Monday, July 22, 2024
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Homeजियो तो ऐसे जियोशशि सक्सेना की रचनाओं में मुखर परिवेश व मानवीय संवेदनाओं के स्वर

शशि सक्सेना की रचनाओं में मुखर परिवेश व मानवीय संवेदनाओं के स्वर

एक दिन रूठ गई बंदरिया
गई ना नाच दिखाने
शर्म से गर्दन नीची करके
बंदर चला कमाने।

बाल कविता ” बंदर चला कमाने ” में आगे आजकल सड़क बाजारों में मजनू टाइप के लड़के जो लड़कियों एवं महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करते हैं उन पर कवयित्री प्रहार करती है….
बीच बजरिया मिली बंदरिया/ पहने सुंदर हार।
बंदर बोले मैडम हमको/ हो गया तुमसे प्यार।
हो गई मैडम आग बबूला/ मारी सेंडल एक।
बंदर जी झट भागे घर को / टाई-चश्मा फेंक।

बाल कविता के मध्यम से कितने गंभीर मानवीय संवेदना के विषय को सरल और सहज शब्दों में अभिव्यक्त किया है रचनाकार ने की बच्चों को छोड़ बड़ों को भी लुभाले। ऐसे ही एक बाल कविता में मोबाइल से गलत नंबर डायल करने से होने वाली परेशानी को इस प्रकार वक्त किया है।

एक दिन सोचा चुहिया ने/क्यों न एक मोबाइल लाऊं।
चैट करूंगी चूहे से नित/ और उदासी दूर भगाऊं।
लगा एक दिन नंबर रॉग/ म्याऊं म्याऊं दिया सुनाई।
तभी फेंक मोबाइल चुहिया/झटपट बिल में दौड़ी आई।

माँ शारदे के असीम वरदान से साहित्य और संगीत से जुड़ी शशि सक्सेना एक ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने आसपास के सामाजिक और पारिवारिक परिवेश और संदर्भों से जुड़ी घटनाओं और प्रसंगों को अपनी रचनाओं कविताओं और कहानियों में स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति प्रदान की हैं। इनका प्रभावी और भावपूर्ण सृजन देख कर लगता है जैसे आपके और हमारे जीवन के इर्द- गिर्द का ही दृष्टांत और चित्रण चल रहा हो।

संगीत के सुर ताल कब कविता और कहानी के सुर बन गए पता ही नहीं चला। ये हिंदी भाषा में लक्षणा शेली में गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में, सभी नवरसों में कहानी, बाल कविताएं,‌बड़ी कविताएं, लेख, हास्य व्यंग्य, गीत, ग़ज़ल, और छन्द आदि में अपने मन के भावों को स्वतंत्र रूप से लिखने में सिद्धहस्त हैं। जापानी शैली की हाइकु अर्थात तीन पंक्तियों की छोटी कविता लिखने में भी प्रवीण हैं। इनके लिखे हाइकु ह्यूस्टन- अमेरिका से प्रकाशित प्रथम ‘श्रीराम पीयूष हाइकु’ में प्रकाशित होना गर्व का विषय है। “हाइकु” में कवयित्री ने कम शब्दों में गागर में सागर भरने का सफल प्रयास किया है। कुछ हाइकु की बानगी देखिए…
(1) खुशहाली है
कच्ची ईटों से बने
उन घरों में।
( 2 ) घोसलों से वो
उड़ान लेने लगे
मां का हाथ था।
( 3 ) घाव गंभीर
हथियार हैं देते
शब्द हंसते।।
( 4 ) दूध पीता तो
‌‌लातें मारता, पेट
भरने तक।।
( 5 ) तन शरीरी
भावना अशरीरी
चोट गहरी।।

छोटी कविता हाइकु के साथ – साथ अनेक बड़ी कविताएं भी इनकी अपनी साहित्यिक पूंजी हैं। “ बेटी” विषय पर लिखी इनकी एक कविता की बानगी देखिए जिसका अनुवाद और प्रकाशन उड़िया भाषा में भी हुआ है, कुछ इस प्रकार हैं …
बेटी देवी में है दुर्गा/ देह में ये जिगर का टुकड़ा ।
तुलसी है घर के आंगन की/ उषा की ये प्रथम किरण भी।
संध्या की यह पहले बाती/ रागों में यह भीमपलासी।
आभूषण में सुंदर कंगना/स्रोतों में निर्मल झरना।

पीहर की यह सोन चिरैया/ प्रियतम के घर की गौरैया।
रोशन है इससे घर आंगन/ इससे दुनियां लगती मधुबन।
त्योहारों में है यह दिवाली/ सूक्ष्मजीव में तितली प्यारी।
पक्षी में तो यह मयूर है/ पशुओं में यह गौ निरीह है।
बारंबार भगवान मनाऊं/ जन्म जन्म मैं बिटिया पाऊं।

बाल कविताओं में वर्तमान में गिरते मूल्यों की पुनर्स्थापना पर जो़र एवं युवा पीढ़ी को अपने कर्तव्य एवं निष्ठा के प्रति जागरूक कर बच्चों के जीवन में उच्च आदर्शों एवं संस्कारों की स्थापना कर मानव समाज की ऐसी समस्याओं को उद्घाटित करना जो बच्चों से अधिक बड़ों के सोच- सरोकारों का विषय बन जाएं। बच्चों को खेल-खेल में बिना मस्तिष्क पर बोझ डाले ऐसा ज्ञान देना जिसकी वर्तमान समय के दैनन्दिनी जीवन में महती आवश्यकता है।

रचनाकार की प्रकाशित “तितलियों के पंख” बाल कविता संग्रह में कुल 60 कविताएं हैं। इस संग्रह की सभी रचनाओं में कहानी शेर, भालू, हाथी जंगली जानवर तो कहीं घरेलु कुत्ता, बिल्ली तो कहीं पक्षी जगत् के उल्लू, चिड़िया, तोता, मैना आदि अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं तो कहीं ऋतुएं सर्दी, गर्मी, बरसात अपना रंग बिखेर रही हैं। कहीं कवयित्री बाल सुलभ खेल गुड्डा- गुड़िया, कबड्डी, अक्कड़-बक्कड़ आदि का दृश्य भी उपस्थित करना नहीं भूली हैं। संग्रह में काव्य रूपकों में बैंगन, भिंडी,आलू, मूली,गाजर अपना स्वाद छोड़ रहीं हैं तो कहीं बरगद आदि वृक्ष की शाखाएं बालकों का अभिनंदन करती दिखाई देती हैं। बड़ी कविताओं में सामाजिक व्यवस्था एवं मूल्यों पर तीखा प्रहार किया है।

रचनाओं में मौलिकता, सहजता और चित्रात्मकता को इस तरह पिरोया है कि बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ प्रत्यक्ष, परोक्ष रूप से उपदेश भी मिलता है।

इनकी कहानियों में सामाजिक बुराइयों का विच्छेदन और इलाज, सामाजिक ताने-बाने में उलझती आकृतियां, गृह कलह के शूल, उन पर लगाए गए मरहम, जीवन दर्शन, अंतिम पैराग्राफ तक बनी जिज्ञासा और लगभग सुखांत अंत पर आधारित कहानी संग्रह “रिटर्न-गिफ्ट” में 11 बड़ी और 17 लघु कथाएं शामिल हैं। कहानी “ नया घर” में नारी स्वभाव की शाश्वतता का दिलकश विवरण है “ सच है विधाता ने नारी के स्वभाव में कितने विलक्षण गुण समाहित किए हैं। कभी वह चंडी है तो कभी असहनीय आक्रोशों को आत्मसात कर निरंतर बहने वाली सरिता।“ जीवन दर्शन को दर्शाते हुए कहानी ”विश्वास”” का एक वाक्य-
“ औरत को जीवन के हर मोड़ पर अपने अरमानों का गला घोट कर समझौता करना होता है”। लेखिका की लघु कहानी ”सौदा” में समाज की असमानता का मार्मिक चित्रण और असमानता को दूर करने का संदेश है। लघु कहानियों के उद्देश्य रिश्तों के भावनात्मक मोड़ लिए हुए हैं । ’आत्मसंतुष्टि’ कहानी में धन को ही सब कुछ न मानकर मन की आत्मसंतुष्टि को अधिक महत्व दिया गया है। कहनी संग्रह की शीर्षक कहानी ‘रिटर्न-गिफ्ट’ स्पष्ट संदेश देती है कि जीवन में कितनी अदृश्य व अनाम खुशियां हैं जो हमारे एक सही क़दम से हमारे क़दम चूमने लगती हैं। इस पुस्तक की कहानियों में वह सब कुछ है जिसे आप हम सब प्राय: अपने जीवन में देखते हैं।

लगता है मानो मरुभूमि में कोई हरा भरा वृक्ष अपनी जिजीविषा ढूंढ रहा है। कहानियों के मुख्य स्वर हैं समाज, रिश्ते, भारतीय सांस्कृतिक मूल्य, मानवता के लिए जो उथल-पुथल मन में चल रही है वह सब यदि मन से मन का जुड़ाव हो और प्रत्येक को अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास हो तो पुख़्ता से पुख़्ता संस्कार व आदतों को बदला जा सकता है। यह कृति राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा अनुदान एवं सहयोग राशि से सम्मानित है।

कहानी की विषयवस्तु सामाजिक उथल-पुथल को रूपायित करती हैं। समाज में प्रचलित प्रदर्शन व अहंकार को दूर कर सामाजिक, पारिवारिक रिश्तों में मूल्यों की स्थापना करती हैं एवं समाज की दकियानूसी परंपराओं पर हथौड़ा चलाया गया है। कहानियों के माध्यम से कहीं प्रेम तो कहीं साधना, कहीं दर्शन तो कहीं उपदेशों के माध्यम से नव समाज की रचना हेतु विचारों को उद्वेलित एवं झकझोरने वाली क्रांति का संदेश दिया है।

लेखिका ने राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में रचना प्रकाशन में विशेष स्थान बना कर हाड़ोती साहित्य का गौरव बढ़ाया है। है। नेपाल-भारत काव्य संग्रह’ में तीन कहानियां नेपाली भाषा में, दिल्ली से प्रकाशित ’संरचना ‘ में ‘संबोधन’ कहानी ,जयपुर से प्रकाशित ’एक कटोरी चीनी ‘ पुस्तक में दो लघु कथाएं, उड़िया पत्रिका ’अग्निरूपा ‘ में कविता ‘बेटी’, पटियाला की ‘ लघु कलश ‘में लघु कथाएं, पत्रिका ‘ नवतरंग ‘ में “हिंदी की शान” गुड़गांव से ’ “दैनिक नवसमाचार”’ में कहानियां, सहित धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सरिता, मनोरमा, गृहशोभा, जाह्नवी, चंपक, पराग,चंदामामा, नंदन,बालहंस आदि में इनकी रचनाओं का खून प्रकाशन हुआ है। ‘लीडिंग लेडिज़ ऑफ़ इंडिया’ पुस्तक में राजस्थान से रचनाकर का परिचय प्रकाशित हुआ है।

परिचय :
संगीत और साहित्य का संगम लिए रचनाकार शशि जैन का जन्म 7 अगस्त 1949 को अजमेर कर किशनगढ़ में पिता विश्वेश्वर नाथ सिन्हा और माता ब्रज रानी सिन्हा के आंगन में हुआ। आपने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर, बी. एड. और संगीत गायन में एम.ए.( भास्कर) की शिक्षा प्राप्त की। ई-टीवी राज. से साक्षात्कार एवं आकाशवाणी द्वारा नियमित रूप से कहानी, वार्तायें, हास्य व्यंग्य आदि का प्रसारण होता है। लगभग 30 वर्षों तक डीसीएम कोटा की श्री रामलीला का संगीत एवं नृत्य निर्देशन किया है।

समर कैंप (पाई) राजस्थान पत्रिका एवं एन.सी.सी. कैंप में संगीत नृत्य प्रशिक्षण। आप मुंशी प्रेमचंद साहित्य रत्न सम्मान, सांस्कृतिक क्षेत्र में महाराष्ट्र सरकार व राजस्थान सरकार द्वारा नृत्य में सम्मानित, बेस्ट आर्टिस्ट’ एवं निर्णायक रूप में सम्मानित और समाज सेवा में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ-साथ विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित हो चुकी हैं। काव्य गोष्ठियों में आप काव्य पाठ करती हैं। आप सेवानिवृत्त व्याख्याता, (रा.विज्ञान), ‘निदेशक’, साधना संगीत संस्थान, कत्थक नृत्य गुरु एवं चार्टर, फाउण्डर प्रेसिडेंट इनर व्ह्वील क्लब, कोटा नोर्थ हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न संस्थाओं से जुड़ कर साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। चलते – चलते इनकी एक कविता “द्रौपदी”
के कुछ अंश देखिए……..
“हे ज्येष्ठ पिता! बतलाएं मुझे
कुलवधू, पुत्री में अंतर क्या?
पत्नी, वस्तु या व्यक्ति है?
यदि वस्तु है तो अधर्म है क्या
क्यों कुरुवंश की मर्यादा
केशों से पकड़ घसीटी गई?
हे पितामह! अब मौन हैं क्यों?
है क्या,समस्या का, समाधान यही ?

संपर्क :
ए -18, कृष्णा नगर
गली नं.- 1 बजरंग नगर,
कोटा -324001(राजस्थान)
मोबाइल : 9413470238
—————–
डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा।

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