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कभी स्व.कलाम के ड्राइवर थे, अब इतिहास के प्रोफेसर हैं!

कभी सेना में कलाम के ड्राइवर रहे कथीरेसन अब कॉलेज में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। कथीरेसन और कलाम का साथ लंबा रहा और उनका मानना है कि इस साथ ने ही उनकी जिंदगी बदली।

भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम दक्षिण तमिलनाड के एक छोटे से कस्बे विरुदुनगर में एक कॉलेज के कार्यक्रम में आए थे। वहीं पास के एक कस्बे से एक व्यक्ति उनसे मिलने के लिए आए थे, चूंकि वे कार्यक्रम के लिए देर से पहुंचे थे, इसलिए उन्हें कॉलेज के गेट पर ही रोक दिया गया था। वे कलाम के भूतपूर्व ड्राइवर वी. कथीरेसन थे, उन्होंने बाहर ही रुकना ठीक समझा ताकि जब कलाम बाहर आएं तो वे उनसे मिल पाएं।

कलाम ने पहले से ही इस कार्यक्रम में आने की जानकारी कथीरेसन को दे दी थी और कॉलेज के उस कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित किया था। लेकिन जैसा अमूमन होता है, कथीरेसन सिक्योरिटी के लोगों को कलाम से अपने खास रिश्ते को समझा नहीं पाए। और इसलिए उन्हें कॉलेज में दाखिल ही नहीं होने दिया गया।

बाद में किसी ने उन्हें बताया कि कलाम पीडब्लयूडी के बंगले पर दिन का खाना खाएंगे, जो कि कॉलेज से एक किमी दूर है। वहां शायद आपकी मुलाकात हो जाए। कथीरेसन वहां पहुंचे और वहां ड्यूटी पर तैनात डीएसपी से अनुरोध किया कलाम को उनके बारे में बताने के लिए।

बाद में क्या हुआ, वो उन्हें पता नहीं। लेकिन कलाम जब अपने काफिले के साथ वहां पहुंचे तो उन्होंने कथीरेसन को बुलाया और उसी गर्माहट और अपनेपन से उन्होंने उससे बात की। कथीरेसन बताते हैं कि ‘उन्होंने मुझे लंच के लिए आमंत्रित किया। मैं बहुत गौरवान्वित हुआ और साथ ही बहुत लज्जित भी… आखिर वहां एसपी और कलेक्टर सहित सारे वरिष्ठ अफसर उनके सामने खड़े थे।’

ये वही 53 वर्षीय वी. कथीरेसन हैं जिनके जीवन को कलाम ने पूरी तरह से बदल दिया। वे कभी सेना में कलाम के ड्राइवर रहे हैं और अब वे कॉलेज में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। कथीरेसन और कलाम का साथ लंबा रहा। 1979 में दसवीं में फेल होने के बाद सिपाही के तौर पर सेना में शामिल हुए। जब उन्होंने अपनी ड्राइवर की ट्रेनिंग पूरी की तो उनकी पहली ही पोस्टिंग रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान (डीआरएलबी) हैदराबाद में मिली। वहां वे संस्थान के डायरेक्टर कलाम के ड्राइवर नियुक्त हुए।

कथीरेसन बताते हैं कि वे दोनों एक ही जिले अविभाजित रामनाद से आते हैं। कथीरेसन को कलाम पसंद करने लगे थे। उन्होंने कथीरेसन को पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया था। और उन्होंने ही पढ़ाई से संबंधित सारी व्यवस्था भी की। कथीरेसन बताते हैं कि ‘वे 10वीं में अंग्रेजी में ही फेल हुए थे, तो कलाम ने उन्हें अंग्रेजी को पढ़ने की सलाह दी। तब मुझे अंग्रेजी में 26 नंबर आए थे और मैं फेल हो गया था। उन्होंने मुझे अंग्रेजी सीखने में मदद दी। कुछ किताबें भी दी। मैंने उनके साथ जनवरी 1982 में काम करना शुरू किया था और साल के अंत में मैंने अंग्रेजी के पेपर में 44 नंबर हासिल किए।’

कलाम ने उन्हें हमेशा पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। ‘उन्होंने मुझसे पूछा कि 12 वी क्लास में मैं क्या पढ़ना चाहूंगा? मैंने कहा इतिहास…तो उन्होंने मुझे उस ग्रुप में एनरोल किया जिसमें तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ अकाउंटेंसी, कॉमर्स और अर्थशास्त्र के साथ इतिहास भी पढ़ाया जाता हो।’

12वीं के बाद कथीरेसन ने स्‍नातक किया, फिर इतिहास में ही पत्राचार से स्‍नातकोत्तर की डिग्री ली। बाद में शिक्षा में भी स्‍नातक और स्‍नातकोत्तर डिग्री ली। कथीरेसन याद करते हैं कि एक बार डॉ. कलाम ने उनसे कहा था ‘कि यदि मेरे पास ये डिग्रियां होती तो मैं टीचर होता और ये भी कि अब मुझे डॉक्टोरेट कर लेना चाहिए… ताकि मैं कॉलेज में लेक्चरर हो पाऊं।’

उन्होंने तब तक कलाम के साथ 10 साल काम किया। जब डॉ. कलाम 1992 में प्रधानमंत्री के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार होकर दिल्ली आ गए, तब साथ छूटा। लेकिन डॉ. कलाम ने लगन उनमें पैदा की, उसने अपना असर दिखाया। उन्होंने 1998 में सेना से एच्छिक सेवानिवृत्ति ली। उसी साल उन्होंने पीएच.डी. में रजिस्ट्रेशन करवाया। और ‘तिरूनेल्वेली जिले में जमींदारी व्यवस्था’ विषय पर पीएच डी. की।

इस विषय में उनकी रूचि भी डॉ. कलाम द्वारा भेंट दी गई किताब से जागी। ये किताब तमिलनाडु के स्थानीय सूबेदारों के अंग्रेजों के संघर्ष पर आधारित थी। सूबेदारों की हार के बाद ही अंग्रेजों ने वहां जमींदारी व्यवस्था लागू की। उन्हें 2002 में डॉक्टरेट अवार्ड हुई। उसके बाद उन्होंने कुछ समय सरकारी स्कूल में पढ़ाया। बाद में उन्होंने विरुदुनगर जिले के कलेक्टोरेट में भी काम किया।

बाद में 2008 में उनकी नियुक्ति गवर्नमेंट आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज अथूर में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर हुई। कथीरेसन कहते हैं कि आज वे जो कुछ भी हैं, वो कलाम के प्रोत्साहन से ही है। ‘उन्होंने मेरी फीस दी, मेरे लिए किताबें खरीदी और मेरी पढ़ाई की चिंता भी की।’ कथीरेसन बताते हैं कि ‘डॉ. कलाम बहुत ही सादा इंसान थे, 2011 में वे हमारे घर आएं और मेरे परिवार के साथ खाना खाया।’आज कथीरेसन अपनी स्कूल टीचर पत्नी और मेडिसीन पढ़ रहे बेटे के साथ कई बच्चों को इतिहास में पीएच.डी. करवा रहे हैं। और डॉ. कलाम के प्रोत्साहन को दूसरों में आरोपित कर रहे हैं।

साभार-: http://naidunia.jagran.com से

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