आप यहाँ है :

एक थे शास्त्री, एक हैं मोदी: दो विपदा, दो प्रधानमंत्री!

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक। ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था।

आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य।संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

हम हिंदू इतिहास-याद्दाश्त में कच्चे हैं। आंखें मोतियाबिंद की मारी व बुद्धि मंद! सिर्फ वर्तमान के कुएं में जीते हैं। कितनों को भान है कि 1947 में आजादी के बाद भूख और भूखे पेट की विपदा कब थी? तो जवाब है साठ का दशक। यों भारत आजादी पहले से भूख, अकाल का मारा था। तेज बढ़ती आबादी से बढ़ते सकंट पर एक अमेरिकी प्रो. पॉल एर्लिच ने पुस्तक लिखी ‘जनसंख्या बम’। उसका कोर वाक्य था- मानवता के पेट को भरने की लड़ाई हम हार रहे हैं।‘ मु्ख्य उदाहरण भारत था। जहां आबादी 2.3 प्रतिशत की रेट से साल-दर-साल बढ़ती हुई तो अनाज पैदावर घटता हुआ। तथ्य है भारत 1954 से अमेरिका की पीएल 480 स्कीम में साल-दल-साल गेंहू मंगा जनता का पेट भरता (तभी नोट रखें मानवीय संकट यथा भूख-बीमारी में भारत का सर्वाधिक मददगार अमेरिका रहा है) था। 1959 में अमेरिकी टीम ने भारत आ कर नेहरू सरकार को चेताते हुए कहा था कि जन्म दर बनाम खाद्य उत्पाद दर का फर्क गंभीर अनाज संकट पैदा करेगा। पर तब नेहरू भारत के औद्योगिक मंदिर बनाने की धुन में थे। पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि खर्च हाशिए में था। नतीजतन सन् 1960/61-1964/65/66 में अमेरिकी अनाज आने के बावजूद भारत में खाद्यान स्थिति ऐसी बिगड़ी कि राज्यों में गरीब-गुरबे भूख से तड़पते-मरते हुए थे। केरल में छात्र सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए तो बिहार, ओड़िशा, यूपी जैसे प्रदेशों की भूखमरी विश्व मानवीय संकट और विपक्ष का कोहराम बनवाए हुए थी! भूखे पेट की त्रासदी में किसी को समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें!

तो पहली बात वक्त-स्थितियों की प्रकृतिगत भिन्नता के बावजूद आजाद भारत के इतिहास में महामारी के मौजूदा संकट की तरह भूखमरी का संकट विकट था। 74 साला इतिहास में पेट की भूख और फेफड़े की सांस का मसला समतुल्य विपदा। उस नाते अब गौर करें इन बिंदुवार तथ्यों पर-

सन् 1964-65 के संकट में प्रधानमंत्री थे लालबहादुर शास्त्री जबकि 2021 के संकट में प्रधानमंत्री हैं नरेंद्र मोदी। 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बनते ही लालबहादुर शास्त्री के आगे भुखमरी का संकट था जबकि नरेंद्र मोदी के आगे संकट 2014 में प्रधानमंत्री बनने के छह साल बाद आया।

शास्त्री संसद में वह बहुमत, वह लोकप्रियता, वह संगठन, वह करिश्मा लिए हुए नहीं थे जो नरेंद्र मोदी के लिए भारत में सन् 2014 से है।

बावजूद इसके लालबहादुर शास्त्री ने दो साल में वह किया, जिस पर यदि ईमानदारी, तटस्थता से विचार हो तो एक अकेला निष्कर्ष है। वह यह है कि सत्य, संजीदगी-मर्यादा और बुद्धि ही कोर सत्व-तत्व है, जिससे नेतृत्व याकि प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति जहां इतिहास के राम बनते हैं तो उससे देश का भविष्य भी बनता है। ठीक विपरीत झूठ-मूर्खता-अंहकार-बुद्धिहनता और नौटंकी में जो प्रधानमंत्री व नेतृत्व रचापचा होता है वह अपने को जहां रावण बनाता है तो उसकी सोने की लंका भी धूं-धूं कर जलती है। सवाल है लालबहादुर शास्त्री ने क्या किया जो नरेंद्र मोदी ने नहीं किया? तो गौर करें-

लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री बनते ही देश की विषम स्थितियों-संकट को समझ विशेषज्ञ, ज्ञानवान, धाकड़ लोगों की टीम बनाई। शास्त्री सहज व सरल थे। उन दिनों कांग्रेस समाजवादी विचारों में रंगी हुई थी। खुद शास्त्री समाजवादी रूझान के थे। पर चीन से लड़ाई बाद की खोखली आर्थिक स्थिति, अकाल-भूख, भाषा विवाद के संकटों में शास्त्री ने वक्त का तकाजा समझा। नेहरू की लीक से हट कर उन्होंने अपने पद के साथ अपना एक प्रधानमंत्री सचिवालय (नाम बना पीएमएस- बाद में पीएमओ) बनाया। ध्यान रहे नेहरू खुद ही काम, मतलब नोट लिखना-ड्राफ्टिंग करते थे और निवास में ही निजी सचिव-टाइपिस्ट बैठा कैबिनेट सचिव की व्यवस्था से राज चलाते हुए थे। पीएम और पीएमओ के सिस्टम की जरूरत नही मानी। वे कुछ असिस्टेंटों के साथ व्यवसायी एयरलाइंस से देश-विदेश की यात्रा करते थे। (मोदी की तरह नेहरू या शास्त्री ने कल्पना नहीं की थी कि उनके लिए वायु सेना के विशेष विमान या साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए का खास बोइंग बने)। आर्थिकी की दुर्दशा में उन्होंने अर्थशास्त्री-आईसीएस एलके झा को अपना सचिव बनाया। नरेंद्र मोदी की तरह रिटायर हुए, चूके-थके, या प्रदेश के उन अफसरों की दफ्तरी टीम नहीं बनाई, जिससे प्रधानमंत्री के अहसान में दबे अफसर चाटुकारिता, साहेब के मूड अनुसार हां में हां मिलाते हुए काम करने वाले हो।

ऐसे ही शास्त्री ने कैबिनेट में धुरंधर रखे। खाद्य संकट और विदेश नीति की चुनौती में सी सुब्रह्मण्यम और स्वर्ण सिंह को अहमियत दी। नेहरू के वक्त के टीटी कृष्णमाचारी वित्त और वाईबी चव्हाण रक्षा मंत्री थे। मतलब मोदी की तरह अपनी बुद्धि से भी छोटे लोगों की बौनी कैबिनेट नहीं बनाई। शास्त्री के कैबिनेट में बहस होती थी। सलाह-सर्वानुमति में फैसले लेते थे। शास्त्री ने एक और गजब काम किया। लालबहादुर शास्त्री ने संघीय भारत के केंद्र, राज्यों के मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों और पार्टियों के नेताओं का छांट कर एक गणतंत्र परिषद् (grand council of the republic) बनाई। इसका कानूनी आधार नहीं था, मिनट्स का रिकार्ड नहीं। पर ऐसे सलाह-विमर्श बनाना केंद्र और राज्यों के बीच अनाज वितरण, भाषा जैसे मसलों पर कोऑर्डिनेशन, समझदारी-भरोसा बनवाता था। शास्त्री और कैबिनेट के मिलजुल कर काम करने से प्रदेशों, पार्टियों के लोग इस अनौपचारिक निर्णय प्रक्रिया से भरोसा पाए होते थे। (तभी अकल्पनीय है कि शास्त्री के समय नोटबंदी जैसी मूर्खता हो और कोरोना में बिना सलाह के लॉकडाउन या फिर बिना वैज्ञानिकता के एक के बाद एक अनलॉक)।

शास्त्री के प्रमुख सचिव एलके झा ने विदेशी चुनौती के मद्देनजर ‘सचिवों की उच्च स्तरीय कमेटी’ बनाई। इसमें छह आर्थिक मामलों के सचिव, बाकी चार में कैबिनेट, रक्षा, विदेश सचिव और खुद एलके झा सदस्य थे। इसमें अंहम मसलों पर विचार होता था। इसके अलावा संकटों के लिए मंत्रियों के समूह और मंत्री विशेष को अपने मंत्रालय में पूरी स्वतंत्रता लालबहादुर शास्त्री की वह खूबी थी, जिससे तमिलनाडु के विकट भाषा विद्रोह, कच्छ में पाक की घुसपैठ और फिर पूर्ण युद्ध से लेकर भारतीय रुपए के अवमूल्यन (फैसला इंदिरा गांधी के वक्त हुआ था लेकिन तैयारियां शास्त्री काल की थी) से लेकर भुखमरी त्रासदी से पार पाने व खेती में हरित क्रांति का करिश्मा हुआ।

शास्त्री का सी सुब्रह्मण्यम को खाद्य-भुखमरी के संकट से भारत को बाहर निकालने का जैसा मैनडेट था वह आजाद भारत के इतिहास की वैसी ही अविस्मरणीय बात है जैसे नरसिंह राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बना कर आर्थिक दिशा बदलवाई। नरसिंह राव कभी इस हीन भावना में नहीं रहे कि मैंने यदि काबिल, अंग्रेजीदां, एलिट-ठसके वाले को मंत्री बनाया है तो वह सिर बैठ जाएगा। फिर मेरी इमेज का क्या होगा। मेरी हेडलाइन नहीं बनेगी। (जैसे नरेंद्र मोदी ने इस तरह की ग्रंथियों में अपना एकाधिकार बनाने के लिए प्रधानमंत्री दफ्तर और कैबिनेट व पार्टी को हर तरह से ताबेदारों के झुंड, गुलाम बौनों में तब्दील किया है)।

5- सन् 1964 के मार्च-अप्रैल से भुखमरी का संकट सुर्खियां होने लगा। मतलब प्रधानमंत्री बनते ही सिर मुंड़ाते ओले। शास्त्री ने क्या किया? उन्होंने और उनकी सरकार ने जनता से सत्य बोल कहा- हां, संकट है। मैं विनती करता हूं कि आप अनाज बचाएं। कम खाए। मैं खुद व्रत कर रहा हूं। घर में खाली जगह अनाज पैदा करो। आज शाम घरों में स्टोव न जले। शास्त्री ने खुद अपने आधिकारिक बंगले में अपने हाथों बुवाई कर घर-घर अनाज पैदा करने का आह्वान किया। पाकिस्तान से 22 दिन की जंग की आपदा और भुखमरी की विपदा में देश को जय जवान-जय किसान का नारा दिया। उन्होंने खाद्य संकट की गंभीरता से देश, पार्टी को गंभीर बना कर 1965 में हरित क्रांति की नींव रखी। कैसे?

6- उन्होंने समाजवाद की रीति-नीति से (जनता को अनाज सस्ता और न्यूनतम रेट पर ही मिले) बाहर निकल जैसे भी हो भारत की खाद्य आजादी का मंत्री सी सुब्रह्मण्यम को लक्ष्य दिया। सुब्रह्मण्यम-एलके झा की टीम ने शास्त्री से संसद में और 1965 के दुर्गापुर कांग्रेस अधिवेशन में नई कृषि नीति का खाका रखवाया। जिसका कोर मंत्र था वैज्ञानिक खेती, उर्वरक, नए बीजों की प्रमुखता, प्लांट प्रोटेक्शन, किसानों को ज्यादा दाम और आधुनिक खेतिहर तकनीक का इस्तेमाल व खेती पर अधिक खर्च। नेहरू के समाजवाद में रंगे कांग्रेसियों ने न चाहते हुए भी भुखमरी की हकीकत में सी सुब्रह्मण्यम को हरी झंडी दी।

7- आम राय-सर्वानुमति के मध्य समस्या थी कि वियतनाम, पाकिस्तान के झमेले में अमेरिकी राष्ट्रपति भारत से चिढ़े बैठे थे तो कैसे अमेरिका को भुखमरी के तात्कालिक निदान में अनाज सप्लाई बढ़ाने और नए बीज-नई तकनीक के लिए पटाया जाए? शास्त्री ने सी सुब्रह्मण्यम को (शायद पीछे एलके झा का कूटनीतिक रोल) अमेरिका-मेक्सिको के कृषि वैज्ञानिकों की टीम द्वारा निर्मित बीजों को येन-केन प्रकारेण लिवा लाने में कुछ भी करने को कहा। उधर किसानों से आह्वान था कि साल में एक नहीं दो और दो फसल पैदा करने वाले तीन फसल पैदा करें। उन्हें सरकार अच्छा दाम देगी, सरकार खरीदेगी। सी सुब्रह्मण्यम ने संसद से राष्ट्रीय कृषि उत्पादन बोर्ड एक्ट याकि खाद्य निगम बनाने का विधेयक पास करवाया।

8- असली काम भुखमरी में लोगों के घर अनाज पहुंचवाने का था। एक तरफ लोगों से अनाज की बचत का आह्वान कि आज खाना न खाएं (अखबारों में एक-एक पेज के विज्ञापनों का सरकारी कैंपेन हुआ करता था। रंच-छटांग भर झूठ प्रोपेगेंडा नहीं कि सब चंगा और आंदोलनकारी, विरोधी दल झूठ बोलने वाले दुश्मन) न ही भूख की हकीकत में पोजिटिविटी की बातों से लोगों को गुमराह करने वाला पाप। पूरा फोकस समस्या समाधान, अमेरिका को पटाने, वहां से गेहूं सप्लाई बढ़वा राशन की दुकान से अनाज वितरण पर था। नवंबर 1965 में सुब्रह्मण्यम अमेरिका गए। अमेरिका से उर्वरक आयात, निजी पूंजी निवेश आदि की सहमति दे कर बात बनाई। मतलब विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह, एलके झा, सुब्रह्मण्यम, विदेश मंत्रालय ने चुपचाप ईमानदारी-संजीदगी से रोडमैप अनुसार काम किया। नतीजतन अमेरिका की मानवीय मदद बढ़ी। अकाल के पीक वक्त की शुरुआत में अमेरिका से प्रतिदिन बीस हजार टन अनाज भारत आता था। वह बढ़ते-बढ़ते पचास हजार टन प्रतिदिन हुआ। बंदरगाहों पर जहाजों का ट्रैफिक जाम लगा होता था। कहते हैं बंदरगाह पर हर पांच मिनट में अनाज का जहाज आ लगता था। वह शास्त्री के नेतृत्व में विपदा से बाल-बाल बचने का करिश्मा था। जिसके अंत में ऐतेहासिक कामयाबी 1966 में सी सुब्रह्मण्यम द्वारा मेक्सिको से 250 टन सोनोराव-लेरेमा-रोजो गेंहू बीज बोईंग मालवाहक विमानों में भरवा कर भारत लिवा लाना था। वह देश में हरित क्रांति की शुरुआत थी, जिससे भारत आज भी पेट की भूख से स्वतंत्र है!

9-खोखली आर्थिक स्थिति में शास्त्री ने केबिनेट-जनता सबके सामने सत्य बोला। कंजूसी-मितव्ययता का अभियान चलाया। सरकार के खर्चे घटाएं। खुद उन्होने वेतन नहीं लेने, सरकार में सादगी, मितव्ययी प्रोग्राम घोषित किए। लोगों से भी सादगी- कंजूसी का आव्हान। मतलब विपदा के समय एकमेव फोकस विपदा पर। अनाज लोगों तक पंहुचे और कृषि के लिए संसाधन जुटे। जाहिर है जैसे आज नरेंद्र मोदी विपदा के बीच भी नई दिल्ली में नई संसद, अपने नए घर आदि के निर्माण में अरबों रू जैसे फूंक रहे है वैसी रंच मात्र कल्पना या फिजूलखर्ची शास्त्री और उनकी सरकार में संभव नहीं थी।

 

 

 

 

(लेखक https://www.nayaindia.com/ के संपादक हैं)

image_pdfimage_print


1 टिप्पणी
 

  • Navin C. Chaturvedi

    मई 26, 2021 - 4:58 pm

    बस क़दीमी बचायेगी हमको ।
    और उपचार दूसरा क्या है ?

Comments are closed.

Get in Touch

Back to Top