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हिन्दू दर्शन के माध्यम से गणित की ऐतिहासिक यात्रा

कुम्भकोणम नगर के प्रसिद्ध सारंगपाणि मंदिर दर्शन के पश्चात भीड़-भाड़ वाले बाजार से होते हुए जब हम सभी विद्यार्थी-गण अपने शिक्षकों के साथ गणितज्ञ रामानुजन के घर पहुंचे तब तक शाम के पांच बज चुके थे। हमारे स्कूल-पिकनिक का आज प्रथम दिन था और गणितज्ञ रामानुजन का संरक्षित किया गया घर आज के दिन का अन्तिम गंतव्य था जहां उन्होंने अपने बचपन के महत्वपूर्ण वर्ष बिताए थे। हमारे पहुंचने तक स्मारक बन्द होने का समय हो चुका था।

स्मारक के मुख्य कमरे में रामानुजन की प्रतिमा स्थापित की गई है। गणित शिक्षक ने विद्यार्थियों को रामानुजन और उनके गणित में दिए गए योगदान की जानकारी देना शुरू किया।

उन्होंने हमें बताया कि “रामानुजन विलक्षण गणितज्ञ थे। इन्होंने अपने जीवन में के ३,८०० से अधिक गणितीय प्रमेयों की रचना की जिनमें से कुछ प्रमेयों पर शोधकार्य जारी है। यद्यपि इनके कुछ प्रमेय इतने गूढ़ हैं कि अभी तक मुख्यधारा की गणितीय शोधों में इन्हें समाविष्ट नहीं गया है। इनके प्रमेयों पर हो रहे शोधकार्य के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना भी की गई है।”

सभी विद्यार्थी शिक्षक का यह वक्तव्य बड़े ध्यान से सुने जा रहे थे किन्तु मेरे लिए यह सब उबाऊ जानकारी से अधिक कुछ नहीं था। अपने घर लौटने को आतुर वृद्ध चौकीदार भी मेरी ही तरह शिक्षक के भाषण के खत्म होने की प्रतीक्षा कर रहा था। वो बार बार जम्हाई लेते हुए अपनी नाराज़गी जता रहा था।

मैं भी इस वक्तव्य से छुटकारा पाने के लिए शिक्षकों की नज़रें चुरा कर घर के पिछले खुले भाग में चला गया जहां ठंडी हवा चल रही थी। वहां एक पुराना सा कुआँ था जिसे संभवतः घर में नहाने और पीने के पानी की आपूर्ति के लिए उपयोग किया जाता होगा। मुझे बन्द कमरे में पढ़ाए जाने वाले गणित और विज्ञान जैसे पारंपरिक विषयों की तुलना में ऐसे पुराने मकान, किले और प्राचीन मंदिर ज्यादा आकर्षित करते थे।

ठंडी हवा के झोंके से कब नींद लगी मैं समझ नहीं पाया। कुछ देर अहाते में बिता कर जब मैं मुख्य कमरे में वापस लौटा तब वहां घोर शांति पसरी हुई थी, सब लोग जा चुके थे। यहां तक कि वृद्ध चौकीदार भी स्मारक को बाहर से ताला लगा कर अपने घर की ओर प्रयाण कर गया था। कुछ पल के लिए मेरी बुद्धि शून्य हो गई। स्थिति समझने में थोड़ी देर लगी परंतु तब तक घर के बाहर घोर अंधेरा छा चुका था, भीड़ भरे बाजार में श्मशानवत सन्नाटा पसरा हुआ था। सूर्यास्त हो गया था और इस पुराने स्मारक मकान में मैं ग्यारह वर्ष का बालक अकेला बंद था।

करीब एक घंटा बीत चुका था और मैं किसी मदद की आस में वहीं मुख्य कमरे में बैठा था। तभी मैंने महसूस किया कि बगल वाले कमरे में कुछ गतिविधि चल रही है। इस कमरे का दरवाज़ा मुख्य कमरे में खुलता था लेकिन इसकी खिड़की सामने वाले मार्ग की और खुलती थी जिसमें से बाहर बाजार देखा जा सकता था। उस कमरे में प्रवेश करते ही मैंने पाया कि वहां खिड़की के पास एक दीपक जलाकर मेरा ही समवयस्क एक स्थूलकाय बालक अध्ययन में व्यस्त था। मुझे वहां पाते ही उसने मेरी तरफ देखा और वो मंद मुस्काया। स्थूल शरीर के बावजूद जिज्ञासा से चमकती आँखें और सौम्य मुस्कान किसी को भी उसकी ओर आकर्षित करने के लिए पर्याप्त थी।

मैं उसके करीब गया और खिड़की से बाहर देखने लगा। आश्चर्यजनक रूप से बाहर का दृश्य बदल चुका था। व्यस्त बाज़ार की जगह पुराने मकानों ने ले ली थी और अत्याधुनिक वाहनों के बदले सामने दो पुरानी साइकिलें नजर आ रही थीं। सामने की दीवार पर लगे कैलेंडर पर राजा रवि वर्मा का चित्र था और तारीख थी उन्नीस दिसम्बर अठारह सौ अठानवे।

मैंने अपनी दुविधा के समाधान हेतु उस बालक की ओर देखा तो वह अपनी नोटबुक में गणित के समीकरण सुलझाने में व्यस्त था। बात शुरू करने के उद्देश्य से मैंने पूछा “तुम्हारा नाम क्या है?” उसने उत्तर दिया “रामा, मुझे सब रामा के नाम से पुकारते हैं।”

मैंने फिर से पूछा “क्या तुम्हें यह गणित विषय पसंद है? मुझे इतिहास, कला और भाषा के विषयों में रुचि है पर गणित जैसे विषयों में जरा भी नहीं।” वह बोला “मुझे सिर्फ गणित में रूचि है और किसी विषय में नहीं। हमारी शिक्षा व्यवस्था सही होती तो सभी विषयों को गणित के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता था।”

रामा की यह बात मुझे बड़ी ही हास्यास्पद लगी। मैं होंठों के एक कोने से मुस्कुराया और रामा ने भांप लिया कि मैंने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया है। उसने कहा “खिडकी से बाहर वहां सामने देखो, सारंगपाणि मंदिर दिख रहा है? क्या तुम्हें पता है उस मंदिर के स्थापत्य कला में भी गणित है!” मैंने चौंकते हुए पूछा “कैसे?”

रात गहराती जा रही थी और खिड़की से बाहर सारंगपाणि देवालय का गोपुरम चन्द्र की शीतल छाया में मनोहर दृश्य खड़ा कर रहा था। चहुँओर शांति पसरी हुई थी और बाहर के मकान दुकान और मंदिरों में कोई हलचल नहीं थी। ऐसा लग रहा था मानो किसी सिद्धहस्त कलाकार ने कैनवास पर चित्र बना दिया हो।

रामा ने उसी मासूमियत से अपनी बात आरंभ की। “भौतिक विज्ञान और रसायन शास्त्र ही नहीं स्थापत्य, कला, प्रतिमा विज्ञान, संगीत जैसे सभी विषयों का मूल गणित ही तो है। बिना अनुपात को समझे आकारों को नहीं समझा जा सकता और आकारहीन कलाकृति संभव ही नहीं। बिल्कुल वैसे ही एक सामान्य दीवार के निर्माण में जमीन को समतल करने से ले कर सामान की वस्तु-सूची बनाने तक गणित है। स्थापत्य और गणित का रिश्ता दूध और शक्कर जैसा है।”

जैसे ही रामा रुका मैंने अगला प्रश्न दागा “लेकिन किसी को गणित का विषय ही पसंद ना हो तो?”

वो हंसने लगा और फिर उसने अपनी बात आगे बढ़ाई “एक ओर कॉपरनिकस और गैलिलियो जैसे शोधकर्ताओं को पाश्चात्य धर्मों ने प्रताड़ित किया वहीं हमारे गणितज्ञों ने अपने सिद्धांतों के उदाहरण धर्म के माध्यम से प्रस्तुत किए। हमारे गणितज्ञों का तर्क भी व्यवहारिक ही था। यदि आप गणित को अंकों के माध्यम से समझाएंगे तो इसे समझना कठिन होगा लेकिन यदि गणित को धर्म के माध्यम से समझाया जाए तो यह लोगों को सहज ही समझ आ सकता है। आर्यभट्ट के संस्कृत साहित्य में अंकों से नहीं अक्षरों से गणित के नियमों को समझाया गया है।”

रामा अनवरत बोले जा रहा था और मैं स्तब्ध उसका यह रसप्रद वक्तव्य सुन रहा था। उसने सारंग धनुष के माध्यम से प्रकृति का गणित समझाते हुए कहा “भगवान सारंगपाणि इस देवालय के प्रमुख देवता हैं। श्री विष्णु सारंग धनुष धारण करते हैं इसीलिए इन्हें सारंगपाणि कहा जाता है। जैसे पिनाक शिव का धनुष है वैसे ही सारंग विष्णु का धनुष है। दोनों ही धनुष भगवान विश्वकर्मा की कला-कुशलता का उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं। त्रेता में श्री विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अवतार धारण किया। श्री राम ने सारंग का प्रयोग किया और अपनी जीवनलीला समाप्त करने से पहले उसे वापस समुद्र में अर्पित कर दिया। द्वापर में पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण ने इस धनुष को समुद्र से प्राप्त किया और उपयोग करने के पश्चात फिर से वरुण देव को लौटा दिया। आप जो तत्व प्रकृति से प्राप्त करते हैं उसे किसी ना किसी रूप में प्रकृति को वापस करना ही पड़ता है, ऐसा नहीं करने पर प्रकृति अपनी देन वापस ले ही लेती है। यही प्रकृति का गणित है।”

अब इस ज्ञान-चर्चा में मुझे मज़ा आने लगा था। रामा का समझाने का तरीका सबसे अनूठा था। उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा “भारतीय आचार्यों के योगदान ने विश्व के गणित समझने के तरीके को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। विश्व की प्राचीनतम सभ्यताएं हमेशा से अंकों का वैविध्यपूर्ण उपयोग करती रहीं हैं किन्तु भारत ने विश्व को इन अंकों को लिखना सिखाया। जहां अन्य सभ्यताओं में शून्य एक प्लेस-होल्डर से अतिरिक्त कुछ नहीं था, भारत ने इसे भी एक अंक के रूप में योग्य समझा और इसके बाद तो मानो दुनिया बदल गई। बड़े से बड़े अंक को लिखना और उसके साथ प्रयोग करना आसान हो गया और इससे गणित के चक्रों को ईंधन मिल गया। शून्य की जड़ें हमारे आध्यात्मिक-दर्शन में पहले से मौजूद थीं, यह विचार भारत में प्राचीन काल से प्रचलन में था। हमारे ग्रंथों में शून्य को दार्शनिक विचारों से वर्णित किया गया है। इन ग्रंथों में स्पष्ट लिखा गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति शून्य से हुई है और अन्त में समस्त ब्रह्माण्ड शून्य में ही विलीन हो जाना है।”

मेरा कौतुहल बढ़ता जा रहा था। क्या धार्मिक दर्शनों के उपरांत भी किसी ने शून्य पर शोध-कार्य किया था? इसके उत्तर में रामा ने कहा “गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने बताया कि एक में शून्य जोड़ने पर एक ही रहेगा एक में से शून्य घटाने पर भी एक ही रहेगा लेकिन शून्य से किसी भी संख्या को गुना करने पर परिणाम शून्य हो जाएगा। शून्य के साथ गणना करने का जो तरीका ब्रह्मगुप्त ने दिया उसे आज भी प्रयोग किया जाता है।”

“लेकिन शून्य से विभाजन करने पर क्या परिणाम होगा? यह किसकी शोध थी?”

रामा ने प्रत्युत्तर में कहा “शून्य से जुड़ा यह सबसे बड़ा रहस्य भी भारतीय मंदिरों में ही छुपा हुआ था। सारंगपाणि मंदिर में श्रीविष्णु को अनंत-शेष नाग पर स्थापित किया गया है। गणित में नियमानुसार विभाजन के अन्त में जो बचता है वह ‘शेष’ है। आसान सा तर्क है, मनुष्य अपना जीवन शून्य से आरंभ करता है और अनंत में विलीन हो जाता है। और जीवन के पश्चात शेष रहने वाला यह अनंत सर्वशक्तिमान श्रीविष्णु के नियंत्रण में है। शून्य का विभाजन किसी भी संख्या से करने पर शेष अनंत ही बचेगा, यह पहेली सुलझाने का श्रेय १२वीं शताब्दी के गणितज्ञ भास्कर को जाता है।”

रात के साथ बढ़ती क्षुधा मिटाने के लिए रामा रसोईघर से कुछ फल ले कर आया और फल खाते हुए मैंने सबसे जटिल संख्या अनंत के बारे में पूछा। प्रत्युत्तर में उसने सामने रखे फलों का उदाहरण देते हुए कहा “यदि हम इस फल को एक बार काटेंगे तो इसके दो भाग हो जाएंगे। इस तरह दो से चार… आठ… और सोलह… इस तरह यह क्रम बढ़ता ही जायेगा और अंत में जब फल अनगिनत अणुओं में बंट जाएगा तब इसका आकार भी शून्य हो जायेगा। गणितज्ञ माधव ने यही समझाते हुए कहा कि शून्य और एक के बीच भी अनंत छिपा है।”

मैं मंत्रमुग्ध होकर उसकी बात सुनते जा रहा था। शून्य और अनंत के पश्चात गणित में सबसे जटिल होती हैं ऋणात्मक संख्याएं लेकिन भारत के गणितज्ञों के लिए ऋणात्मक विचार भी जाना पहचाना था। उधार ली गई राशि को हमारे पूर्वज ऋण कहते थे, हिन्दू दर्शन में कर्म का सिद्धांत भी ऋणानुबंध की बात करता है। जैसे ० से १०० घटाने पर क्या होगा? वो ऋणात्मक १०० होगा। यदि भूमि को शून्य रेखा मान कर गोपुरम और देवालयों का निर्माण धन है तो जमीन से नीचे होने वाले कुण्ड और बावड़ियों को ऋण माना जाएगा।”

संख्याओं के खेल में भारत के गणितज्ञ प्राचीन काल से ही सिद्धहस्त थे। उन्होंने संख्याओं को पहचान लिया था। उनके लिए यह संख्याएँ काल्पनिक नहीं थीं बल्कि अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखने वाली निराकार इकाईयाँ थीं।

भारतीय गणितज्ञ इन निराकार इकाईयों का महत्व पहचान चुके थे। जोड़ने, घटाने और गुणाकार, भागाकार करने के अतिरिक्त हमारे विद्वानों ने इन संख्याओं के साथ अन्य प्रयोग भी किए। द्विघात समीकरण का विचार भी हमारे लिए नया नहीं था।

“किन्तु इन सब में सबसे महत्वपूर्ण और पेचीदा होती है त्रिकोणमिति!”

“जो त्रिकोणमिति का विषय विश्वभर के गणितज्ञों के लिए जटिल विषय था उसी को भारतीय दार्शनिकों ने ग्रहों और नक्षत्रों के माध्यम से आसानी से समझ लिया था। ग्रहों और नक्षत्रों की स्थितियों के अवलोकन मात्र से हमारे पूर्वज बिना किसी अत्याधुनिक तकनीक से अन्तरिक्ष में देख पा रहे थे। उन्होंने प्रत्येक माह को कृष्णपक्ष तथा शुक्लपक्ष में विभाजित कर दिया था और हरेक पक्ष में जब चँद्र अर्ध कला में होता है तो सूर्य से सीधी रेखा में होता है, इस समय पृथ्वी, सूर्य और चँद्र मिल कर समकोण त्रिकोण बनाते हैं। त्रिकोणमिति के माध्यम से उन्होंने गणना की कि चँद्र का आकार सूर्य से ४०० गुना छोटा है।”

“किन्तु बिना π का मूल्य समझे यह सब संभव नहीं है, क्या हमारे पूर्वजों ने π को भी पहचान लिया था?”

“आर्यभट्ट की गणनाओं के हिसाब से पृथ्वी की परिधि २४८३५ मील थी। यह भी कुछ हद तक सही है किन्तु इसे गणितज्ञ माधव ने अनंत के माध्यम से पूर्ण रूप से शुद्ध किया। आर्यभट्ट को यह भी ज्ञात था कि π का मान ३.१४१६ है।”

मैंने रामा से पूछा “रामा तुम गणित के बारे में इतना सब कुछ कैसे जानते हो?”

वह बोला “मुझे कुलदेवी नामगिरि देवी का आशीर्वाद प्राप्त है, वही स्वप्न में आकर मुझे पूर्वाभास देती हैं इसलिए मैं गणित के बारे में इतना जानता हूं।”

वह मेरा हाथ पकड़ कर रसोई में ले गया। वहां एक छोटा सा मंदिर बना हुआ था जिसमें नामगिरि देवी की मूर्ति थी। नामगिरी देवी लक्ष्मी का ही एक नाम है। मैंने देवी को प्रणाम किया तभी घर के बाहर कुछ आहट सुनाई दी। शायद दरवाजे पर कोई था। हां, कोई ताला खोल रहा था।

रामा ने मुस्कुराते हुए कहा “जाओ, बाहर तुम्हें लेने के लिए तुम्हारे शिक्षक आए हैं।” जब मैं मुख्य द्वार पर पहुंचा, मेरे शिक्षक और स्मारक का चौकीदार ताला खोल चुके थे। उन्होंने मुझे देखा। शिक्षक चिंतित स्वर में पूछने लगे “बेटा भूख लगी है? रोए तो नहीं?”

मैंने मुड़कर देखा तो मुख्य कमरे में रामानुजन की प्रतिमा लगी हुई थी। चौकीदार ने फिर से मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया। हम तीनों ने वापसी के लिए प्रस्थान किया और मैंने देखा कि बाहर खड़े वाहन का नंबर था १७२९!

 

 

 

 

 

 

लेखक पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संदर्भों के पार्श्व में सामयिक और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढने की कोशिश करती कहानियाँ लिखते हैं। उनके कुछ वृत्तांत उनकी अनवरत चलने वाली यात्राओं के भाग हैं। इसके अलावा उनकी रुचि लघुकथा, भारतीय मंदिर स्थापत्य और ललित कला से संबद्ध लेखन में भी है। उनकी शब्दावली में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त गुजराती और मराठी का पुट भी होता है।लेखक पेशे से एक फ्रीलांस आइटी कंसलटेंट और डेटाबेस आर्किटेक्ट हैं।
साभार- https://www.indictoday.com/ से

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1 टिप्पणी
 

  • Dr. Raja Chauhan

    दिसंबर 26, 2020 - 9:36 am

    बहुत शानदार, अद्भुत

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