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क्या धर्मांतरण को बढ़ावा देगी भारत में खुल रही पहली इस्लामी बैंक?

जिन नरेद्र मोदी ने मुख्यमंत्री रहते हुए मुसलमानों द्वारा अपना सम्मान करते समय उनकी टोपी पहनने से मना कर दिया था आज उसी गुजरात के अहमदाबाद में इस्लामिक विकास बैंक की पहली शाखा खोली जा रही है। इस्लामी देश भारत की अर्थव्यवस्था में घुसपैठक करने के लिए गत दो दशकों से इसका प्रयास कर रहे थे। उनकी यह कोशिश थी कि उन्हें भारत में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था को शुरु करने की अनुमति मिले मगर पुरानी कांग्रेस सरकार ने देश में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था शुरु करने की अनुमति नहीं दी थी। संघ परिवार भी देश में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था को शुरु करने का डट कर विरोध कर रहा था। जब केरल की कांग्रेस सरकार ने केरल में इस्लामी बैंक की स्थापना के लिए एक त्रिपक्षीय निगम गठित करने का प्रयास शुरु किया तो सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इसका डटकर विरोध किया था।

डा स्वामी का तर्क था कि देश में इस्लामी बैकिंग व्यवस्था शुरु करने के खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। इन बैंकों द्वारा इस्लामी उग्रवाद की ज्वाला को भड़काने के लिए विदेशों से भारी मात्रा में आर्थिक सहायता प्राप्त हो सकती है। वे इस मामले को उच्चतम न्यायालय तक ले गए। संसद में मनमोहन सिंह सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए रहमान खान ने इस्लामी बैंकिंग को देश में लागू करने वकालत की तो उनका साथ सभी मुस्लिम सांसदों ने दिया। भले ही उनका संबंध किसी भी राजनीतिक दल से था। तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सफाई देते हुए कहा कि इस समय रिजर्व बैंक ने देश में नए बैंक खोलने के लिए जो दिशा-निर्देश बना रखे हैं उनके अनुसार इस्लामी बैकिंग व्यवस्था को देश में शुरु करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

उन्होंने सफाई दी कि भारतीय बैंकिग व्यवस्था के अनुसार बैंक उनमें जो व्यक्ति अपनी धनराशि जमा करवाता है उसे ब्याज के रुप में कुछ धनराशि प्रदान करते हैं जबकि इस्लामी बैंक व्यवस्था में जमा धनराशिकर्ता को ब्याज का भुगतान नहीं किया जाता क्योंकि ब्याज लेना और देना इस्लाम के अनुसार हराम है।

खास बात यह है कि कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार देश में जिस बैंकिग व्यवस्था को लागू करने के लिए तैयार नहीं हुई थी उसे मोदी सरकार ने हरी झंडी दे दी। इस संदर्भ में अप्रैल माह में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सउदी अरब के दौरे पर आए थे तो सउदी अरब के सरकारी इस्लामिक विकास बैंक ने भारत के एक सरकारी बैंक के साथ भारत में इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था को शुरु करने के लिए समझौता किया। देश के सबसे बड़े अंग्रेजी समाचार द टाइम्स आफ इंडिया (24 मई 2016) ने अपने अहमदाबाद संस्करण में इसकी पुष्टि की।

इस समाचार के अनुसार इस्लामिक विकास बैंक भारत में इस्लामी बैकिंग व्यवस्था के विस्तार के लिए एक सौ मिलियन डालर धनराशि खर्च करेगा। इस बैंक ने यह भी आश्वासन दिया है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए बैंक की ओर से 350 मोबाइल वैन भी उपलब्ध कराई जाएंगी। इस सौदे को करवाने में नरेंद्र मोदी के एक करीबी मुस्लिम नेता जफर सरेशवाला की विशेष भूमिका है। जफर सरेशवाला ने इस समझौते की पुष्टि की और कहा कि इस्लामी बैंक की पहली शाखा अहमदाबाद में खोली जाएगी। यह बैंक मुस्लिम वक्फ संपत्तियों के विकास पर भी भारी धनराशि खर्च करेगा जिससे भारतीय मुसलमानों को भारी लाभ होगा।

गौरतलब है कि इस्लामिक विकास बैंक सउदी अरब का सरकारी बैंक है। इससे जो लाभ प्राप्त होता है उसका इस्तेमाल इस्लाम के प्रचार प्रसार और धर्मांतरण के लिए किया जाता है। दस वर्ष पूर्व इस्लामिक विकास बैंक के निर्देशक मंडल की एक बैठक दुबई में हुई थी जिसमें यह मत व्यक्त किया गया था कि विश्व में भारत ऐसा देश है जिसमें गैर-मुसलमानों की संख्या सबसे अधिक है। इसलिए भारत में इस्लाम के प्रचार-प्रसार और धर्मांतरण की सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं। इस बैंक ने देश में इस्लाम के प्रचार के लिए एक कार्यक्रम भी बनाया था।

पाकिस्तानी बैंकिंग विशेषज्ञ मौलाना अब्दुल रहमान कैनानी ने कराची के डॉन समाचार पत्र में जुलाई, 1981 में ‘इस्लामी बैंकों का विश्व आंदोलन’ के शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें कहा गया था कि 1969 में रबात में हुए इस्लामिक देशों के प्रमुखों के सम्मेलन में यह निर्णय किया गया था कि विश्व में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बैंकिंग व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जाए। इस फैसले के बाद जेद्दाह में पहला इस्लामिक विकास बैंक स्थापित किया गया। इस समय इस्लामिक बैंक की विश्व के 56 इस्लामी देशों में शाखाएं हैं। भारत एक मात्र गैर- मुस्लिम देश होगा जिसमें इस्लामिक बैंकिग व्यवस्था शुरु की जा रही है।

इस्लामिक बैंकों की गतिविधियों की निगरानी करने के लिए एक मुस्लिम धािर्मक विद्वानों का शरई बोर्ड है जो इस बात का फैसला करता है कि इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए इन बैंकों द्वारा कौन से तरीके अपनाए जायें। यह बैंक इस्लामी शरई के तहत काम करता है।

राजीव गांधी सरकार ने अल्पसंख्यकों के आर्थिक उत्थान के लिए जो 15 सूत्रीय कार्यक्रम शुरु किया था उसके तहत राष्ट्रीयकृत बैंकों के निर्देशक मंडलों को यह निर्देश दिया गया था कि वह ऋण देते समय अल्पसंख्यक समुदाय का विशेष ध्यान रखें। बैंकों द्वारा जो ऋण वितरित किया जाता है उसका कम से कम 15 प्रतिशत अल्पसंख्यकों को दिया जाना चाहिए। इसी नीति पर मोदी सरकार भी चल रही है। अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री डा. नजमा हेपतुल्ला ने राष्ट्रीयकृत बैंकों को यह निर्देश दिया है कि मुसलमानों को स्वरोजगार शुरु करने के लिए ज्यादा से ज्यादा कर्ज दिया जाए वह भी बहुत कम ब्याज पर।

भारत सरकार ने देश में इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था शुरु करने के लिए तो हरी झंडी दे दी है मगर अभी तक रिजर्व बैंक ने अपने नियमों में संशोधन नहीं किया। ब्याज रहित बैकिंग व्यवस्था को शुरु करने के लिए रिजर्व बैंक को अपने नियमों में संशोधन करना होगा। इसके अतिरिक्त बैकों के दरवाजे क्या गैर-मुसलमानों के लिए भी खुले होंगे? क्या उनसे गैर-मुसलमान भी ब्याज रहित ऋण प्राप्त कर सकेंगे? क्या इस ऋण का इस्तेमाल गैर-मुलसमानों के इस्लाम कबूल करने के लिए प्रलोभन के रुप में तो नहीं किया जाएगा? क्या इस्लामी बैंकों की शाखाओं का इस्तेमाल आतंकवादियों को फंड उपलब्ध कराने के लिए तो नहीं होगा?

सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि संघ परिवार देश में इस्लामी बैंकिग व्यवस्था को शुरु करने का जबर्दस्त विरोध कर रहा था अब उसने देश में इस्लामी बैंक की शाखाएं खोलने के बारे में अपनी जुबान क्यों बंद कर रखी है? क्या अब संघ परिवार के लिए राष्ट्रहितों की बजाय राजनीतिक हित सर्वोपरि हो गए हैं?

साभार-http://www.nayaindia.com/ से

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