सेवा में,
माननीय सचिव,
संसदीय राजभाषा समिति,
३, सफदरजंग लेन, नई दिल्ली - ११००११।
विषय: डाक विभाग द्वारा विगत ९ वर्षों (२०१७ से निरंतर) से राजभाषा अधिनियम, १९६३ की धारा ३(३), राजभाषा नियमावली, १९७६ के नियम ५ व ११ तथा महामहिम राष्ट्रपति जी के आदेशों के निरंतर उल्लंघन, लोक शिकायतों की घोर उपेक्षा एवं उत्तरदायित्व निर्धारण के संबंध में विस्तृत विधिक शिकायत-पत्र।
संदर्भ (विगत ९ वर्षों के अनवरत संघर्ष एवं शिकायतों का विवरण):
· केन्द्रीय लोक शिकायत निवारण (पीजी पोर्टल) मूल एवं नवीनतम शिकायतें: DPOST/E/2026/0002204 (१५/०१/२०२६), DPOST/E/2025/0039407 एवं अपील संख्या DPOST/E/A/25/0004609 (अक्टूबर २०२५)।
· वर्ष २०२० एवं २०२१ की निरंतर लंबित शिकायतें: DPOST/E/2020/12019, DPOST/E/2020/12397, DPOST/E/2020/19663, DPOST/E/2020/46888, DPOST/E/2020/46890, DPOST/E/2020/47853, DPOST/E/2020/47854, DPOST/E/2020/47855, DPOST/E/2020/48593, DPOST/E/2021/00032, DPOST/E/2021/02740, DPOST/E/2021/05906, DPOST/E/2021/07339।
· राजभाषा विभाग द्वारा अग्रेषित पूर्व शिकायत: JSOLD/E/2021/00148।
· मंत्रालय एवं निदेशालय स्तर पर संचार: पूर्व संचार मंत्री कार्यालय से अग्रेषित शिकायत संदर्भ (०१/०१/२०२१) एवं उप-महानिदेशक (PG, QA & Inspections) डाक भवन का भ्रामक आश्वासन पत्र (०२/०१/२०२१)।
लगातार प्रेषित अनुस्मारक: वर्ष २०१७ से वर्तमान समय तक शिकायतकर्ता द्वारा प्रेषित २५ से अधिक औपचारिक अनुस्मारक पत्र।
माननीय महोदय / महोदया,
मैं अत्यंत क्षोभ, हताशा एवं गहरी चिंता के साथ देश की सर्वोच्च भाषाई नियामक संस्था 'संसदीय राजभाषा समिति' का ध्यान भारत सरकार के डाक विभाग (संचार मंत्रालय) में व्याप्त घोर प्रशासनिक उदासीनता, राजभाषा विरोधी नीतियों और संवैधानिक अधिदेशों के खुले मखौल की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। शिकायकर्ता अभिषेक कुमार द्वारा वर्ष २०१७ से लगातार, यानी पिछले ९ वर्षों से, डाक विभाग के विरुद्ध विधिक और नियमानुसार शिकायतें दर्ज की जा रही हैं। अत्यंत खेद का विषय है कि जो सुधारात्मक तकनीकी कार्य मात्र १ से २ महीने के भीतर संपन्न किए जा सकते थे, उन्हें डाक विभाग के हठधर्मी अधिकारियों ने ९ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी पूरा नहीं किया है।
डाक विभाग द्वारा जनसाधारण के भाषाई अधिकारों का हनन इस स्तर पर किया जा रहा है कि आम नागरिकों की विधिक शिकायतों का समाधान करने के स्थान पर उसे केवल अंग्रेजी में उत्तर Suggestion noted जैसी वाक्य-शैलियों का प्रयोग कर लोक शिकायत पोर्टल पर बंद कर दिया जाता है। यह रवैया न केवल नागरिकों के भाषाई अधिकारों को कुचलने का प्रयास है, बल्कि संसदीय समिति और महामहिम राष्ट्रपति जी के आदेशों की सीधी अवहेलना है। डाक विभाग के उच्चाधिकारी हिन्दी से घृणा में आकंठ डूबे हुए हैं और ऐसा लगता है कि राजभाषा अधिकारियों व अनुवादकों को भी राजभाषा का काम नहीं करने दे रहे हैं।
संवैधानिक संकट एवं संसदीय समिति की प्रासंगिकता पर प्रश्न: जब प्रशासनिक अधिकारी ९ वर्षों तक एक नागरिक के विधिक अधिकारों और राजभाषा की विधिक अनिवार्यताओं को 'सुझाव' कहकर खारिज करते रहें, तो यह संपूर्ण राजभाषा तंत्र की विफलता को दर्शाता है। अतः संसदीय राजभाषा समिति के समक्ष इस पत्र के माध्यम से निम्नलिखित अत्यंत गंभीर और तीखे प्रश्न विचारार्थ एवं उत्तरदायित्व निर्धारण हेतु प्रस्तुत हैं:
· गत १० वर्षों की अवधि में संसदीय राजभाषा समिति की किस उपसमिति ने डाक विभाग (डाक भवन, नई दिल्ली अथवा परिमंडल कार्यालयों) का आधिकारिक निरीक्षण किया था?
· यदि गत १० वर्षों में समिति द्वारा डाक विभाग का कोई निरीक्षण नहीं किया गया, तो देश के सबसे बड़े जन-संपर्क वाले विभाग को इस प्रकार भाषाई निरंकुशता के लिए खुला छोड़ने के क्या कारण थे और इस उदासीनता के लिए कौन जिम्मेदार है?
· यदि समिति द्वारा उक्त अवधि में निरीक्षण किया गया था और कड़े निर्देश भी जारी किए गए थे, तो इसके बावजूद डाक विभाग में पिछले ९ वर्षों से राजभाषा के ये गंभीर और संगठित उल्लंघन क्यों नहीं रुक रहे हैं? क्या विभाग के अधिकारियों में संसदीय समिति के विधिक क्षेत्राधिकार का कोई भय नहीं है?
· जब देश की जनता लोक शिकायत पोर्टल (पीजी पोर्टल) और ईमेल के माध्यम से लगातार इन उल्लंघनों के विरुद्ध शिकायतें कर रही है, तो इन जन-शिकायतों की विस्तृत चर्चा समिति की निरीक्षण बैठकों में संबंधित अधिकारियों के साथ क्यों नहीं की जाती? जनता की आवाज को इन उच्च-स्तरीय बैठकों में स्थान क्यों नहीं दिया जा रहा है?
डाक विभाग द्वारा किए जा रहे प्रमुख विधिक एवं संवैधानिक उल्लंघनों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
१. महामहिम राष्ट्रपति जी के आदेश (दिनांक २ जुलाई २००८) का खुला उल्लंघन: भारत सरकार के स्पष्ट और बाध्यकारी नियमों के अनुसार, सभी सरकारी मंत्रालयों, विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों की आधिकारिक वेबसाइटें अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिन्दी और अंग्रेजी) होनी चाहिए। इसके विपरीत, डाक विभाग का अत्यंत महत्वपूर्ण ई-बैंकिंग पोर्टल (ebanking.indiapost.gov.in) पूर्णतः और केवल अंग्रेजी भाषा में संचालित किया जा रहा है। ग्रामीण भारत के करोड़ों नागरिक, जो बैंकिंग सेवाओं के लिए डाकघरों पर निर्भर हैं, इस भाषाई भेदभाव के कारण डिजिटल बैंकिंग के लाभ से वंचित हैं। विभाग के तत्कालीन अधिकारियों (जैसे श्री पवन कुमार सिंह, तत्कालीन DDG FS) ने इस पर लिखित उत्तर दिया कि "वर्तमान में ई-बैंकिंग का कोई हिन्दी संस्करण नहीं है", जो सीधे तौर पर राष्ट्रपति जी के आदेश की अवहेलना की स्वीकारोक्ति है।
डाक विभाग की सभी वेबसाइटों पर पहले हिन्दी संस्करण होते थे, जैसे भी थे वे हिन्दी में थे, अब सभी वेबसाइटों के हिन्दी संस्करण समाप्त कर दिये गये हैं और भाषिणी टूल जोड़ दिया गया है जिसने हिन्दी की चिंदी-चिंदी कर दी है, जो ढाई आखर को धाई अखाड़ा लिख रहा है, स्वागत है को में स्वागत लिख रहा है। भाषिणी का अनुवाद रद्दी में फेंकने लायक है पर उस पर करोड़ों रुपये बर्बाद कर दिये गये हैं जबकि गूगल जेमिनी, चैटजीपीटी का अनुवाद 99 प्रतिशत तक सही होता है जिसे जाँच करके थोड़ा सा सुधार करके उपयोग किया जा सकता है।
२. राजभाषा अधिनियम, १९६३ की धारा ३(३) का घोर उल्लंघन: अधिनियम की धारा ३(३) के अंतर्गत यह वैधानिक अनिवार्यता है कि सभी अधिसूचनाएँ, सामान्य आदेश, प्रेस विज्ञप्तियाँ और प्रशासनिक निर्देश अनिवार्य रूप से द्विभाषी होने चाहिए। परंतु डाक विभाग द्वारा आयोजित की जाने वाली 'ग्रामीण डाक सेवक' (GDS) की संपूर्ण ऑनलाइन भर्ती प्रक्रिया (indiapostgdsonline.gov.in एवं indiapostappost.in) का पूरा पोर्टल, पंजीकरण निर्देश, शुल्क भुगतान के नियम और यहाँ तक कि चयनित अभ्यर्थियों की अंतिम सूचियाँ भी केवल अंग्रेजी में जारी की जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं से संबंधित इस पद की चयन प्रक्रिया में अंग्रेजी थोपकर हिन्दी भाषी और क्षेत्रीय भाषा के अभ्यर्थियों के साथ जानबूझकर भाषाई आधार पर क्रूर भेदभाव किया जा रहा है। डाक विभाग के मुख्यालय द्वारा अधिनियम की धारा ३(३) का 100 प्रतिशत उल्लंघन वर्षों से जारी है आप स्वयं डाक विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध पीडीएफ फाइलों व पीडीएफ फार्मों की जाँच कर सकते हैं।
३. राजभाषा नियमावली, १९७६ के नियम ५ का संगठित उल्लंघन: नियम ५ स्पष्ट रूप से निर्देशित करता है कि हिन्दी में प्राप्त पत्रों, आवेदनों अथवा शिकायतों का उत्तर अनिवार्य रूप से हिन्दी में ही दिया जाएगा। लोक शिकायत पोर्टल पर शिकायकर्ता द्वारा विगत ९ वर्षों में जितनी भी शिकायतें हिन्दी में दर्ज की गईं, डाक विभाग के अधिकारियों ने उनका विधिक उत्तर हिन्दी में देने के बजाय, सदैव अंग्रेजी में २-४ पंक्तियाँ लिखकर शिकायतों को बलपूर्वक बंद कर दिया। यह राजभाषा नीति का प्रशासनिक स्तर पर किया जाने वाला घोर अपमान है।
४. डाकघरों का पूर्ण अंग्रेजीकरण एवं नियम ११ का उल्लंघन: पिछले १० वर्षों में डाक विभाग की कार्यप्रणाली में एक सुनियोजित अंग्रेजीकरण देखा गया है। ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों के डाकघरों में भी सभी सूचना पट्ट, नामपट्ट, आवेदन पत्र, फॉर्म, मैनुअल, नियम-पुस्तिकाएँ, सेवाओं की मार्गदर्शिकाएँ केवल अंग्रेजी में तैयार की जा रही हैं। हिन्दी व स्थानीय भाषाओं के प्रयोग को पूरी तरह हतोत्साहित कर आम जनता पर अंग्रेजी थोपी जा रही है, जो राजभाषा नियमावली के नियम ११ के प्रावधानों का पूर्णतः उल्लंघन है। इसके अतिरिक्त विभाग की मुख्य वेबसाइट पर अनुवाद की अकल्पनीय अशुद्धियाँ हैं (जैसे Service Requests का अनुवाद 'सेवा मांग' करना) और राजभाषा अनुभाग में वर्ष २०२०-२१ के बाद से कोई नया परिपत्र तक अपलोड नहीं किया गया है। डाकघरों में अब नाम पट्ट, सूचनापट्ट केवल अंग्रेजी में ही लगाने के निर्देश हैं। व्यवसाय डाक अनुभाग का पूरा काम अंग्रेजी में किया जाता है और वहाँ स्टेशनरी पूरी तरह अंग्रेजी में छपवाई जाती है, रबर की मुहरें भी द्विभाषी -त्रिभाषी बनाना लगभग बंद कर दिया गया है।
५. प्रशासनिक संवेदनहीनता एवं भ्रामक आश्वासन: दिनांक १ जनवरी २०२१ को तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री कार्यालय से अग्रेषित शिकायत पर डाक विभाग के उप-महानिदेशक (पीजी, क्यूए एवं आई) कार्यालय ने २ जनवरी २०२१ को ईमेल द्वारा यह आश्वासन दिया था कि "हम आपसे जल्द ही संपर्क करेंगे"। इस आश्वासन को दिए हुए भी आज ५ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है, परंतु धरातल पर परिणाम शून्य है। अधिकारियों की यह हठधर्मिता सिद्ध करती है कि वे लोक शिकायत निवारण तंत्र को अत्यंत हल्के में लेते हैं।
अभ्यावेदी की विधिक मांगें:
संसदीय राजभाषा समिति देश की संसद के प्रति उत्तरदायी है और राजभाषा नीतियों के संरक्षण की सर्वोच्च प्रहरी है। अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि इस विषय की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित त्वरित और दंडात्मक प्रशासनिक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए:
· विशेष जाँच समिति का गठन: डाक विभाग द्वारा पिछले ९ वर्षों से लंबित सभी संदर्भित शिकायतों (DPOST/E/2026/0002204 आदि) का सामूहिक संज्ञान लेते हुए विभाग के विरुद्ध एक उच्च-स्तरीय भाषाई ऑडिट का आदेश जारी किया जाए।
· पोर्टलों को द्विभाषी बनाने की समयसीमा: डाक विभाग के ई-बैंकिंग पोर्टल, Post Info आधिकारिक मोबाइल ऐप और ग्रामीण डाक सेवक (जीडीएस) भर्ती पोर्टल को आगामी ३० दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से पूर्णतः द्विभाषी (हिन्दी और अंग्रेजी) करने हेतु आदेश जारी किया जाए।
· उत्तरदायित्व निर्धारण एवं प्रशासनिक कार्यवाही: राजभाषा नियम ५ और ११ का निरंतर उल्लंघन करने वाले, तथा लोक शिकायतों को बिना समाधान "Suggestion Noted" कहकर बंद करने वाले उत्तरदायी अधिकारियों (जिसमें संबंधित उप-महानिदेशक, वित्तीय सेवाएँ एवं सहायक महानिदेशक शामिल हैं) की जवाबदेही तय कर उनके विरुद्ध सेवा नियमों के अंतर्गत अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए।
· निरीक्षण बैठकों में जन-शिकायतों को शामिल करना: संसदीय समिति भविष्य में जब भी किसी विभाग का निरीक्षण करे, तो राजभाषा विभाग, संसदीय राजभाषा समिति के समक्ष लंबित व लोक शिकायत पोर्टल पर उस विभाग के विरुद्ध दर्ज राजभाषा उल्लंघन संबंधी सभी जन-शिकायतों के विवरण को निरीक्षण एजेंडे में अनिवार्य रूप से शामिल करे।
यदि भारत सरकार का एक महत्वपूर्ण विभाग ९ वर्षों में एक वेबसाइट और भर्ती पोर्टल को राजभाषा हिन्दी में परिवर्तित करने में अक्षम है, तो यह संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र की विफलता का प्रतीक है। यदि इस गंभीर भाषाई अराजकता पर संसदीय समिति द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है, तो देश का आम नागरिक किससे न्याय ही आशा रखे, क्या संसदीय राजभाषा समिति कोई ठोस कदम उठाएगी ताकि सालोंसाल से जारी उल्लंघन रोके जा सकें?
जनता की शिकायतों का समाधान नहीं किया जा रहा है, खुलेआम राजभाषा अधिनियम 1963 के प्रावधानों का उल्लंघन किया जा रहा है, झूठी त्रैमासिक प्रगति रिपोर्टें दाखिल की जा रही हैं, जिनमें दर्ज आँकड़ों की सत्यता जाँचने की कोई व्यवस्था नहीं है और संसदीय राजभाषा समिति मौन है।
सधन्यवाद।
भवदीय,
अभिषेक कुमार
शिकायतकर्ता एवं राजभाषा नीति जागरुक नागरिक
ग्राम: सुल्तानगंज, तहसील: बेगमगंज,
जिला: रायसेन, मध्य प्रदेश - ४६४५७०।


