Homeपत्रिकाकला-संस्कृतिदो हजार वर्ष पुरानी विरासत का मंच पर जीवंत होना

दो हजार वर्ष पुरानी विरासत का मंच पर जीवंत होना

नृत्य एकमात्र ऐसी कला है जिसमें कलाकार (नर्तक) और कला (नृत्य) एकाकार हो जाते हैं। यह अनूठा संगम किसी और कला के साथ नहीं जुड़ता है। मुंबई के दहिसर स्थित लता मंगेशकर नाट्यगृह में जब नृत्य कला केंद्र की निपुण किशोरवयी नृत्यांगनाओं ने अपनी प्रस्तुति दी तो ऐसा लगा मानों दो हजार साल पुरानी भरत नाट्यम की विरासत मंच पर सज-धज कर एक नए अवतार में आ गई है।

भरतनाट्यम भारत की सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति तमिलनाडु के तंजौर क्षेत्र में हुई। यह नृत्य कला लगभग 2000 वर्ष पुरानी है और इसे भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की जननी माना जाता है। इसका नाम भरत मुनि के नाट्यशास्त्र (400 ईपू से 100 ई के बीच) से प्रेरित है, जिसमें नृत्य, नाटक और संगीत के सिद्धांतों का वर्णन है।

19वीं सदी में सामाजिक और औपनिवेशिक प्रभावों के कारण इस कला को हाशिए पर धकेल दिया गया। 20वीं सदी में ई. कृष्ण अय्यर और रुक्मिणी देवी अरुंडेल, टी बालासरस्वती, यामिनी कृष्णमूर्ति, और मल्लिका साराभाई जैसे कलाकारों ने इस कला को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया। यह अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी प्रस्तुत किया जाता है, और शुद्ध शास्त्रीयता के साथ-साथ आधुनिक विषयों को भी समाहित कर रहा है। दुनिया भर के देशों में यह नृत्य भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है।

नाट्यशास्त्र के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने नाट्य वेद की रचना की, जिसे भरत मुनि ने मानवजाति तक पहुँचाया। भगवान शिव के तांडव और देवी पार्वती के लास्य नृत्य ने इसे समृद्ध किया, जिसमें 108 करण (मुद्राएँ) शामिल हैं, जो तमिलनाडु के मंदिरों की दीवारों पर अंकित हैं।

भरतनाट्यम का तात्पर्य है – भाव, राग और ताल का संतुलित नृत्य रूप।

भ – भाव (भावना या अभिव्यक्ति), र – राग (संगीत), त – ताल (लय) और नाट्यम- नृत्य।

यह कर्नाटक संगीत, जटिल ताल, और भावपूर्ण अभिनय का संगम है। इसमें नृत्त (शुद्ध नृत्य), नृत्य (अभिव्यक्ति के साथ नृत्य), और नाट्य (नाटकीय अभिनय) शामिल हैं। इसमें मृदंगम, बांसुरी, वीणा, वायलिन, और तालम जैसे वाद्ययंत्र के माध्यम से संगीत की सृष्टि की जाती है।

भरतनाट्यम में समभंग, अभंग, और त्रिभंग जैसी शारीरिक मुद्राएँ, जटिल फुटवर्क, और हस्तमुद्रओं के साथ प्रस्तुति दी जाती है। इसी भरतनाट्यम को मृदुला, रितिका, सिओना और अर्पिता ने पूरी शास्त्रीय गरिमा के साथ मंच पर जीवंत किया।

मंच पर नृत्यांगनाओं ने अपनी पहली प्रस्तुति से ही श्रोताओं के साथ जो तालमेल बिठाया वो अंतिम प्रस्तुति तक लगातार निखरता रहा और उनके इस जादू को दर्शक मंत्रमुग्ध से अपलक देखते रहे। नृत्य में किसी भी कलाकार की मुद्राएं ही उसका कला कौशल होती है। जो बात बोलकर नहीं कही जा सकती उसे मुद्राओं, पदसंचलन, नयन संचालन (आँखों की गति और दिशा), दृष्टि अभिनय (आँखों के माध्यम से पात्र के भाव या विचारों को व्यक्त करना) से लेकर हस्त मुद्राएँ इतनी परिपक्व थी और चारों कलाकारों की प्रस्तुति में इतना सामंजस्य था कि दर्शकों को एक क्षण के लिए भी सोचने का समय नहीं मिला, वे पूरे समय प्रस्तुति के विविध रंगों में बहते रहे।

कार्यक्रम की पहली प्रस्तुति थी पुष्पांजलि- पुष्पांजलि का अर्थ है ईश्वर को पुष्प अर्पण करना। इस प्रस्तुति में नृत्य देवता नटराज संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रखवाली करने वाले अष्टदिग्पाल मार्ग दर्शक गुरु वादक कलाकार और प्रेक्षक सभी को वंदन करते हुए नर्तकी पुष्पांजलि अर्पण  कर आशीर्वाद की कामना करती है।


भरतनाट्यम में कौत्वम यानी  ईश्वर की स्तुति जितने ईश्वर उतने प्रकार के स्तुति गान, जैसा भक्तिभाव वैसा स्तुति गान। पार्वती पुत्र विघ्न विनाशक श्री गणेश के स्तुति गान की प्रस्तुति से मंच को जादुई स्पर्श मिला वह दर्शकों तक अंतिम प्रस्तुति तक रोमांचित करता रहा।


शंकराचार्य द्वारा रचित शिव पंचाक्षर स्तोत्रम्  प्रस्तुति ने पूरे सभागृह को शिवमय कर दिया।  ये शिवस्तुति दर्शकों के लिए एक विलक्षण अनुभव था।


हरि तुम हरो जन की पीर इस पद में मीराबाई भगवान श्री कृष्ण के भक्त प्रेम का वर्णन के साथ विविध प्रसंगों के माध्यम से मंच पर एक के बाद कई आख्यानों का नाटकीय रूप देखने को मिला।  द्रौपदी के चीर हरण, भक्त प्रह्लाद और नरसिंह अवतार, इंद्र के वाहन ऐरावत हाथी को मगरमच्छ के चंगुल से बचाने के प्रसंग इतने जीवंत थे कि मात्र कुछ क्षणों की इन प्रस्तुतियों में सभी प्रसंग दर्शकों के मानसपटल पर छा गए।

राम भक्त शबरी रामजी की वन यात्रा के समय किस बेसब्री से उनकी प्रतीक्षा करती है और उन्हें अपने जूठे बैर खिलाकर अपनी भक्ति का परिचय देती है, यह पूरा दृश्य नृत्य संयोजन के साथ अद्भुत व प्रभावी बन गया।

तिल्लानाभरतनाट्यम में तिल्लाना यह तालपूर्ण रचना और सुंदर मुद्रा का मनभावन संकल्प है अल्लारिपु अगर काली से फूल होने की प्रस्तुति है तो तिलाना उन्हीं फूलों का अपने पूरे सौंदर्य के साथ खिलने जैसा है।

चारों  नवोदित नृत्यांगनाओं ने अपने सामर्थ्य, कौशल और शास्त्रीय परिपक्वता को बहुत ही कल्पनाशीलता के साथ मंच पर साकार किय। मुद्राएँ और भावाभिव्यक्ति ताल और लय के साथ ही गायन और वादन की विशुध्द शास्त्रीयता ने प्रस्तुति को एक नई ऊँचाई दी।

नृत्यांगनाओं की वेशभूषा, केशविन्यास और श्रृंगार मंच और प्रस्तुति की प्रांसगिकता को रसमय बनाने में सहयोगी रहे। पारंपरिक साड़ी और मंदिर-शैली के आभूषणों ने उनकी प्रस्तुति को प्रामाणिकता प्रदान की, जबकि मंच की सौम्य प्रकाश व्यवस्था ने माहौल को और जीवंत बनाया।


इस प्रस्तुति को ऊर्जा और रोमांच प्रदान किया संगीत की शास्त्रीय प्रस्तुति ने। मृदंगम पर श्री वेंकटेश के हाथ ऐसे थिरकते थे मानों वे दो की बजाय कई हाथों से मृदंगम् से खेल रहे हों। श्री षणमुख सुदर्शन के शुध्द शास्त्रीय गायन, बाँसुरी पर श्री कार्तिक भट्ट, घटम पर श्री शबरीश ने नृत्यांगनाओं की प्रस्तुति में विद्युतीय ऊर्जा भर दी। श्री मेहुल त्रिवेदी के कल्पनातीत मेकअप ने सभी नृत्यांगनाओँ के कौशल और सौंदर्य को निखार दिया।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित श्रीमती आरती देसाई ने सभी कलाकारों को आशीर्वाद दिया।

कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए श्रीमती निकिता मेहता ने प्रस्तुतियों का परिचय देते हुए दर्शकों व नृत्यांगनाओं के बीच एक संवाद बनाते हुए हर प्रस्तुति के प्रति एक रोमांच पैदा किया।

ये सभी नृत्यांगनाएँ  एक ऐसे संस्थान से निकली है जिसे मुंबई के नृत्य कला केंद्र की संस्थापक गुरु श्रीमती राना दलाल ने वर्ष 1973 में मात्र 2 विद्यार्थियों के साथ सुन्दर नगर में प्रारंभ किया था  वह पिछले 50 वर्षों से छात्रों को भरतनाट्यम सिखा रही हैं। उन्हें स्वर्गीय गुरु श्री अर्जुन देसाई और स्वर्गीय गुरु श्री सेतु माधवनजी से इस महान कला को सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। अज उनकी नृत्य कक्षाएं डॉ राधा कृष्ण विद्यालय – मलाड में संचालित की जा रही हैं।

सुश्री कोमल शाह महा गुरु श्रीमती रन्ना दलाल की शिष्या हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में भरतनाट्यम में अपना मास्टर डिप्लोमा और अरंगेत्रम पूरा किया है। वह नृत्य कला केंद्र से जुड़ी हुई हैं और 2017 से भरतनाट्यम कक्षाएं संचालित कर रही हैं।

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