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भारत पाकिस्‍तान के बीच 18 साल बाद दूसरी बार युद्धविराम समझौता हुआ

गुरुवार यानी 25 फरवरी 2021 को भारत और पाकिस्‍तान की तरफ से एक साझा बयान जारी कर कहा गया है कि दोनों देश लाइन ऑफ कंट्रोल पर साल 2003 के युद्धविराम समझौते का पालन करेंगे ।पाकिस्‍तान इस बार इस समझौते को कितना मानता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा. उसकी मंशा पर हमेशा से भारत को आशंका रहती है ।इस समझौते का अमेरिका और संयुक्‍त राष्‍ट्र दोनों ने ही स्‍वागत किया है । भारत और पाक दोनों ही हॉटलाइन कॉन्‍टैक्‍ट के जरिए संपर्क बहाली पर राजी हुए हैं । भारत और पाकिस्‍तान के बीच 3,323 किलोमीटर का लंबा बॉर्डर है जिसमें 221 किलोमीटर इंटरनेशनल बॉर्डर और 740 किलोमीटर एलओसी है । भारत और पाकिस्‍तान ने वर्ष 2003 में एलओसी पर पहली बार एक औपचारिक युद्धविराम का ऐलान किया था ।

90 के दशक में कश्मीर आतंकवाद के दौर से गुजर रहा था और पाकिस्तान इसका खुलकर समर्थन भी कर रहा था। पीओके और भारतीय सीमा से सटे पाकिस्तानी इलाकों में पाक सेना खुद आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप चला रही थी। इसी दौरान भारत और पाक सेनाओं के बीच लगातार संघर्ष विराम उल्लंघन की घटनाएं सामने आ रही थी। साल 2002 का दौर था भारत और पाकिस्तान कारगिल के बाद एक और जंग की ओर बढ़ रहे थे। इसकी वजह थी दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला। भारत ने पाकिस्तान की इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई पर हमले की साजिश का आरोप लगाया था। जुलाई 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ आगरा सम्मेलन के दौरान मिले। इस सम्मेलन के बाद दोनों देशों के बीच तनाव में कुछ कमी देखने को मिली। आगरा समिट के बाद हुए संसद हमले के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी की पहल के बाद भारत और पाकिस्तान ने साल 2003 में एलओसी पर एक औपचारिक युद्धविराम का ऐलान किया था। भारत और पाकिस्तान के बीच 25 नवंबर 2003 की आधी रात से युद्धविराम लागू हुआ था। हालांकि सीजफायर की इन बढ़ती घटनाओं के बीच बीते 5 सालों में इसका कोई खास महत्व नहीं रह गया था। 25 नवंबर 2003 की आधी रात से भारत और पाकिस्तान के बीच लागू हुए युद्धविराम का मकसद एलओसी पर 90 के दशक से जारी गोलीबारी को बंद करना था। ये समझौता 450 मील लंबी एलओसी, इंटरनेशनल बॉर्डर और सियाचिन ग्लेशियर पर भी लागू हुआ। इस समझौते से दो दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मीर जफरुल्ला खान जमाली ने ईद के मौके पर युद्ध विराम की पेशकश की थी। युद्ध विराम के बाद ईद की मिठाईयां भी बांटी गई थी। नवंबर 2003 में वाजपेयी की पहल पर भारत ने जो सीबीएम पेश किए थे उनमें हवाई, रेल और समुद्री संपर्क के अलावा खेल-कूद संबंध जिनमें क्रिकेट श्रृंखला भी शामिल थे। दिल्ली और लाहौर के बीच ज्यादा बसें और श्रीनगर से पीओके की राजधानी मुजफ्फराबाद तक बस सेवा शुरू करना शामिल था। जनवरी 2004 को अटल बिहारी वाजपेयी सार्क की बैठक के लिए पाकिस्तान गए और दोनों देशों ने मिलकर एक साझा बयान भी जारी किया था। लेकिन पाकिस्तान की तरफ से लगातार इसका उल्लंघन होता रहा। अब एक बार फिर से बातचीत के बाद ये ठोस सहमति बनी है।

इस बार भारत और पाकिस्‍तान के बीच युद्धविराम समझौता बालाकोट एयरस्‍ट्राइक के दो साल पूरा होने के मौके पर हुआ है. जब दोनों देशों के बीच पहली बार युद्धविराम हुआ था तो वह ईद का मौका था ।उस समय भारत के विदेश मंत्रालय की ओर बयान जारी किया गया । बयान में कहा गया कि युद्धविराम को एक हफ्ते चली मीटिंग के बाद अंतिम रूप दिया गया है । इस बात का पहला संकेत जो कि बैक-चैनल वार्ता के ट्रैक पर होने का पहला संकेत इस महीने की शुरुआत में आया था, 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने भारत के खिलाफ अपने कड़े बोल जारी रखे थे। लेकिन अचानक से 2 फरवरी को जनरल बाजवा ने भारत के साथ शांति का राग छेड़ दिया। जनरल बाजवा ने कहा कि पाकिस्तान और भारत को कश्मीर मुद्दे को गरिमापूर्ण और शांतिपूर्ण तरीके से हल करना चाहिए। इसके साथ ही हाल के हफ्तों में जम्मू और कश्मीर में सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन में कमी आई है।

युद्ध विराम के ऐलान से साफ है कि भारत के पड़ोसी देश को एहसास हो गया है कि लगातार रंजिश की बुनियाद पर किसी मुल्क को कायम रखने की कोशिशें अन्ततः उसे ही खोखला बना देती हैं जिसका नतीजा पूरी कौम को भुगतना पड़ता है। भारत की शुरू से ही यह कोशिश रही है कि उसकी ही जमीन पर 1947 में तामीर किये गये पाकिस्तान के साथ उसके सम्बन्ध मधुर और दोस्ताना रहें मगर इस मुल्क के हुक्मरान अपनी फितरत से बाज नहीं आये और हर शान्ति के प्रयास के बाद उन्होंने भारत की पीठ में छुरा घोंपा। पिछला 73 साल का इतिहास इसी हकीकत की गवाही चीख-चीख कर दे रहा है ।

अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में सीमा पर गोलीबारी बन्द रखने का ख्वाहिशमन्द है? अगर ऐसा है तो सबसे पहले उसे अपनी फौजों को हुक्म देना होगा कि वे जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ कराने से बाज आयें। बेशक यह प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का जलाल और हिन्दोस्तान के फौजियों की जांबाजी है जो पाकिस्तानी फौजों को अपनी हदों में रहने की ताकीद कर कर रहे हैं क्योंकि इसने देख लिया है कि विश्व के विभिन्न मंचों पर भारत की साख किस कदर मजबूत है। यह प्रधानमन्त्री मोदी ही थे जो औहदा संभालने के बाद बिना किसी औपचारिक निमन्त्रण के पाकिस्तान की यात्रा पर सिर्फ इसलिए गये थे कि पाकिस्तान रंजिश की नीयत को छोड़ कर मित्रता के भाव से काम कर सके। मगर पाकिस्तान के समझने में भारी भूल हो गई और वह यह फलसफा नहीं समझ सका कि जो पेड़ फलों से लदा होता है वही झुकता है। मगर तब इसकी अक्ल ठिकाने आ गई जब 2019 में भारत के वीर रणबांकुरों ने इसके घर में घुस कर ही पुलवामा के कायराना हमले का बदला लिया। तब इस्लामाबाद मे बैठे इसके हुक्मरानों को इल्म हुआ कि फलदार वृक्ष क्यों झुकता है?

सीमा पर गोलीबारी का सबसे बुरा प्रभाव इस सीमा के करीब बसे हुए दोनों देशों के नागरिकों पर पङता है। उनका जीवन हमेशा खौफ के साये में बीतता है। उनकी दिनचर्या और सामाजिक जीवन व आर्थिक आय के साधन गोलाबारी की वजह से सूखने लगते हैं। यही वजह की भारत में सीमा पर बसे हुए ऐसे गांव भी हैं जिनमें वर्षों बीत जाने के बाद कोई शादी-विवाह का समारोह तक नहीं हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध नियमों में यह स्थिति वर्जित है मगर पाकिस्तान को कौन समझाये कि किसी भी देश में नागरिकों के अधिकार भी होते हैं क्योंकि इस देश में तो आधी हुकूमत फौज की और आधी हुकूमत नामचारे के अख्तियारों से लैस चुने हुए नुमाइन्दों की होती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान की जनता को ही खड़े होकर अपने हुक्मरानों पर दबाव बनाना चाहिए कि वह युद्ध विराम घोषणा का पूरे दिल से पालन करे।

दरअसल, भारत में 2014 में श्री नरेन्द्र मोदी के सत्तासीन होने से पाकिस्तान कांपने लगा और उसने अपना डर छुपाने की गरज से कायराना हरकतें करनी शुरू कर दीं। मगर इस परिप्रेक्ष्य में हमें ध्यान रखना चाहिए कि 2013 में पाकिस्तान में राष्ट्रीय एसेम्बली के लिए जो चुनाव हुए थे उनका एक प्रमुख चुनावी एजेंडा भारत के साथ दोस्ताना ताल्लुकात कामय रखने का भी था। इन चुनावों में मुस्लिम लीग के मियां नवाज शरीफ कामयाब हुए जिनके पाकिस्तानी फौजी हुक्मरानों से सम्बन्ध तोड़ने पड़े थे। अतः पाक की फौजों ने भारत के साथ अपनी पुरानी रंजिश की नीति को अंजाम देकर भारत के साथ मधुर सम्बन्धों में रुकावटें डालने के लिए सीमा पर गोलाबारी शुरू करके और जम्मू-कश्मीर में घुसपैठिये भेजने की राह चुनी।

हालांकि यह पाकिस्तान की अन्दरूनी सियासत का मसला है जिससे भारत का कोई लेना-देना नहीं है मगर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने से इसका सीधा लेना-देना है और इसी वजह से भारत ने साफ कर दिया है कि घुसपैठियों की कार्रवाइयों पर भारतीय सेना चुप नहीं बैठेगी। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि गर्मियां आने पर पहाड़ों पर बर्फ पिघलने लगती है और इसका फायदा उठाकर पाकिस्तान भारत में आतंकवादी भेजता है। डीजीएमओ लेवल की बातचीत के बावजूद भारत को सीमा पर चौकन्ना रहना होगा क्योंकि पीठ में खंजर घोपने और धोखबाजी की पाकिस्तान की पुरानी आदत है। अब भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या छल और धोखे के अपने पुराने इतिहास को क्या पाकिस्तान फिर दोहराएगा?

अशोक भाटिया
स्वतंत्र पत्रकार व लेखक
अ /001 वैंचर अपार्टमेंट , वसंत नगरी, वसई पूर्व -401208
( जिला – पालघर ) फोन/वाट्स एप्प 09221232130

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