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बाह क्या तर्क है, देश मे प्रदूषण है इसलिए ज़हरीली मैगी भी खाओ

दो मिनट में बनकर तैयार हो जाने वाली मैगी ने सारे भारत को हिला दिया है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि इस बार तो स्वाद पूरी तरह बेमजा हो गया। नेस्ले के नूडल्स घर-घर ही नहीं, अब तो गांवों तक अपनी पहुंच बना चुके थे। वे लोग जो चाहते हैं कि सारी दुनिया में एक भाषा, एक पहनावा, एक खाना ही चले, मैगी जैसे प्रचलन को अपनी विचारधारा की व्यावहारिक सफलता की सीढ़ी मान रहे होंगे।

 

दिल्ली में कम से कम पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाला शायद ही कोई ऐसा बच्चा मिले, जो फास्ट फूड का शौकीन न हो। अनेक घरों में मैगी सारे परिवार की पसंद बन गई है। कई बार दादा-दादी को भुनभुनाते देखा जा सकता है कि बच्चे सुबह-शाम मैगी ही मांगते हैं और माता-पिता प्यार से उनकी मांग पूरी करते रहते हैं। वैसे बड़े शहरों में जब माता-पिता भी मैगी का नाश्ता करके ही कार्यस्थल पर जाते हों तो बच्चों की तो पौ-बारह होगी ही।

 

बहुराष्ट्रीय कंपनियां जानती हैं कि खाने में ऐसा क्या मिलाएं कि खाने वाला उनके उत्पाद का लती हो जाए, ठीक वैसे ही जैसे शराब या ड्रग्स की लत लग जाती है तो छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। जंक फूड स्वास्थ्य के लिए और विशेषकर बच्चों के लिए हानिकारक है, ऐसा तो हर जानकार समझाता रहता है। कई स्कूल अपने परिसर में इसे लाने पर प्रतिबंध भी लगा देते हैं। बदली पारिवारिक परिस्थितियों में अब घरों पर यह प्रतिबंध लग नहीं सकता है। जंक फूड के कारण बच्चों में मोटापा बढ़ा है। इसके कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण भी उपलब्ध है, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी उस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

 

इसे थोड़े बड़े पटल पर देखें तो साफ दिखाई देगा कि इस सबको नियंत्रित करने के लिए प्रवाह के विरुद्ध तैरने का साहस पैदा करना होगा। ऐसा तभी हो सकता है जब समाज का प्रत्येक वर्ग बच्चों के साथ हो रहे अन्याय को रोकने में भागीदारी करने को तैयार हो। सभी जानते हैं कि इस समय सारे विश्व में भौतिकता तथा आध्यात्मिकता के बीच एक अनकही, मगर संघर्षपूर्ण दौड़ हो रही है, जिसमें लोग चकाचौंध से प्रभावित होकर हर प्रकार से अधिकाधिक अर्जन और संग्रह करने को ही जीवन का लक्ष्य मान बैठे हैं।

 

बच्चे तो जो देखते हैं, उसी का अनुसरण करते हैं। अगर टीवी पर लगातार आइटम नंबर चलेगा तो दो-तीन साल का बच्चा भी उस पर थिरकेगा और वैसा ही पंद्रह-सोलह साल का तरुण भी करेगा। इसमें वे भी होंगे, जो स्कूल छाेड चुके हैं और नहीं जानते हैं कि आगे उन्हें किस दिशा में जाना है। उनके मन-मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ेगा, वह संभवत: सामाजिक मानदंडों पर खरा नहीं उतरेगा। मगर उस फिल्म निर्माता तथा अभिनेता का बैंक बैलेंस खूब बढ़ेगा और वह उसके आगे नहीं सोचेगा, ठीक जंक फूड बेचने वाली कंपनी की तरह, जिसे बच्चों से नहीं, केवल अपने मुनाफे से मतलब है।

 

बच्चों के आगे बढ़ने की प्रक्रिया में आदर्श चाहिए, हीरो चाहिए और आजकल वे इन्हें फिल्म अभिनेताओं तथा क्रिकेट जैसे खेलों के नामी-गिरामी लोगों में ढंूढते हैं। यह गठबंधन उन लोगों को भरमाता है, जो हीरो फैन हैं। उत्पाद बेचने वाले हीरो की तिजोरी भरते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं। क्या पचास-साठ के दशक में कोई सोच सकता था कि एक दिन कोई 'भारत रत्न' पैसे लेकर लग्जरी कारों का विज्ञापन करेगा या किसी कंपनी का इन्वर्टर खरीदने के लिए हमें प्रोत्साहित करेगा? एक भारत रत्न थे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, जब राष्ट्रपति पद से निवृत्त होकर पटना गए तो कुछ सौ रुपयों के अलावा उनके पास घर तक नहीं था। न कोई पेंशन न सरकारी बंगला। वहीं ये नायकों के नायक हर चीज बेचने को तैयार रहते हैं।

 

हमारे अपने लोगों को ही देश के बच्चों की चिंता नहीं है, फिर विदेशी कंपनी क्यों करे? यही नहीं, कई सेलेब्रिटीज बिना हिचक टीवी पर नेस्ले का पक्ष लेते नजर आए। नेस्ले के सीईओ खुलेआम भारत की प्रयोगशालाओं की क्षमताओं की हंसी उड़ाते हैं। जब पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश की सरकारों को मैगी में कुछ अवांछित नहीं लगता है तब वे भी उन्हीं के साथ बेशर्मी से खड़ी दिखाई देती हैं। एक लंबी सूची उन लोगों की है, जो चाहते हैं कि नेस्ले को कुछ न कहा जाए, हमें विदेशों से निवेश जो कराना है। सरकार कार्रवाई करने में हिचक के साथ ही कदम उठा पाती है।

 

ऐसा भी तो कहा जा सकता था कि जब तक भारत की अपनी प्रयोगशालाएं पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाएंगी, नेस्ले के उत्पाद भारत में बेचे नहीं जा सकेंगे। हफ्ते-पंद्रह दिन का प्रतिबंध हिचक तथा साहस की कमी ही दर्शाता है। दिल्ली की हवा जहरीली है, यमुना का पानी गंदा है, क्या यह तर्क भारत के बच्चों को जहरीला जंक फूड खिलाने के पक्ष में दिया जा सकता है? वैसे सभी जानते हैं कि प्रत्येक बहुराष्ट्रीय कंपनी हर देश में अपनी एक लॉबी तैयार करती है और उचित समय पर उसका उपयोग करती हैं। क्या नेस्ले भी यही नहीं कर रही है?

 

बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने हमें क्या-क्या दिया है? नौकरियां दी हैं, हमें आधुनिक महसूस करने के मौके दिए हैं, अच्छी गुणवत्ता के उपकरण दिए हैं। उन्होंने हमें भोपाल की त्रासदी भी दी है। आज 31 साल बाद भी पीढ़ियां उसका दर्द झेल रही हैं। दोषी लोगों को न तो हमारी सरकारें सजा दिला पाईं और न आज तक उचित मुआवजा ही लोगों को मिल पाया है। यूनियन कार्बाइड भारतीयों के जीवन का मूल्यांकन अमेरिकियों के बराबर करने को तैयार न थी, आज नेस्ले भी वही कर रही है। भारत में ऐसी कोई आवाज नहीं उठ रही है कि अपराध सिद्ध होने पर कंपनी को पूरा हर्जाना देना पड़ेगा। हमें अपनी नियामक संस्थाओं पर पूरा विश्वास करना होगा और उन्हें लगातार सक्रिय बने रहने के लिए सशक्त करना होगा।

 

भारतीयों के स्वास्थ्य और लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने का दुस्साहस करने वालों को उचित उत्तर देने की क्षमता भारत में है। भारत नेस्ले के साथ कैसे निपटता है, इसके दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। भारत की सशक्त सरकार इस बार यूनियन कार्बाइड के समय जैसी निरीहता की स्थिति में नहीं दिखेगी, ऐसा लोगों को विश्वास है।

-एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक

साभारt: http://naidunia.jagran.com/ से 

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