Thursday, June 13, 2024
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गौसेवा व गौसंक्षण के साथ ही चमत्कारिक घरेलू चिकित्सा को नई पहचान देने वाले उत्तम माहेश्वरी

#उत्तम_माहेश्वरीः पुराना नक्शा इनके पास है।
हम सभी अपना जीवन आनंद के साथ बिताना चाहते हैं, लेकिन आनंद को सही परिप्रेक्ष्य में समझना और उसे प्राप्त करना आसान नहीं होता। इसके लिए नक्शे की जरूरत पड़ती है। प्रायः यह नक्शा हमें वह समाज देता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। जब हम इस नक्शे को पढ़ते हुए आगे बढ़ते हैं तो हमारा जीवन सुगम हो जाता है या यूं कहें कि हमारी कठिनाइयां कम हो जाती हैं।

यह नक्शा वास्तव में उन परंपराओं से बनता है जिसे समाज अपने लंबे अनुभव से आकार देता है। परंपराएं हमेशा सही हों, यह जरूरी नहीं। वे रूढ़ और विकृत भी हो जाती हैं, इसलिए देश-काल को ध्यान में रखकर स्वस्थ समाज उन्हें बदलता रहता है, लेकिन वह उन्हें एक सिरे से खारिज नहीं करता। पूरी दुनिया की यही रीति रही है। तथापि, पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से कुछ अलग होने लगा है।

आज कई समुदाय समाज के नक्शे को फेंक करके बाजार का दिया नक्शा पढ़ रहे हैं। खान-पान, रहन-सहन और आचार-विचार से जुड़ी उनकी तमाम गतिविधियां परंपराओं की बजाए बाजार के इशारे पर तय होती हैं। यह वर्ग ऊपरी तौर पर खुश है, किंतु अंदर ही अंदर खोखला हो रहा है। धीरे-धीरे उसे भी समझ में आ रहा है कि बाजार के नक्शे में खोट है। लेकिन इस समझ के बावजूद वह असहाय है। वह बाजार के ही नक्शे के सहारे जिंदगी जी रहा है, क्योंकि उसे समाज के पुराने नक्शे के बारे में कुछ भी नहीं मालूम। वह उसे पहले ही फेंक चुका है।

सौभाग्य से पुराना नक्शा अभी लुप्त नहीं हुआ है। जब अधिकतर लोग उसे फेंक रहे थे, तब कुछ लोगों ने उसे संवारने और सहेजने का काम किया। आज ये लोग चारों ओर घूमकर जहां एक ओर बाजार के नक्शे की खोट के बारे में लोगों को सावधान कर रहे हैं, वहीं समाज के बनाए पुराने नक्शे के बारे में लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं।
ऐसे ही एक व्यक्ति हैं जिनका नाम है उत्तम माहेश्वरी। उत्तम जी का जन्म मुंबई में हुआ। पढ़ाई-लिखाई वहीं के स्कूल कालेजों में हुई। बीएड करने के बाद जब नौकरी करने की बात आई तब उन्होंने एक अलग ही राह चुन ली। 1989 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बन कर वे पूर्वोत्तर भारत चले गए जहां उन्हें स्थानीय लोगों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

उत्तम जी को अपना काम अच्छा लग रहा था, लेकिन मुंबई में पला-बढ़ा उनका शरीर पूर्वोत्तर भारत की कठिनाइयों को झेल नहीं पाया। जब तबियत अधिक खराब होने लगी, तब उनके पिताजी उन्हें मुंबई वापस ले आए। मुंबई में स्वास्थ्य लाभ करते हुए उत्तम जी को वेणीशंकर मोरारजी बसु की विश्व मंगल ग्रंथ-माला पढ़ने का मौका मिला। इस ग्रंथ-माला की 32 किताबों ने उनकी आंखें खोल दीं। इसके कारण जमीन, गांव और खेती से जुड़े विषयों में उनकी रुचि बढ़ गई।

एक बार लगन लगी तो उत्तम जी ने जापानी कृषि दार्शनिक मासानोबू फुकुओका को भी समझने का प्रयास किया। इसी क्रम में वे प्रसिद्ध प्राकृतिक कृषक पूनमचंद बाफना और भाष्कर सावे के खेत पर भी गए। वहां जो उन्होंने देखा और अनुभव किया, उसके बाद मुंबई में रहना उनके लिए मुश्किल हो गया। गांव में जाकर खेती और गौ-पालन करना उनकी पहली प्राथमिकता बन गया।

उत्तम जी की इस नई अभिरुचि को उनके पिता डाक्टर गौरी शंकर माहेश्वरी का भरपूर साथ मिला। मकराना, राजस्थान के अपने पुश्तैनी गांव में पिता-पुत्र ने खाली पड़े खेतों पर प्रयोगों का एक नया क्रम प्रारंभ किया। डा. गौरीशंकर देशी गाय के महत्व को समझते थे। जब देश भर में जर्सी गायों को बढ़ावा दिया जा रहा था, उस समय उन्होंने देशी गाय पर आधारित गो गव्य चिकित्सा की बात की और देश-विदेश में घूमकर इसके बारे में लोगों को जागरूक किया था।

गांव में दस वर्ष रहने के बाद परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि उत्तम जी को एक बार फिर से मुंबई आना पड़ा। यहां आकर वे गोरक्षा और स्वदेशी के आंदोलन से जुड़े। उन्हें यह भी समझ में आया कि स्वास्थ्य के नाम पर आम आदमी के साथ कितना बड़ा धोखा हो रहा है। इसे तोड़ने के लिए उत्तम जी ने वर्ष 2005 में एक किताब लिखी जिसका नाम है- स्वास्थ्य षड्यंत्रों के युग में अपने डाक्टर स्वयं बनें। यह किताब लोगों को बहुत पसंद आई। दो वर्ष में ही इसकी सभी प्रतियां बिक गईं। इसी बीच एक और किताब आई जिसका नाम है गो-सुषमा। चित्र-कथा शैली में छपी उत्तम जी की यह किताब इतनी लोकप्रिय हुई कि दो ही वर्ष में इसके तीन संस्करण छापने पड़े।

उत्तम जी की किताब में ऐसी कई छोटी-छोटी बातें संकलित की गई हैं, जो हमारे स्वास्थ्य का आधार हैं किंतु उन्हें हम भूलते जा रहे हैं। जैसे- खड़ा होकर पानी नहीं पीना चाहिए, बार-बार मुंह जूठा नहीं करना चाहिए, भोजन करते समय मौन रहना चाहिए आदि-आदि। इस किताब को पढ़कर कई उपयोगी सूचनाओं के साथ-साथ एक विशेष जीवन दृष्टि भी मिलती है। उत्तम जी साफ-साफ कहते हैं, “इसमें पूरा ज्ञान नहीं है। हमें ज्ञान अपनी परंपराओं और परिवेश से ही मिलेगा, उनको देखने और समझने की दृष्टि देने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।

पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक ज्ञान और देशी गाय को आधार बना कर उत्तम जी रोगियों की चिकित्सा भी करते हैं। ऐसी कई जटिल बीमारियां जिनका एलोपैथी या किसी और पैथी में सटीक इलाज नहीं है, उसे वे कुछ घरेलू नुस्खों और परहेज आदि बताकर ठीक कर देते हैं। जो लोग उत्तम जी के उपचार से सही होते हैं उनके लिए वे किसी भी वैद्य या डाक्टर से बढ़कर हैं किंतु मजे की बात है कि उनके पास सरकार की दी हुई ऐसी कोई डिग्री नहीं है।

अपना उदाहरण देते हुए उत्तम जी कहते हैं कि स्वस्थ रहने या स्वस्थ रहने का तरीका बताने के लिए किसी का डाक्टर या वैद्य होना जरूरी नहीं है। भारतीय परंपरा में पगी हुई उत्तम जी की बातों में इतना दम है कि बड़े-बड़े हास्पिटल भी उन्हें अपने यहां भाषण देने के लिए बुलाते हैं। देश-विदेश के कई सामाजिक मंचों पर भी उत्तम जी की बात बड़े ध्यान से सुनी जाती है।

पिछले दो दशकों में उत्तम जी ने अपने प्रयासों से गोसेवा, गोरक्षा, स्वदेशी और पारंपरिक जीवन शैली से जुड़े विषयों को एक नई उंचाई दी है। आज हजारों-लाखों लोग उनकी बात को सुनते और उस पर अमल करते हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि यह सब पर्याप्त नहीं है। उत्तम जी ने जो अभियान प्रारंभ किया है, उसे आगे बढ़ाने में हम सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी होगी।

#संपर्कः https://www.facebook.com/UttamMaheshwariJi

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