ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

इन अजीम शख्सियतों ने भारत के लिए छोड़ दिया था पाकिस्तान

भारत के बंटवारे और पाकिस्तान के बनने के बाद कई मुस्लिम लेखक और कलाकार पाकिस्तान गए। लेकिन पाकिस्तान में जिस तरह के हालात उन्होंने देखे, वह देख वे भारत लौट आए। इन लोगों में शाहरुख खान के पिता ताज मोहम्मद खान, उर्दू लेखिका कुर्रतुल एन हैदर, गीतकार साहिर लुधियानवी, मुस्लिम लीग के नेता जोगेन्द्र नाथ मंडल, महान शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खां और बेगम पारा जैसी शख्सियतें शामिल हैं।
इनमें से ज्यादातर जन्मभूमि होने के कारण पाकिस्तान गए लेकिन वहां जिस तरह के हालत देखे उसके बाद पाकिस्तान छोड़ने में जरा भी देर नहीं की। इनका मानना था कि पाकिस्तान में खुलकर बात कहने का, सही बात कहने का और अपने विचार जाहिर करने का माहौल नहीं है। उन्होंने पाया कि यह उनके सपनों का मुल्क नहीं है और लिहाजा वे सभी भारत लौट आए। वे बरसों-बरस बिना किसी शिकायत के भारत में रहे और कभी पाकिस्तान नहीं लौटे। यहां तक कि भारत की मिट्टी में ही उन्होंने आखिरी सांस भी ली।

उर्दू साहित्य में अजीम नाम कुर्रतुल एन हैदर लखनऊ में पिता की मौत के बाद अपने भाई मुस्तफा हैदर के साथ पाकिस्तान चली गई थीं लेकिन जल्दी ही उन्होंने महसूस किया कि वे भारत में ही रहना चाहती हैं। पाकिस्तान से लंदन चलने जाने के बाद जब वे भारत आई थीं तो उनके पिता के मित्र मौलाना अबुल कलाम आजाद ने उनसे पूछा था कि क्या वे भारत में रहना चाहेंगी?

उन्होंने इसे बुलावा समझकर भारत आना मंजूर कर लिया। कहा यह भी जाता है कि अपनी किताब ‘आग का दरिया’ (1959) के प्रकाशन के बाद वे पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गई थीं और उन्होंने यहां की नागरिकता ले ली थी। उनके पाकिस्तान छोड़कर भारत आने को लेकर तमाम तरह की बातें होती रही हैं। कुछ लोगों का तो यह भी मानना रहा कि बंटवारे पर लिखे उनके उपन्यास ‘आग का दरिया” को पाकिस्तान में बैन कर दिया गया था और इसी कारण उन्होंने पाकिस्तान छोड़ा लेकिन यह सच नहीं है।

इस उपन्यास की कई प्रतियां पाकिस्तान में छपती रहीं। कुदरत उल्ला साहब ने इस बारे में अपने संस्मरण ‘साहब नामा’ में लिखा है, ‘पाकिस्तान में मार्शल लॉ के बाद अखबारों पर कडी सेंसरशिप लग गई थी। किसी भी तरह की अफवाह फैलाना जुर्म था। जैसे ही मार्शल लॉ लागू हुआ एक दिन कुर्रतुल एन हैदर मेरे पास आई। उनके बाल बिखरे थे, चेहरा झुका था और आंखों में उदासी थी। उन्होंने आते ही पूछा, ‘अब क्या होने वाला है?’

मैंने पूछा, ‘किस बारे में अब क्या होने वाला है?’

वे बोली, ‘अपने घर में बैठकर अब कोई कुछ भी नहीं लिख सकता है। क्या यह जुर्म है।’

‘मैंने कहा, हां किसी भी तरह की गॉसिप अफवाह को जन्म दे सकती है।’

‘तो अब किसी को बोलने की भी मनाही रहेगी।’ हैदर को इस बात से दर्द था।

जब मैंने उसे मार्शल लॉ में किसी तरह की बात करने का मतलब समझाया तो हैदर की आंखों में आंसू आ गए। अपनी भावनाएं छुपाते हुए वे इस तरह बोलीं मानो उन्हें परवाह ही नहीं हो, ‘कौन रोज कुछ न कुछ बोलना चाहता है। मुझे तो मतलब बस इस बात से है कि बोलने की आजादी होना चाहिए।’ कुदरत उल्ला ने आगे लिखा है, ‘मुझे लगता है उसी समय कुर्रतुल ने पाकिस्तान छोड़ने का मन बना लिया था।’

हालांकि कुर्रतुल ने इस बात से इंकार किया। हैदर के पाकिस्तान छोड़ने के बारे में ऐसी ही एक और टिप्पणी अख्तर जमान खान ने भी की थी। उन्होंने उनके उपन्यास का हवाला देकर लिखा है कि उसमें वे लिखती हैं, ‘मैं मानती हूं कि कमाल भले ही पाकिस्तान आ गया हो लेकिन वह अपना दिल हिंदुस्तान में ही छोड़ आया है। यहां वह खुद को महफूज नहीं पाता है। यह 1957 का पाकिस्तान है। शरणार्थी खुद को अपनी जमीन पर नहीं पा रहे थे। वे जमीन के इस टुकडे पर जरूर रह रहे थे लेकिन उनके दिल उनके पुरखों के घर में ही छूट गए थे।’

मुस्लिम लीग नेता भी भारत आए

जोगेन्द्र नाथ मंडल उन लोगों में से थे जो मुस्लिम लीग के अहम सदस्यों में थे लेकिन उन्हें भी पाकिस्तान के बुरे हालात के कारण वह देश छोड़ना पड़ा। जोगेन्द्र नाथ 1946 के राजनीतिक मंडल में मंत्री थे। 1946 के इलेक्शन के बाद ब्रिटिश राज में अंतरिम सरकार बनी तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने अपने प्रतिनिधि चुने जो कि मंत्री के तौर पर सरकार में काम करेंगे। मुस्लिम लीग ने जोगेंद्र नाथ मंडल का चुनाव किया था।

बाद में वे 11 अगस्त 1947 को वे उस ऐतिहासिक सत्र के सभापति भी थे जिसमें मोहम्मद अली जिन्नाा ने पाकिस्तान के गवर्नर जनरल के रूप में शपथ ली थी। जिन्नाा का जोगेंद्र नाथ मंडल पर बहुत भरोसा था। मंडल हिंदू धर्म के अछूत या दलित वर्ग से आते थे। जिन्हें भारत में कम सम्मान हासिल था। लेकिन जिन्नाा उनके विजन के कारण उन्हें पसंद करते थे। जिन्नाा चाहते थे कि मंडल पाकिस्तान में रहकर वहां अच्छा माहौल बनाने में मदद करें। मंडल पाक गए भी।

मंडल को पाकिस्तान में पहला कानून और श्रम मंत्री भी बनाया गया था। लेकिन पाकिस्तान अपने बनने के बाद से ही सेकुलर राष्ट्र की अवधारणा से भटक गया। वहां की सरकार में काम करने वालों ने ताकत का बेजां इस्तेमाल करना शुरू किया। उनका पहला निशाना थे वे गैर मुस्लिम राजनीतिज्ञ और कारिंदे जो किसी भी तरह की हैसियत से सरकार में थे।

उन्हें बाहर करने के लिए इन लोगों ने उनकी देशभक्ति के खिलाफ संदेह पैदा किए। उन हिंदुओं और अल्पसंख्यकों को यह कहा गया कि उनका समर्थन सरकार को कोई फर्क नहीं डालेगा और पाकिस्तान में उनका स्वागत नहीं होगा। जल्दी ही मंडल को इस बात का एहसास हुआ कि जिस मुल्क को उन्होंने अपना घर समझा था वह जगह उनके रहने के लिए नहीं है। जैसे ही जिन्ना की मौत हुई मंडल भारत लौट आए। पाकिस्तान में आज भी ऐसे कई जोगेंद्रनाथ हैं जो अपनी देशभक्ति साबित करने में लगे हैं और बार-बार असफल साबित होते हैं।

शाहरुख के अब्बू ने छोड़ा पाक

शाहरुख खान के पिता ताज मोहम्मद खान कांग्रेसी थे। वे आज के पाकिस्तान और 1947 से पहले के फ्रंटियर सूबे में में स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े थे। जब 1947 में भारत मजहब के नाम पर बंटा तो मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई में मुस्लिम लीग का पृथक राष्ट्र का सपना पूरा हुआ। यानी 23 मार्च,1940 को मुस्लिम लीग का लाहौर के मिंटोपार्क में आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन में जो सपना देखा था, वह करीब सात सालों में साकार हो गया। लेकिन, ताज मोहम्मद को जिन्ना का पाकिस्तान मंजूर नहीं था।

इन्हें मुसलमान होने के बाद भी इस्लामिक मुल्क में रहना नामंजूर था इसलिए वे पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गए थे। उस समय ताज मोहम्मद खान गहरी दुविधा में थे कि वे अपने पुरखों की जमीन पेशावर को छोड़कर भारत जाएं या नहीं लेकिन आखिरकर उन्होंने सेकुलर भारत को चुना।

शाहरुख के अब्बू भारत-पाक बंटवारे के खिलाफ भी थे और नहीं चाहते थे कि धर्म के आधार पर भारत के दो हिस्से हों लेकिन ऐसा हुआ और इस बात ने उन्हें बहुत तकलीफ दी थी। ताज मोहम्मद खान महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार के पक्के समर्थक और उनसे गहरे प्रभावित थे। वे भारत आने के बाद भी आखिरी सांस तक गांधी मूल्यों के साथ जीते रहे।

इस्लामिक पाक से सेकुलर भारत

भारत के लुधियाना में पैदा हुए साहिर लुधियानवी भी उन मुस्लिमों में से हैं जो पाकिस्तान जाने के बाद फिर से भारत लौटे। लुधियाना में ही अपनी कॉलेज की पढ़ाई करते हुए जब साहिर कॉलेज से निकाले गए तो 1943 में वे पाकिस्तान के लाहौर में बस गए। यहां उन्होंने 1945 में उर्दू में अपना पहला काम ‘तल्खियां’ शीर्षक से प्रकाशित किया। कई मैग्जीन का संपादन किया और प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बन गए।

हालांकि जब उन्होंने पाकिस्तान में कम्युनिज्म को बढ़ावा देने वाला बयान दिया तो पाकिस्तान सरकार उनके पीछे पड़ गई। 1949 में साहिर लाहौर छोड़कर दिल्ली आ गए। बंटवारे के बाद भारत आने का एक कारण यह भी था कि साहिर के कई हिंदू और सिख दोस्त इस्लामिक पाकिस्तान से सेकुलर भारत आ गए थे और उन्हीं की तरह साहिर भी भारत आ गए।

कुछ दिनों दिल्ली रहने के बाद साहिर मुंबई चले आए। वे मुंबई के उपनगर अंधेरी में रहे जहां उनके पड़ोसी गुलजार, कृश्न चंदर थे। उन्होंने 1970 में ‘परछाइयां’ नाम से एक बंगला बनाया और अपने आखिरी दिनों तक वहीं रहे। एक बार पाकिस्तान छोड़ा तो फिर कभी वहां जाने का इरादा नहीं किया।

बड़े गुलाम अली खां जब हो गए भारत के

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का नाम शास्त्रीय गायकी में बड़े ही अदब के साथ लिया जाता है। अविभाजित भारत में उनका जन्म पंजाब के कसूर में हुआ था। बंटवारे के बाद यह लाहौर में चला गया। जब1947 में देश का बंटवारा हुआ तो गुलाम अली अपने जन्मस्थान लाहौर चले गए। उनका कहना था, ‘अगर भारत के हर घर में एक बच्चे को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम दी जाती तो भारत का बंटवारा कभी न होता।’

गुलाम अली ने 1957 में भारत की नागरिकता ली और फिर वे भारत के होकर रह गए। दिलीप कुमार के छोटे भाई नासिर खान की पत्नी बेगम पारा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक जाना पहचाना नाम रही हैं। उन्हें आखिरी बार संजय लीला भंसाली की फिल्म में सांवरिया में देखा गया था। अपने पति के इंतकाल के बाद 1975 में पाकिस्तान चली गई थीं लेकिन वहां की स्थितियां उन्हें रहने के लिए माकूल नहीं लगी और वे वापस भारत लौट आईं।

जोगेन्द्र नाथ मंडल

* 1947 में पाकिस्तान गए

* 1950 में भारत आ गए

* पाकिस्तान के निर्माताओं में से एक। पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री। जिन्ना के चेहते थे। उम्मीद के साथ पाकिस्तान गए थे मगर टूटा दिल लेकर लौटे।

मीर ताज मोहम्मद खान

* 1947 बंटवारे से पहले भारत आए

* ताज मोहम्मद खान कांग्रेस के लीडर थे। वे महात्मा गांधी और खान अब्दुल गफ्फार से बहुत प्रभावित थे। उन्हें ऐसे मुल्क में रहना नापसंद था जो तंगनजर हो और वे पाक छोड़ भारत आ गए।

बड़े गुलाम अली खां

* 1947 में पाकिस्तान गए

* 1950 में वापस लौटे

* बड़े गुलाम अली खां का जन्म चूंकि पाकिस्तान में हुआ था तो मातृभूमि से लगाव के चलते वे पाकिस्तान गए थे लेकिन पाक उन्हें रास नहीं आया।

साहिर लुधियानवी

* 1943 में वे लाहौर बस गए

* 1949 में दिल्ली लौटे

* साहिर लुधियानवी भी पाकिस्तान गए थे लेकिन उन्हें लगा कि पाकिस्तान में तंग माहौल है और इसलिए उन्हें लाहौर छोड़कर दिल्ली आना पड़ा।

कुर्रतुल एन हैदर

1947 में पाकिस्तान गईं
1960 में भारत वापसी
पूरी शिक्षा भारत में ही हुई। पिता सज्जाद हैदर की मौत के बाद वे पाकिस्तान गईं और वहीं पर उपन्यास ‘आग का दरिया’ लिखा। लेकिन पाकिस्तान के मार्शल लॉ ने उन्हें बहुत दुखी किया। आखिरकर वे लंदन गईं और वहां से भारत लौट आई। भारत को ही उन्होंने अपना घर बनाया।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top