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बुनियादी ढांचा क्षेत्र में मुद्दों की प्राथमिकता

फरवरी का महीना दिल्ली में नीतिगत फैसलों के लिहाज से अत्यंत उर्वर होता है। उसी समय यह पता चलता है कि देश की अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को लेकर सरकार का क्या सोचना है? इसमें आर्थिक समीक्षा, रेल बजट और केंद्रीय बजट के दरमियान प्राथमिकताओं में बदलाव और जीवंत चर्चाएं और टिप्पणियां आदि शामिल होती हैं। इस दौरान विभिन्न क्षेत्रों पर दिए जा रहे जोर की समीक्षा को भी साफतौर पर महसूस किया जा सकता है।

प्रश्न यह है कि बुिनयादी ढांचा क्षेत्र में प्राथमिकताएं किस प्रकार तय की गई हैं? इस क्षेत्र में रेलवे, ग्रामीण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे, शहरी कायाकल्प, सौर ऊर्जा और बिजली वितरण और पारेषण पर ध्यान दिया जा रहा है। हाल में पेश किए गए बजट में जो आवंटन किया गया है, उसमें ये बातें स्पष्टï रूप से परिलक्षित होती हैं। हालांकि सड़क क्षेत्र का दबदबा कायम है लेकिन अन्य क्षेत्रों के लिए होने वाला आवंटन भी यही बात उजागर करता है कि सरकार ने उन क्षेत्रों को बढ़ावा देने का इरादा बना लिया है जो पिछले काफी समय से उपेक्षित थे। इस लिहाज से देखा जाए तो प्राथमिकताओं के पुनर्निर्धारण में सात बातों पर ध्यान दिया जाना अपेक्षित है:

पहली बात, सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए बुनियादी ढांचा क्षेत्र में सार्वजनिक व्यय आधारित निवेश को बढ़ावा देने के मामले में पर्याप्त गंभीर है। यहां तक कि राजकोषीय घाटे की परिस्थितियों में भी वित्त मंत्री ने इस वर्ष आवंटन में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा है। गत वर्ष इसमें 27 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी की गई थी। दूसरी बात, बजटीय आवंटन की कई गुना अधिक राशि बजटोत्तर आवंटन से जुटाई जा रही है। राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढांचा कोष इस नए विचार का ही वाहक है। यहां तक कि व्यक्तिगत तौर पर भी कई मंत्रालयों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे बजटीय आवंटन को सीड फंडिंग के रूप में ही देखें। यही वजह है कि रेलवे भारतीय जीवन बीमा कंपनी और विश्व बैंक से धन जुटाने के लिए तैयार है। सड़क मंत्रालय टोल का प्रतिभूति करण करना और टोल ऑपरेट ट्रांसफर (टीओटी) के जरिए फंड जुटाना चाहता है। जापानी ऋण की बात करें तो बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए वह मिल ही चुका है। ऐसे तमाम अन्य उदाहरण भी हैं।

तीसरी बात, अपनी अलहदा पंचवर्षीय योजना के साथ रेलवे निवेश का बहुत बड़ा वाहक बनने की ओर अग्रसर है। उसकी पांच साला योजना में 8.56 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत आवंटन की बात कही गई है यानी सालाना 1.71 करोड़ रुपये। अगर मान लिया जाए कि सड़क निर्माण की लागत प्रति किमी 7 करोड़ रुपये आती है तो यह धनराशि 24,000 किमी सड़क निर्माण के बराबर होगी जबकि वर्ष 2016-17 में सड़क निर्माण के लिए 10,000 किमी का लक्ष्य तय किया गया है। यह बताता है कि रेलवे में आने वाला निवेश अर्थव्यवस्था पर कितनी जल्दी कितना गहरा असर डालेगा।

चौथी बात, ग्रामीण क्षेत्र के बुनियादी निवेश की बात करें तो वह राजनीतिक आर्थिक आवश्यकता भी है। ग्रामीण इलाका न केवल बहुत बड़ा वोट बैंक है बल्कि मौजूदा दौर में देश के ग्रामीण इलाकों में जिस तरह की निराशा का भाव है वह वहां निवेश की आवश्यकता बताता है। अगर सही ढंग से क्रियान्वयन किया गया तो तो ग्रामीण सड़कों, विद्युतीकरण, सिंचाई और ग्रामीण आवास आदि की व्यवस्था राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को वह समीकरण प्रदान कर सकती है जिसकी उसे तलाश है।

पांचवीं बात, शहरी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे का बजट आवंटन ग्रामीण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के आवंटन की तुलना में काफी कम है। शहरों के लिए स्मार्ट सिटी की जो योजना तैयार की गई है वह काफी हद तक निजी निवेश के भरोसे है। यह राशि स्मार्ट सिटी विकसित करने के लिए बनाई गई नई विशेष कंपनियां जुटाएंगी। इसकी राजनैतिक महत्ता भी बहुत ज्यदाा है क्योंकि स्मार्ट सिटी का स्वप्न वर्ष 2014 के आम चुनाव के वक्त दिखाया गया था और यह बड़े पैमाने पर शहरी युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कामयाब भी रहा था।

छठी बात, बिजली क्षेत्र के बजटीय आवंटन में वह महत्त्व उजागर नहीं होता है जो इस क्षेत्र को वास्तव में दिया जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि इस क्षेत्र की ज्यादातर फंडिंग बजटीय प्रावधान से इतर आ रही है। बिजली वितरण क्षेत्र के ऋण को उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (उदय) के तहत व्यापक पैमाने पर पुनर्गठित किया जा रहा है। इस मामले में बॉन्ड प्लेसमेंट का प्रयोग किया जा रहा है। गांवों का 100 प्रतिशत विद्युतीकरण और शहरी बिजली वितरण नेटवर्क में सुधार का काम फिलहाल किया जा रहा है। इसके लिए पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, आरईसी बिजली वितरण कंपनी, पॉवर फाइनैंस कॉर्पोरेशन आदि के कोषों का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन इसमें दो राय नहीं कि पूरा ध्यान कोयला आधारित ताप बिजली संयंत्रों से देश के बिजली वितरण और पारेषण नेटवर्क को सुधारने पर केंद्रित हो चुका है। वर्ष 2021 तक 100,000 मेगावॉट सौर ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य का व्यापक प्रचार प्रसार किया गया है। इस पर भी ध्यान है।

आखिरी बात, इन प्राथमिकता वाले आवंटनों से इतर बंदरगाहों और हवाई अड्डों के लिए किया जाने वाला आवंटन शर्मनाक हद तक कम है। शायद इन क्षेत्रों को प्राथमिकता निर्धारण के अगले चक्र तक प्रतीक्षा करनी होगी। या फिर शायद उनको निजी सार्वजनिक भागीदारी के चक्र में सुधार के बाद इन क्षेत्रों में निवेश के आगमन का इंतजार करना होगा। लेकिन निकट भविष्य की बात करें तो सड़क, रेलवे, ग्रामीण और शहरी भारत, सौर ऊर्जा और बिजली का पारेषण एवं वितरण ही एजेंडे में अहम बने रहेंगे। वर्ष 2019 तक ये चुनौतियां ही पर्याप्त रहनी चाहिए।

साभार- http://hindi.business-standard.com/ से

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