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रीढ़हीन पत्रकारिता पर एक असली पत्रकार की पीड़ा

1977 में जनता पार्टी की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी ने इमरजेंसी के समय की पत्रकारों की स्थिति पर तंज करते हुए कहा था कि आप को तो बैठने के लिए कहा गया था लेकिन आप तो लेट गए । आप को झुकने को कहा गया था , आप तो रेंगने लगे । तब से , अब में बहुत फर्क पड़ गया है । पत्रकारों से अब तो सरकार बाद में पहले मालिकान अपने चरणों में लेटने को कहते हैं और यह अपना जमीर मार कर लाश बन जाते हैं । बीवी , बहन बेटी तक पेश कर देते हैं । ऐसे एक नहीं अनेक उदहारण हैं । और सत्ता के लिए तो यह सप्लायर बन चुके हैं । स्थितियां विद्रूप से विद्रूप होती गई हैं ।

जनता अख़बार पढ़ कर , न्यूज़ चैनल देख कर शेयर मार्केट , म्यूचुवल फंड आदि का रुख समझती है । और यह अख़बार , यह चैनल अख़बार और चैनल के लिखने और बताने का रुख शेयर जारी करने वाली कंपनियां तय करती हैं । जनता अख़बार और चैनल देख , पढ़ कर राजनीतिक तापमान और रुख समझती है । लेकिन मीडिया का यह रुख भी राजनीतिक पार्टियां ही तय करती हैं । इसी तरह अपराध की ख़बरें भी पुलिस ही तय करती है । पुलिस ही सारी ब्रीफिंग करती है , कभी आफिशियली , कभी अनआफिशियली । भ्रष्टाचार की खबरों का भी यही हाल है ।

भ्रष्टाचारी ही , भ्रष्टाचारी के खिलाफ खबर देते हैं । कई बार पत्रकार दूसरे पक्ष से भी डील हो जाता है , खबर खत्म हो जाती है । खबर भी होती है , ब्लैकमेलिंग भी , एफ़ आई आर भी और जेल भी । लेकिन समझौता भी हो जाता है । आप देखिए न तमाम फालतू फिल्मों की शानदार समीक्षा आखिर किस गणित के तहत होती हैं । संजू फिल्म में जिस तरह मीडिया को कुत्ता बता कर दुत्कारा और हिट किया गया है , उस पर मीडिया जगत में कोई नाराजगी या कसैलापन दिखा क्या । कभी नहीं दिखेगा । तमाम चार सौ बीस ज्योतिषियों की दुकान कैसे सजी-धजी दिखती हैं । कभी सोचा है आप ने । और एक दिन पता चलता है कि अरे , यह तो बलात्कारी भी है । यह आशाराम , यह राम रहीम , यह दाती महराज जैसे बलात्कारी इसी मीडिया की तो उपज हैं । यह निर्मल बाबा , यह रामदेव हैं क्या चीज़ । मीडिया के कंधे पर बैठे सपेरे । लेकिन क्या आप भी सांप हैं ? इस उपभोक्ता समाज में आप को यह सांप की तरह मीडिया की बीन पर आप इस कदर नाचने को अभिशप्त एक दिन में तो नहीं हुए । यह जहर , यह अदा आहिस्ता , आहिस्ता इसी कमीनी मीडिया ने आप में घोला है ।

किसानों , मजदूरों , बेरोजगारों की खबरें क्यों सिरे से गायब हैं । रियल स्टेट , हवाला , नागरिक सुविधाओं और उन के नित नए ढंग से छले जाने की खबरें क्यों गायब हैं । ऐसी तमाम बुनियादी खबरें हवा में भी नहीं हैं । बेज़मीर संपादकों की आत्महत्या की ख़बर भी अगर सोशल साइट न हो तो कोई पूछने वाला नहीं है । बातें और विस्तार और भी बहुत हैं ।

लेकिन तय मानिए अगर सोशल साइट नहीं होते तो यह अख़बार मालिकान और उन के कुत्ते संपादक और इन संपादकों के पिल्ले पत्रकार आप को कब का बेच कर भून कर खा चुके होते । जल्दी ही इन पर भी क्रमश: लिखना शुरू करूंगा । नरक से भी बदतर है यह मीडिया की चमकीली दुनिया । मीडिया के मालिकों का कोढ़ जब आप जानेंगे तो बोलेंगे यह कोढ़ी तो फिर भी ठीक है । कोढ़ियों का एक बार इलाज मुमकिन है लेकिन इन मीडिया मालिकों और इन के कुत्तों का नहीं । लाखों , करोड़ों के पैकेज पाए इन के कुत्तों की स्थिति एड्स के मरीजों से भी गई गुज़री है ।

लिखूंगा , लिखूंगा , लिखूंगा ।

बहुत जहर पिया है , बहुत अपमान और बहुत मुश्किलें भोगी हैं । इस का शमन करना तो पड़ेगा , सिलसिलेवार करना पड़ेगा । फ़िलहाल अपनी ही एक ग़ज़ल के दो शेर हाजिर कर रहा हूं :

भडुए दलाल हमारे सिर पर पैर रख कर आगे निकल गए
हम इतने बुजदिल हैं कि टुकुर-टुकुर सिर्फ़ ताकते रह गए

राजनीति भी उन्हीं की प्रशासन भी मीडिया में भी वही हैं
हर जगह यही काबिज हैं ईमानदार लोग टापते रह गए

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