में लग गए । इस क्रम में सर्वप्रथम बख्तावरसिंह का नाम आता है । इन्होंने शाहजहांपुर ( उत्तरप्रदेश ) से वर्ष १८७० ई ० में ‘ आर्यदर्पण ‘ नाम साप्ताहिकपत्र निकाला । इसके बाद इन्होंने ही आर्यसमाज के स्थापना वर्ष १८७५ ई ० में ‘ आर्यभूषण ‘ पत्र भी निकाला । मेरठ में स्वामी दयानन्द के बार – बार आने से वहां की जनता में आर्यसमाज और हिन्दी के प्रति विशेष लगाव होगया था । इसका परिणाम यह हुआ कि इस नगर में वर्ष १८७८ ई ० में ‘ आर्यसमाचार साप्ताहिक निकलने लगा । इसी क्रम में वर्ष १८७९ ई० में फर्रुखाबाद ( उत्तरप्रदेश ) से ‘ भारत सुदशा प्रवर्तक ‘ का प्रकाशन आरम्भ हुआ । इसी वर्ष स्वामीजी की प्रेरणा और प्रोत्साहन से महाराणा सज्जनसिंह ने उदयपुर से ‘ सज्जनकीर्ति सुधाकर ‘ का प्रकाशन किया । स्वामीजी जब मेरठ से परोपकारिणी सभा को अजमेर में ले आए , तो उनकी प्रेरणा पर अजमेर से मुन्नालाल शर्मा ने वर्ष १८८१ ई० में ‘ देश हितैषी ‘ मासिक हिन्दी पत्रिका निकाली । वर्ष १८८२ ई ० में पंजाब के लाहौर नामक नगर से पं ० गुरुदत्त विद्यार्थी और पं० लेखराम के सम्पादकत्व में ‘ धर्मोपदेश ‘ नामक मासिकपत्र प्रकाशित हुआ । कृपाराम शर्मा ( स्वामी दर्शनानन्द ) ने काशी से वर्ष १८८२ ई ० में ‘ तिमिरनाशक ‘ पत्र निकाला ।

उपर्युक्त संक्षिप्त जानकारी देने का आशय यह है कि स्वामीजी के जीवनकाल में आर्यसमाजियों द्वारा ऐसे व्यक्तिगत प्रयास होने लगे थे , जिनसे शनैः शनै : हिन्दी लोकप्रिय होती जारही थी । स्वामीजी की मृत्यु के उपरान्त प्रकाशित होनेवाले हिन्दी समाचार पत्र – पत्रिकाओं में स्वामीजी के अनन्यभक्त समर्थदान ने अजमेर से राजस्थान समाचारपत्र निकाला ।

महर्षि दयानन्द के अनुयायी भीमसेन शर्मा ने इटावा ( उत्तरप्रदेश ) से ‘ आर्यसिद्धान्त ‘ का प्रकाशन आरम्भ किया । यही भीमसेन शर्मा बाद में सनातनी होगए । हिन्दी के प्रचार और प्रसार के क्षेत्र में महात्मा मुंशीराम ( स्वामी श्रद्धानन्द ) का नाम विशेषरूप में उल्लेखनीय है । इनके द्वारा संचालित और सम्पादित ‘ सद्धर्मप्रचारक ‘ साप्ताहिक मूलरूप में उर्दूभाषा में सन् १८८ ९ ई ० में जालन्धर से प्रकाशित हुआ था । इस पत्र की उर्दू को सामान्य उर्दू पाठक ‘ आर्यसमाजी उर्दू ‘ कहते थे , क्योंकि इस समाचारपत्र की उर्दूभाषा में संस्कृत एवं हिन्दी शब्दों का मिश्रण होता था । एक दिन महात्मा मुंशीराम के मिलनेवाले किसी व्यक्ति ने व्यंग्य करते हुए मुंशीराम से कह दिया कि कट्टर अनुयायी तो बनते हो स्वामी दयानन्द के , जिन्होंने अपनी सारी पुस्तकें हिन्दी में लिखी हैं और आप अपने अखबार को निकालते हैं उर्दूभाषा में । मुंशीराम ने उस समय इसका कोई उत्तर नहीं दिया । यह उत्तर अगले अंक में पढ़ने को मिला कि “ आगे से ‘ सद्धर्म प्रचारक ‘ हिन्दी में निकला करेगा । ” यह घटना १९०६ ई० की थी । इसी कड़ी में गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर ( हरद्वार ) से १९०९ ई ० में प्रकाशित होनेवाला ‘ भारतोदय ‘ नामक समाचारपत्र भी आता है ।

हिन्दी को समृद्ध बनाने में आर्यप्रतिनिधि सभाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है । इन प्रतिनिधि सभाओं ने हिन्दी से सम्बन्धित प्रत्येक आन्दोलन में जनमत तैयार करने में अनन्यतम भूमिका निभाई है चाहे वह आन्दोलन अदालतों में नागरी प्रवेश का हो और चाहे पंजाब का हिन्दी रक्षा आन्दोलन हो और चाहे हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा घोषित कराने का अभियान हो । समाचारपत्रों द्वारा हिन्दी की समृद्धि के लिए किए गए प्रयासों में सर्वप्रथम मुम्बई ( बम्बई ) आर्यप्रतिनिधिसभा का नाम आता है । इस सभा ने वर्ष १८८६ ई० में ‘ आर्यप्रकाश ‘ नामक पत्र निकला । इसके बाद वर्ष १८८८ ई० उत्तरप्रदेश सभा में ‘ आर्यमित्र प्रकाशित किया । वर्ष १८९५ ई ० में राजस्थान और मालवा सभा की ओर से ‘ आर्यमार्तण्ड निकाला गया । मध्यप्रदेश सभा का ‘ आर्यसेवक ‘ नामक पत्र वर्ष १९०० ई ० में प्रकाशित होना आरम्भ हुआ । स्वामी दयानन्द द्वारा स्थापित परोपकारिणी सभा द्वारा संचालित ‘ परोपकारी ‘ पत्र वर्ष १९०१ ई० में प्रकाशित हुआ । पंजाब प्रतिनिधि सभा के संरक्षण में सन् १९१४ ई० में ‘ आर्य ‘ नामक पत्र का प्रकाशन हुआ । सार्वदेशिक सभा , दिल्ली के स्वामित्व में सन् १९२७ ई० में ‘ सार्वदशिक ‘ नामक पत्र निकला ।

इस प्रकार स्वामीजी के जीवनकाल एवं मरणोपरान्त आर्यसमाजियों द्वारा प्रकाशित पत्र – पत्रिकाओं ने हिन्दी पाठकों का एक वर्ग तैयार करके हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की भूमिका बनाई । आर्यसमाजियों द्वारा सम्पादित और संचालित पत्र – पत्रिकाओं द्वारा उर्दूभाषा का वर्चस्व कम हुआ और हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ी । इन विचारों की पुष्टि डा० रामरतन भटनागर के शोधप्रबन्ध के निम्नलिखित वाक्यों से होती है
” उर्दू के मध्य में हिन्दी की नींव दृढ़ करनेवाली संस्था का नाम आर्यसमाज है । अपने – अपने मासिकपत्रों तथा समाचारपत्रों के प्रकाशन द्वारा उसने हिन्दी के पृष्ठपोषण का कार्य किया । ”

आर्यसमाज और हिन्दी के सम्बन्धों को समझने के लिए हमें स्वामी दयानन्द की मृत्यु के पश्चात् उनकी स्मृति में स्थापित होनेवाली शैक्षणिक संस्थाओं का इतिहास भी जानना चाहिए । स्वामीजी की मृत्यु के बाद देशभर में शोकसभाएं हुईं । ऐसी ही एक शोकसभा लाहौर में भी हुई , जिसमें स्वामीजी के सिद्धान्तों के अनुकूल एक स्मारक बनाने का विचार उत्पन्न हुआ । इस विचार को मूर्तरूप देने के लिए ६ नवम्बर , १८८३ ई ० में लाहौर आर्यसमाज ने अपनी अन्तरंग सभा में स्वामीजी की स्मृति में दयानन्द एंग्लो वैदिक स्कूल स्थापित करने का प्रस्ताव पारित कर दिया । हाईस्कूल ठीक ढंग से चल पड़ा । इससे उत्साहित होकर २३ दिसम्बर , १८८३ ई ० में ही कालेज खोलने की अपील निकाल दी । ३१ जनवरी , १८८६ ई ० को कालेज प्रबन्धक सभा की रजिस्ट्री में लिखित उद्देश्यों में से एक उद्देश्य इस प्रकार था :

“ दयानन्द एंग्लो वैदिक कालेज के संस्थापकों की इच्छा है कि संस्कृत और हिन्दी की शिक्षा को अंग्रेजी के साथ आवश्यक बनाकर उन कमियों को दूर कर सकें जो केवल एक तरफ संस्कृत की शिक्षा से और दूसरी तरफ एकमात्र अंग्रेजी की शिक्षा से उत्पन्न होती हैं । उनकी यह इच्छा है कि शिक्षितवर्ग और सामान्यजनों के मध्य जो एक दीवार बनी हुई है , उसको दूर किया जाए , और ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जाएं कि शिक्षितवर्ग और सामान्यजनों में परस्पर विचारों की समानता हो । ”

इस उद्देश्य में शिक्षितवर्ग और सामान्यजनों को परस्पर मिलाने का सेतु हिन्दीभाषा ही है अत : प्रबन्धक समिति ने सांस्कृतिक दृष्टि से संस्कृतभाषा को , व्यावहारिक दृष्टि से हिन्दीभाषा को पाठ्यविषयों में महत्ता प्रदान की । परन्तु कुछ समय के पश्चात् संस्कृतभाषा को लेकर मतभेद होगया । इस मतभेद का एक शुभ परिणाम भी निकला कि संस्कृत को महत्त्व देनेवाले पक्ष के नेता मुंशीराम ( स्वामी श्रद्धानन्द ) ने संस्कृत और हिन्दी को महत्त्व देनेवाली और स्वामी दयानन्द द्वारा निदेशित गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का आरम्भ कर दिया । आर्यसमाज की उपर्युक्त दोनों पद्धतियों ने हिन्दीभाषा के प्रचार और प्रसार में यथाशक्ति अपना – अपना योगदान दिया और देरही हैं ।

परन्तु इस बात को सभी स्वीकारते हैं कि हिन्दी और संस्कृत की समृद्धि में कालेज की पद्धति की तुलना में गुरुकुल पद्धति का विशेष हाथ है । गुरुकुलों के माध्यम से संस्कृत और हिन्दी के समर्पित सेवकों की एक अभेद्य पंक्ति खड़ी होगई है । इस अभेद्य पंक्ति में हिन्दी रक्षा सत्याग्रह के समय से पूर्व पंजाब में स्थापित गुरुकुलों यथा – गुरुकुल कुरुक्षेत्र , गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ , गुरुकुल झज्जर , गुरुकुल मटिण्डू और गुरुकुल भैंसवाल आदि के नाम आते हैं । हरयाणा में पंजाब के हिन्दी रक्षा आन्दोलन को जन – जन तक पहुंचाने का कार्य इन्हीं के बलबूते पर सम्भव हुआ । आर्यसमाज द्वारा चलाए गए प्रत्येक आन्दोलन की ये रीढ़ की हड्डी बने ।

उधर दयानन्द एंग्लो वैदिक शिक्षा पद्धति ने भी हिन्दी रक्षा आन्दोलन से पूर्व स्कूल और कालेजों का जाल बिछा दिया था । पंजाब के गुरुकुल और डी . ए.वी. संस्थाओं के विद्यार्थियों , अध्यापकों , प्रबन्धसमिति के सदस्य एवं स्नातकों ने ग्राम – ग्राम , नगर – नगर हिन्दी सत्याग्रह की दीपशिखा को अकम्पित रखकर आलोकित किया ।

लेखक :- डॉ रणजीत सिंह
पुस्तक :- पंजाब का हिन्दी रक्षा आंदोलन

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