प्रायः अनुभव किया गया है कि हमारे देश की कई सारी सामाजिक संस्थाओं के नाम ख़ास तौर पर होस्टलों के नाम जातियों पर रखे गये मिलेंगे। मसलन:जाट होस्टल,राजपूत होस्टल,ब्राह्मण छात्रावास,मीणा छात्रावास,यादव होस्टल आदि-आदि ।जब हम पहले से ही होस्टलों को उनकी जाति या वर्ण से चिन्हित करते हैं तो हम,सच में,समाज को जातिगत वर्गों में बाँटकर कोई अच्छा संदेश नहीं देते हैं बल्कि छात्रों में जातिगत भेदभाव और कटुता को ही  बढ़ावा देते हैं।अगर हमार देश धर्मनिरपेक्ष देश है तो ऐसे नामकरण 'धर्मनिरपेक्षता' की कोई सार्थक मिसाल बिल्कुल भी पेश नहीं करते।समय आगया है जब जातियों के आधार पर संस्थाओं का नामकरण करने की परंपरा को समाप्त किया जाय।

बहुत पहले की बात है।मेरा तबादला राजस्थान के एक दूरदराज़ इलाके में हुआ था।जब तक मैं अपने परिवार को ले जाता,मैं ने वहाँ के एक अच्छे और चर्चित होस्टल/विश्रामालय में ठहरने का मन बनाया।भोजन भी यहां ठीकठाक मिलता था।संपर्क करने पर होस्टल के मैनेजर ने साफ-साफ कह दिया कि यह होस्टल एक विशेष सम्प्रदाय के लोगों के लिए सेठजी ने खोला है,सभी के लिए नहीं।मेरे खूब निवेदन करने पर कि कुछ दिनों की ही तो बात है।परिवार के आजाने पर मैं खुद ही आना बंद कर दूंगा।मग़र प्रबन्धक महोदय माने नहीं। तभी मैं मन में सोचने लगा जो सामाजिक संस्थाएं अथवा होस्टल ज़रूरत पड़ने पर आपके काम न आएं और अपनी जातिवादी मानसिकता पर अडिग रहे,उनकी समाजसेवा और जातिगत अस्मिता किस काम की?