लेखन एक सृजनात्मक कर्म है। यह केवल शब्दों को कागज़ पर उतारना नहीं, बल्कि मन की अनुभूतियों, विचारों और संवेदनाओं को समाज के सामने रखने का माध्यम है। लेखक के पास कलम है, शब्द हैं और अपने समय को देखने-समझने की दृष्टि है। इसलिए यदि कोई लेखक लिखना चाहता है तो उसे लिखने से रोकने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। विचारों पर पहरे बिठाना न उचित है, न लोकतांत्रिक।
लेकिन लेखक के लिए केवल निर्भीक होकर लिखना ही पर्याप्त नहीं है। जितना आवश्यक उसका स्वतंत्र होना है, उतना ही आवश्यक उसका समदर्शी होना भी है। लेखक की दृष्टि व्यापक होनी चाहिए। वह किसी एक पक्ष, वर्ग, विचारधारा या समूह के प्रति इतना अनुरक्त न हो जाए कि दूसरे पक्ष को देखना ही बंद कर दे।
लेखक यदि एक आँख खोलकर और दूसरी आँख बंद करके लिखेगा, तो उसकी लेखनी स्वाभाविक रूप से एकांगी हो जाएगी। वह भले ही प्रभावशाली भाषा में लिखे, लेकिन उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। साहित्य और पत्रकारिता दोनों में लेखक की सबसे बड़ी पूँजी उसकी निष्पक्ष दृष्टि और विश्वसनीयता होती है।
समदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि लेखक सही और गलत के बीच कोई अंतर ही न करे। इसका अर्थ यह है कि वह निर्णय देने से पहले सभी पक्षों को समझने का प्रयास करे। वह केवल अपने अनुकूल तथ्यों को न चुने, बल्कि उन तथ्यों को भी सामने रखे जो उसके अपने विचारों को चुनौती देते हों। सत्य यदि किसी एक पक्ष में है तो उसे स्वीकार करने का साहस लेखक में होना चाहिए; और यदि दूसरे पक्ष में भी कुछ सत्य है तो उसे मानने में संकोच नहीं होना चाहिए।
लेखक की आवाज़ बुलंद होनी चाहिए, लेकिन वह केवल उसकी अपनी आवाज़ नहीं होनी चाहिए। यदि वह सचमुच समाज का लेखक है, तो उसकी आवाज़ में समाज के विभिन्न वर्गों की धड़कन सुनाई देनी चाहिए—गरीब और अमीर, किसान और मजदूर, स्त्री और पुरुष, युवा और वृद्ध, बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक, गाँव और शहर—सभी की।
लेखक का दायित्व है कि वह उन लोगों की आवाज़ भी बने जिनकी आवाज़ अक्सर दब जाती है या जिन्हें अपनी बात कहने का अवसर नहीं मिलता। उसकी लेखनी केवल सुविधा-संपन्न वर्ग की समस्याओं तक सीमित न रहे। उसमें उन लोगों का दुःख भी दिखाई दे, जिनके पास अपनी पीड़ा व्यक्त करने के लिए मंच नहीं है; उनकी आशाएँ भी दिखाई दें, जिनके सपने अक्सर व्यवस्था और परिस्थितियों के बीच दब जाते हैं।
हाँ, यह भी सच है कि लेखक जब किसी विशेष पक्ष का समर्थन करेगा तो दूसरा पक्ष उससे नाराज़ होगा। यह स्वाभाविक है। समाज में विचारों की विविधता है और हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण है। कोई भी विचार सर्वमान्य हो, यह आवश्यक नहीं। इसलिए लेखक का किसी मुद्दे पर एक मत रखना अपने-आप में गलत नहीं है। प्रश्न यह है कि वह अपने मत को किस प्रकार प्रस्तुत करता है।
यहीं एक कठिन प्रश्न सामने आता है—सही पक्ष कौन-सा है और गलत पक्ष कौन-सा?
इसका उत्तर हमेशा सरल नहीं होता। कई बार जो बात हमें सही दिखाई देती है, वही दूसरे व्यक्ति को गलत लग सकती है। परिस्थितियाँ, अनुभव, विचारधारा और जीवन-दृष्टि हमारे निर्णयों को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी पक्ष को सही और दूसरे को गलत घोषित कर देना हमेशा इतना आसान नहीं होता।
यही कारण है कि लेखक को अपने निष्कर्षों में भी विनम्रता रखनी चाहिए। उसे अपनी बात दृढ़ता से कहनी चाहिए, लेकिन यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि अंतिम सत्य उसी के पास है। असहमति को स्थान देना, दूसरे दृष्टिकोण को सुनना और तर्क के आधार पर विचार करना स्वस्थ समाज की पहचान है।
वास्तव में, लेखन का उद्देश्य केवल किसी को सही सिद्ध करना या किसी को गलत साबित करना नहीं होना चाहिए। लेखन का उद्देश्य विचार पैदा करना, प्रश्न उठाना और पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करना भी है। जहाँ विचारों का टकराव होता है, वहीं से संवाद की शुरुआत होती है; और जहाँ संवाद होता है, वहीं से समाज आगे बढ़ता है।
इसलिए लेखक लिखे—खूब लिखे, निर्भीक होकर लिखे, अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर लिखे। लेकिन वह अपनी लेखनी को किसी एक पक्ष का हथियार न बनाए। वह एक आँख खोलकर दूसरी बंद करके न लिखे। उसकी दृष्टि दोनों ओर जाए, उसकी संवेदना सभी के लिए हो और उसका विवेक किसी दबाव में न झुके।
लेखक की कलम स्वतंत्र हो, दृष्टि समदर्शी हो और आवाज़ सबकी आवाज़ बने—तभी उसका लेखन केवल प्रभावशाली नहीं, बल्कि सार्थक और विश्वसनीय भी बन सकेगा।
डॉ. शिबन कृष्ण रैणा
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