आप यहाँ है :

भारत के इतिहास में राम की वंश परंपरा

गोस्वामी तुलसी दास कृत राम चरित मानस की इन पंक्तियों में जिस रघुकुल की वचन बद्धता की प्रतिष्ठापना की गयी है ।उस रघुकुल के बारे में बहुत थोड़ा पता है । रघुकुल के श्री राम के बारे में पता है। लेकिन उस कुल में और भी कई ओजस्वी महानायकों का जन्म हुआ था । आइये जानते हैं उस वंश के बारे में जिसमे प्रभु श्री राम ने जन्म लिया था ।

ये भी पढ़ें: राम बिना अन्तर्मन सूना

आज से लगभग सात हजार वर्ष पूर्व अयोध्या में स्थित उत्तर कोसल के राजकीय वंश में श्री राम का जन्म महाप्रतापी राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था । यदपि इस बंश की स्थापना सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु ने की थी । लेकिन इसी वंश में हुये महान विजेता सम्राट रघु के कारण यह वंश ‘रघुवंश’ अर्थात रघुकुल कहलाया |

एक अनुमान के अनुसार इस वंश की स्थापना श्री राम जन्म से 62 पीढ़ी पहले वैवस्वत मनु ने पश्चिमोत्तर दर्रों को ओर करके इलावर्त (वर्तमान ईरान ,ग्रीस ,अफगानिस्तान तथा एशियाई रूस का दक्षिणी पश्चिमी भाग) से अयोध्या आकर की थी। उनके साथ ही उनके दामाद बुध भी उस क्षेत्र को छोड़कर भारत आए और गंगा – यमुना के संगम पर प्रतिष्ठान नागरी बसा कर अपने राजकुल की स्थापना की । परंतु चंद्रपुत्र होने के कारण उनके वंशज चंद्रवंशी कहलाये । सूर्यपुत्र मनु तथा चंद्रपुत्र बुध इलावर्त ,काश्यप नगर के तटवर्ती क्षेत्रों तथा काकेशिया की पर्वत मालाओं के अति विस्तृत क्षेत्रों में फैले साम्राज्यों के स्वामी थे । दैत्य व दानव कुलों में भी उनका मान था। वैवस्वत मनु के पिता सूर्य चार राजधानियों से अपना शासन चलाते थे।ये राजधानियाँ थीं –आदित्यनगर ,काश्यप नगर ,इंद्रवन तथा भ्रणडार । उन्होने बेबीलोनिया ,मिश्र और सीरिया पर भी अपने विजय ध्वज लहराये थे । इससे सूर्य का एक नाम त्रिविक्रम भी पड़ गया था । आगे सूर्य का कुल सारे संसार में सबसे अधिक विस्तृत हो गया ।

‘अदन’ (जो आदित्य नगर का ही अपभ्रंश है),में सूर्य का एक जगत प्रसिद्ध मंदिर था । जिसमें लगे स्वर्ण ,हीरे –जवाहरातों की कोई गणना नहीं थी । ‘आद’ अरबी भाषा में सूर्य को ही कहते हैं । बाइबिल का ‘आदम’ भी सूर्य ही है ।

भारत में वैवस्वत मनु तथा बुध द्वारा स्थापित दोनों कुलों ने वैदिक संस्कृति जिसमें नयी बातों का समावेश था । मुख्य बात थी विवाह प्रथा को और मजबूत करना तथा पित्र मूलक वंश –परम्परा को ही मान्यता देना । आर्यों में इन दोनों वंशों का विस्तार इतना बढ़ा कि सूर्य मंडल तथा चन्द्र मंडल क्षेत्रों का ही संयुक्त नाम ‘आर्यावर्त’ पड़ गया ।

मनु के नौ पुत्र हुए। जिनके नाम पर सूर्य वंश कि नौ शाखाएँ चलीं । मनु के सबसे बड़े पुत्र इक्षवाकु अयोध्या में ही रहे । इक्षवाकु का कुल ही सबसे अधिक विख्यात हुआ । इसी कुल में आर्द ,युवनाशव,बृहदश्व, मंधाता ,पुरू ,कुट्स,अम्बरीष ,रघु ,अज ,दशरथ जैसे शूरवीरों ने जन्म लिया । इसी वंश कि तीसवी पीढ़ी में अवरन्य हुये । जिन्होंने उत्तर कोसल कि एक दूसरी शाखा स्थापित कि । प्रसिद्ध सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र इसी शाखा इसी शाखा में हुये । उत्तर कि तीसरी शाखा भी राम जन्म के पहले स्थापित हो चुकी थी ।जिसमें सागर और भागीरथ पैदा हुये थे । पैंतीसवीं पीढ़ी में आयुतयुद्ध ने दक्षिण कोसल राज्य का निर्माण किया ,जिसमें ऋतुपर्णा ,सुदास आदि राजा हुये । इनही महराज ऋतुपर्णा के यहाँ नल ने गुप्त वास के दिन बिताए थे ।

मनु के एक पुत्र शर्याति भी थे । जिन्होंने गुजरात में संभात की खाड़ी के पास एक खुशहाल राज्य की स्थापना की थी । इस राज्य का नाम अपने युवराज ‘आनर्त’ के नाम पर उनहोनने ‘आनर्त’ रखा था ।शर्याति की पुत्री सुकन्या का विवाह महर्षि च्यवन से हुआ था । जिनके कुल में दधीचि ,ऋचीक ,जमदग्नि तथा भगवान परशुराम जैसे तेजस्वी ऋषि उत्पन्न हुये ।

जिस समय महाबली रावण बाली ,जावा ,सुमात्रा,आंध्रालय (आस्ट्रेलिया) तथा लंका को विजिट कर अपने साम्राज्य का निर्माण कर रहा था । सूर्य वंश की मुख्य गद्दी पर पराक्रमी सम्राट दशरथ राज्य कर रहे थे । उन्होने सिंधु ,सौराष्ट्र ,सौवीर ,मतन्यु ,काशी ,दक्षिण कोसल ,मगध ,अंग, बंग ,कलिंग पर विजय पायी थी । उनकी तीन महारानियाँ थीं । दक्षिण कोसल महाराज की पुत्री कौशिल्या ,मगध की राजकुमारी सुमित्रा ,और उत्तर पश्चिमी आनन केकय की पुत्री कैकेई ।

महाराज दशरथ के स्वर्ग वास के बाद श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में भरत ने चौदह वर्ष पूरे साम्राज्य को संभाला । रावण को मार्कर उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य को मित्रा विभीषण के अधीन कर जब श्री राम सिंहासनासीन हुये ,उस समय पूरे विश्व में इतना विस्तृत , इतना प्रभावशाली कोई साम्राज्य नहीं था ।रामराज्य सारे संसार में व्याप्त था ।

भगवान राम के राज्य ग्रहण कर लेने के बाद मथुरा के शासक लवणआसुर ने उन्हें शासक मंजूर नहीं किया । श्री राम ने शत्रुघ्न को सेंस के साथ माथुर भेजा । शत्रुघ्न ने लवण आसुर को मर डाला और मथुरा को उत्तर कोसल का उप राज्य बना दिया । श्री राम ने मथुरा की गद्दी पर शत्रुघ्न को ही आसीन कर दिया । जहां वे बारह वर्ष तक शासन करते रहे लगभग उसी समय केकय पर आक्रमण हुआ । राम ने केकय की रक्षा के लिए चतुरंगी सेना लेकर भरत को भेजा । भरत ने न केवल केकय की रक्षा की ,अपितु आक्रामक गंधर्व देश पर भी कब्जा कर लिया । राम ने उस साम्राज्य पर भरत का अभिषेक कर दिया भरत के बेटे पुष्कर ने आगे चलकर वहाँ ‘पुष्करावती’ नगर बसाया जो अब पेशावर कहलाता है । भरत के दूसरे पुत्र तक्ष ने अपने नाम पर ‘तक्षशिला’ नागरी बसायी ।

राम के ज्येष्ठ पुत्र कुश युवराज बने । विभीषण ने कुश की अभ्यर्थना करने के लिए लंका के अधीन ‘शिवदान द्वीप’ का नाम ‘कुशदीप’ रख दिया। जो बाद में अफ्रीका महादीप कहलाया । कुश का केंद्र स्थान अयोध्या ही रहा । राम के दूसरे पुत्र लव का राज्य केंद्र श्रावस्ती था । लव ने ‘लवपुर’ नगर की स्थापना भी की । जो आज लाहौर है ।

लक्ष्मण के दो पुत्र अंगद और चन्द्रकेतु हुये । ये दोनों अंगद नगर और चंद्रावती के स्वामी हुये । शत्रुघ्न के दोनों पुत्रों में सुबाहु को मथुरा तथा शत्रुघाती को विदिशा के राज्य विरासत में मिले ।

सभी वंश सैकड़ों वर्षों तक चले । परंतु लव का वंश सबसे अधिक समय तक चला । लव श्रावस्ती के सम्राट थे । यह वंश महाभारत में भी विद्यमान था । इसी वंश के वृहद्दल ने महाभारत युद्द में प्राणोत्सर्ग किए थे । उसके एक हजार वर्ष बाद भी बुद्धकालीन भारत में सम्राट प्रसन्नजीत इसी वंश के शासक थे ।

लेखिका का परिचय
लेखिका एक गृहिणी हूँ और अधिकतर समय घर व बच्चों की देख -रेख में बीतता है, लेकिन इन्हीं क्रिया कलापों के बीच लेखकीय मन कुलबुलाने लगता है और इस तरह की कोई रचना निकल आती है। अब तक मेरी कई रचनाएँ देवगिरी समाचार ,राष्ट्रीय सहारा,लोकमत समाचार,विचार सारांश, संगिनी, वनीता जैसी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वे मूलतः बहराइच की रहने वाली हैं और वर्तमान में लखनऊ में रह रही हैं।

संपर्क
8604408579
Mail : [email protected] com

image_pdfimage_print


Get in Touch

Back to Top