हमारे समय में गर्मियों के मौसिम में कश्मीर के खीरभवानी/तुलामुला मंदिर में साधू-संत और बाबाजी खूब हुआ करते थे । एक तो मध्य भारत की गर्मी से बचते थे और दूसरा देवी अर्चना में अपना ध्यान भी लगाते थे। ये बातें पचास के दशक की होनी चाहिए। एक बार जेष्ठअष्टमी के मेले के अवसर पर मैं इस मंदिर में जगदम्बा माता के दर्शनों के लिए गया हुआ था। आरती के बाद एक बाबाजी से भेंट हुयी। आशीर्वाद के तौर पऱ उन्होंने मुझे एक श्लोक पढ़कर सुनाया और आग्रह किया कि भविष्य में मैं सदैव दो-पंक्तियों वाले इस सूत्र का नियमित रूप से पाठ किया करूँ। देवी जगादम्बा माता की कृपा सदैव बनी रहेगी। उन्होंने यह श्लोक मुझे लिख कर भी दिया।मैं कई वर्षों तक इस श्लोक का पाठ करता रहा। इस श्लोक का मूल अर्थ इस प्रकार से है:
ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये= सभी मंगलों में मंगल
शिवे= कल्याणकारी
सर्व अर्थ साधिके= सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाली
शरण्ये = शरणागत वत्सला , शरण करने योग्य
त्रयम्बके= तीन नेत्रों वाली
गौरी= शिव पत्नी
नारायणी= विष्णु की पत्नी
नमः अस्तु ते = तुम्हे नमस्कार है।
(सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली, मंगलमयी कल्याण करने वाली, सब के मनोरथ को पूरा करने वाली, तुम्हीं शरण ग्रहण करने योग्य हो। तीन नेत्रों वाली यानी भूत भविष्य वर्तमान को प्रत्यक्ष देखने वाली हो, तुम्ही शिव पत्नी, तुम्ही नारायण पत्नी अर्थात भगवान के सभी स्वरूपों के साथ तुम्हीं जुडी हो, तुम को नमस्कार है।)


