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अब नेताओं की सनक का ठिकाना और राजनीतिक चारागाह नहीं है रेल मंत्रालय

माने या नहीं मानें, रेल मंत्रालय, जो पिछले दो दशकों से राजनैतिक दिग्गजों के बीच एक बेहद इच्छित विभाग हुआ करता था, और जिसके लिए पिछले गठबंधनों में सहयोगी दल अपनी ताल ठोका करते थे, अब बिल्कुल भी वैसा नहीं रह गया है।

धन्‍यवाद है रेल मंत्री सुरेश प्रभु का, जिन्हें भारतीय रेल को दुबारा से जीवित करने का दुःसाध्य काम सौंपा गया है। लेकिन फिर भी, इस काम में सिर्फ नई सोच वाले वित्तीय आंकड़ों का इंद्रजाल इस्‍तेमाल करना शामिल नहीं है, जैसा कि उनके एक काबिल पूर्वाधिकारी ने किया था, लेकिन 14 लाख कर्मचारियों के विशालकाय ताकतवर संगठन ने लोकप्रियता के ढर्रे से परे हटकर कुछ बड़ी पहलों के साथ,अब एक व्यावहारिक मार्ग पर चलना शुरु करने का साहस कर दिया है।

इस साल श्री सुरेश प्रभु के प्रथम बजट में एक भी नई रेलगाड़ी या एक भी नई परियोजना मौजूद नहीं थी। इससे उनके कई राजनैतिक सहयोगी निराश हो गए, क्योंकि नई परियोजनाओं और रेलगाड़ियों को शुरु करना उनकी विशेषता रही है। इससे पहले, सैकड़ों परियोजनाओं और रेलगाड़ियों की घोषणा की गई है, वो भी इस हकीकत पर गौर किए बिना कि नई रेलगाड़ियों की शुरुआत से रेलपथ अवरुद्ध हो जाएंगे। उन्होंने ये भी सोच विचार नहीं किया कि क्या नई परियोजनाओं के लिए, जिनकी लागत एक लाख करोड़ रुपये से अधिक होगी, धन का इंतजाम करने के लिए पर्याप्त धन है या नहीं – सब की सब पाइपलाइन में फंसी हुई हैं।

श्री प्रभु द्वारा कार्यालय संभालने के साथ, सभी राजनैतिक दलों के सांसदों और विधायकों की सेना गायब हो चुकी है, जो रेल भवन के गलियारों में भीड़ लगाए रहते थे और अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र के लिए रेलवे के विशाल संसाधनों का एक हिस्सा पाने के लिए बेताब रहते थे। इसके अलावा, श्री प्रभु द्वारा कई प्रमुख निवेशों की अपनी शक्तियां दूसरों को सौंप दिए जाने के साथ ही, निजी क्षेत्र के मुखिया लोग उनके कार्यालय के चारों ओर अपनी अमौजूदगी के कारण सुस्पष्ट हैं।

राजनैतिक बोझ और दल के लिए चंदा इकट्‌ठा करने की जरूरत से परे हटकर,श्री प्रभु ने उन मुख्‍य मसलों पर ध्‍यान दिया है, जिन्होंने रेल को आर्थिक उन्नति का इंजन बनने से रोका है, जिनके कारण इसने पिछले दो दशकों के दौरान अपना माल यातायात लगातार सड़क क्षेत्र को गँवाया है।

पूँजीनिवेश के लिए वैकल्पिक स्रोतों को दिशा देने के प्रयास में, श्री प्रभु ने कोयले और लौह अयस्क की निकासी के लिए काफी कोशिशें की हैं। इससे माल यातायात कारोबार को भारी बढ़ावा मिलेगा। यह रेलवे के लिए फायदे का सौदा साबित होगा, क्योंकि कई राज्य सरकारें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देने के नजरिये से, अनिवार्य 50 प्रतिशत से अधिक धन देने को बेताब हैं।
बस इतना ही नहीं, इन परियोजनाओं को भारतीय रेल के आंतरिक निकायों, अर्थात इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड, रेल विकास निगम लिमिटेड, रेल इंडिया टेक्नीकल एंड इकोनामिक सर्विस तथा कोंकण रेल कारपोरेशन को सौंपकर, श्री प्रभु ने समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया है।

खबर है कि विस्तृत परियोजना रिपोर्टें, जिनमें अगर सालों तो नहीं, लेकिन महीनों जरूर लग जाया करते थे, 50 फीसदी से ज्यादा परियोजनाओं के लिए तैयार हैं। इसके साथ-साथ, कोल इंडिया लिमिटेड के साथ संयुक्त उद्यम बनाए गए हैं, जो कोयले की निकासी चाहता है। राज्य सरकारें किसी भी स्थानीय बाधा को दूर करने में मदद करने के लिए तीव्र पर्यावरणीय और अन्य स्वीकृतियां सुनिश्चित कर रही हैं, ताकि परियोजनाओं को जल्दी से जल्दी से निष्‍पादित किया जा सके।

92 फीसदी के आसपास मंडरा रहे निराशाजनक परिचालन अनुपात के साथ, कमाए गए हर-एक रुपये में सिर्फ आठ पैसे ही ऐसे नए कार्यों के लिए उपलब्ध हैं। पारम्परिक बजट सहायता को छोड़कर, नए संसाधनों को खोजना आवश्‍यक था। इसने श्री प्रभु को जीवन बीमा निगम का द्वार खटखटाने के लिए तत्पर किया। उनके साथ श्री प्रभु का धैर्य सफल साबित हुआ, क्योंकि वे अगले पांच साल में रेलवे के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपये की बहुत बड़ी रकम उपलब्‍ध कराने की वचनबद्धता करने के लिए सहमत हो गए हैं।

11,000 से अधिक बिना चौकीदार वाले समपारों के साथ, एक रेलगाड़ी के गुजरते समय किसी सड़क वाहन द्वारा बेइरादा रेलपथ पार किए जाने की घटनाएं दुर्लभ नहीं हैं, खासतौर पर देहाती इलाकों में। जीवन के नुकसान के अलावा, ऐसी घटनाएं रेलगाड़ियों के संचलन में बड़ी रुकावट पैदा करती हैं और फलस्वरूप समयपालन प्रभावित होता है।

हालांकि बिना चौकीदार वाले समपारों पर चौकीदार तैनात करने से, पहले से महाकाय रेल मजूरी बिल में बढ़ोतरी होगी, लेकिन रोड ओवर ब्रिज बनाने में 40 करोड़ रुपये प्रत्येक का खर्चा आएगा और यह एक बहुत बड़ा बोझ होगा, भले ही राज्य सरकारें लागत का अनिवार्य 50 फीसदी का अंशदान करें।

श्री प्रभु जल्दी में हैं। वे व्यापक और सकारात्मक प्रभावों के साथ भारतीय रेल में महत्‍वपूर्ण बदलाव लाने को तत्पर हैं। रेल मंत्री को एक कुशल, गतिशील और उपयोगकर्ता-अनुकूल संगठन के अपने सपने को सच करने के लिए किस्मत के पूरे साथ की जरूरत होगी जो 1.2 अरब लोगों के अरमानों को, जिनकी यह सेवा करता है, को पूरा करने में समर्थ हो सके। वे सही काम कर रहे हैं। लेकिन उन्‍हें सपनों को सच करने के लिए लोगों के व्यापक प्रतिनिधित्व के समर्थन की जरूरत है।

(लेखक, रेलवे बोर्ड के एक पूर्व सदस्य हैं)

( http://www.dailypioneer.com/ में प्रकाशित लेख का हिन्दी अनुवाद, अनुवाद श्री संतोष सैन्सुनवाल द्वारा)

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