पुण्यापगाओं का एक तीर्थ बना दो ना। साहित्याकाश में हलचल मचा दो ना ।।
– किसी ने प्रेरणा फूंकी।
परिणाम सामने आया। साहित्यिक चेतनाओं की घंटियां बजने लगीं। संवेदनाओं से उपजा नया संसार आकार लेने लगा। इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम का महत्व इतना था कि पुस्तक प्रकाशन से पूर्व ही समीक्षक लेखनियां बेताब हो चलीं। प्रकाशन हो जाने पर तो कितने ही ज्वार उमड़ पड़े।
कानों कान जिन्हें खबर मिली उनकी उत्कंठा के प्रश्न थे किसकी कृति? कैसी कृति ? किस नाम से? इतनी महिला साहित्यकार, वो भी राजस्थान की? हाड़ौती अंचल की !! जी हां, यही थी वह कृति, हार्ड कवर आवरण में निबद्ध 447 पृष्ठों की साहित्यिक कृति, ष्नारी चेतना की साहित्यिक उड़ानष्। सचमुच नारी की सजग चेतना का परिचयात्मक दस्तावेज है यह! सार्थक शीर्षक से अलंकृत इसका मुखपृष्ठ इस कृति का स्वच्छ दर्पण है। इसके आकर्षक रंगों का मेल मानो पुस्तक के कलेवर में समाए सृजन के जीवनोपयोगी वैविध्य पूर्ण रंगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
नारी परिवार और समाज की धुरी है इसकी जलती चमकती चेतना को दुर्भाग्यवश वक्त ने बलात् भस्मावृत अग्नि सम मद्धिम कर दिया था। स्वतंत्र भारत ने जब होश संभाल कर कदम आगे बढ़ाना शुरू किया और शैक्षिक विकास होने लगा तो नारी जागृति की ओर भी भारतीय मनीषा सक्रिय हो गई। नारी के प्रति निकृष्ट मानसिकता की परतें हटाने की शुरुआत हो गई। ऐसा ही एक प्रयत्न लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री जितेन्द्र निर्मोही जी की प्रेरणा से व डा. प्रभात सिंघल जी के श्रम से ष्नारी चेतना की साहित्यिक उड़ानष् के रूप में सामने आया।
सच मानिए तो तमिस्रा में भटके, फिसलते, डगमगानते, राह तलाश ते और राह बनाते कदमों को दिशा देता सृजन है यह।
इस पुस्तक में समाहित 81 महिला रचनाकारों का कवि-धर्म नारी की मानसिक सशक्तता और रचनात्मक क्षमता का मुंह बोलता साक्षी है।
पुस्तक के पृष्ठ पलटते जाने पर पाठक का साक्षात्कार विभिन्न विषयों में निष्णात विविध क्षेत्रों के अनुभवों से समृद्ध गहन संवेदनाओं से प्रेरित और संवेदनाओं को जगा देने वाले अभिव्यक्ति कुशल सिरजनहारों से होता है।
सभी रचनाकार महिलाएं राजस्थान के हाड़ौती अंचल की माटी से जुड़ी हुई हैं। या तो यहीं जन्म लेकर ज्ञानार्जन किया और यहीं रहीं अथवा देशभर के अन्य क्षेत्रों में जन्म लेकर, पल-बढ़कर हाड़ौती क्षेत्र के साथ घुल-मिल गई हैं। अतः इनकी रचनाएं इस अंचल विशेष के अध्ययन में विशेष महत्व रखती हैं। कई रचनाकारों के व्यक्तित्व में विविध क्षेत्रीय विशिष्टताओं और अनुभवों का समन्वय हुआ है। इससे पुस्तक को विशेष गरिमा प्राप्त हुई है जैसे देशभर की वनस्पति से सुशोभित उद्यान बड़े महत्व का होता है। इस समग्र पुस्तक को पढ़कर मन करता है सभी रचनाकारों का पूरा पूरा साहित्य पढ़ा जाए।
पुस्तक का पाठक पढ़कर महसूसता है कि नारी का हौसला अदम्य उत्साह से भरपूर है और उसका अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करने का पुरजोर प्रयास अत्यन्त श्लाघनीय है। वह टूटकर भी अपनी ऊर्जा को समेटकर पूरी शक्ति से दम लगाना जानती है।
डॉ. प्रभात सिंघल जी द्वारा इस पुस्तक में एकत्रित व्यक्तित्व प्रेरणा की अद्भुत जोत जलाए आभासित होते हैं। क्यों न हों? इनमें अपने विषय की विशेषज्ञता है। अनुभूति प्रवणता है सूक्ष्म दृष्टि है,अभिव्यक्ति का अद्भुत कौशल है। सजग संवेदनशीलता है। पुस्तक में आबद्ध आलेख दर्शाते हैं कि ये कृत संकल्प हैं, जीवन के पल-पल को सार्थक बनाने के लिए ! यह सार्थकता स्वकेंद्रित नहीं। लगभग सभी लेखिकाएं अनेक विषयों में पारंगत हैं। किसी न किसी व्यवसाय से जुड़कर भी समाजसेवी हैं। जो जहां जैसा है वैसा ही रहने देना, इन्हें कदापि स्वीकार नहीं। अतः देश और समाज की बुराइयों को उखाड़ फेंकने का बीड़ा उठाए, सृजन की राह चल रही हैंय अपने अन्यान्य दायित्वों के साथ! कृतित्व तो दूर जीवन का परिचय पढ़ने भर से भी पाठक में प्रेरणा का संचार संभव है। फिर साहित्य पढ़ने का तो कहना ही क्या? अधिकांश साहित्यकारा शिक्षण से जुड़ी हैं। मनोविज्ञान की विशेषज्ञ भी हैं। इनरचनाधर्मियों की मनोवैज्ञानिक सोच, बालोपयोगी एवं वर्तमान समाज की आवश्यकतानुरूप साहित्य सृजन ने इस दस्तावेज को महनीयता प्रदान की है। पुस्तक में संकलित साहित्यकारों के आलेखों में दर्शाए व्यक्तित्व और कृतित्व से यह स्पष्ट लक्षित होता है कि इन रचनाकारों को स्वस्थ नैतिक एवं साहित्यिक परिवेश ने परिपक्वता प्रदान की है।
क्या ही अच्छा हो पाठक इस पुस्तक से अपने पसंदीदा साहित्यकारों को चुनकर उनके समूचे साहित्य का ही रसास्वादन कर लाभान्वित हों। आज मानव समाज को आवश्यकता है ऐसे साहित्य की जो जीवनमूल्यों में विशेष कर विशुद्ध प्रेम व अध्यात्म में आस्था जगाए, भारतीय संस्कृति की ओर प्रेरित करे, नई पीढ़ी को जीवन संघर्ष में हिम्मत दे, समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव जागृत करे। नारी उत्पीड़न जैसी समस्याओं और कुप्रथाओं के प्रति सजग करे और समस्या समाधान के योग्य बनाए।
नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान ऐसे ही साहित्य का प्रेरक दस्तावेज है जो श्रेष्ठ साहित्यिक विशिष्टताओं से समृद्ध है और विषय चयन की दृष्टि से अत्यंत वैविध्य पूर्ण है। किसी भी महत्वपूर्ण विषय से अछूता नहीं है। नारी चेतना और बहुमुखी वैदुष्य से उपजा यह साहित्य विषय एवं लेखन उद्देश्य के अनुरूप सहज, सरल, सरस, गंभीर, छंद अलंकार रीति, वैविध्य पूर्ण अभिव्यक्ति शैलियों से समृद्ध ही नहीं अधुनातन भाव बोध व शिल्प से भी अभिनंदनीय है।
अपने मन्तव्य की स्पष्टता के लिए यहां कुछ रचनाकारों की रचनाओं का उल्लेख, कथ्य को इंगित करते हुए करना चाहूंगी।
’चरित ऐ जमाने वालों गलतफहमी में मत रहना कि झुक जाऊंगा,
हताश होकर टूट जाऊंगा। मैं धूप में तपा हुआ हूं, ठंड की ठिठुर देखी है…
-निशा गुप्ता
’सहिष्णुता व राष्ट्रीय एकता की प्रेरणा-
निर्झरों को सहिष्णुता का संगीत सुनाएं
राष्ट्रीय एकता के नए सेतु बनाएं
’उद्बोधन विद्यार्थियों के प्रति
आत्मघात नहीं है कोई समाधान
स्वयं को नई दिशा कर प्रदान।- -डॉ. युगल सिंह
प्रेरक कर्तव्य बोध एवं उपकार भावना –
संतान को जन्म देना ही नहीं पर्याप्त, उसे नेक इंसान भी बनाओ तुम।
चलो किसी भूखे पेट के इन्तजार को मिटाया जाए – प्रार्थना भारती
हाइकु रचना कौशल के साथ त्याग की सीख –
ये रक्तदान
संवारता जीवन
अमूल्य दान- मोहिनी गुप्ता
मोहिनी गुप्ता जी सायली व पिरामिड विधा में भी प्रवीण हैं।
’उदात्त भावना
सत्य राहों के पथ से अहंकार के कांटे चुनती मैं
जो मिला धरा से उस पुण्य संस्कृति से, नित विश्व समर्पित करती मैं – डॉ. नेहा प्रधान
’कृतज्ञता
’नमन कर उन पूर्वजों को,
जो देकर सब कुछ चले गए। -राधा तिवारी
अभिव्यक्ति कौशल
क्या उपमा दूं उपमा को कोई शब्द नहीं आ रहा है
-राधा तिवारी
’सौजन्य
’एक दीपक द्वार पर वहां रख दो
फट गए मन दरक गया प्रीत का दर्पण -रेखा शर्मा
रेखा शर्मा जी के साहित्य से तांका काव्य विधा, हाइकु व ओम् आकृति कविताओं का भी आनंद लिया जा सकता है।
जीवट से भारी-भरकम पंक्तियां –
ज्यौं ज्यों सांसें सरकती हैं
त्यों त्यों सांसें लेने का मन करता है- शिखा अग्रवाल
कथात्मक शैली में काव्य रचना भी शिखा अग्रवाल जी के साहित्य की विशिष्टता है।
’सुषमा अग्रवाल की प्रेरक पंक्तियां
न मजबूर जिंदगी जिओ न किसी को मजबूर बनाओ
इंसान की हिम्मत के आगे नतमस्तक हर ऊंचाई है
’’कर्मफल
’पंख पहन कर दुष्कर्मों के काटे क्यों किस्मत के धागे? सत्कर्मों के कुछ फूल चुनो’यथार्थबोध आ रहा है शोर धर्म की दुकानों से हम भ्रम के दलदल में फिसले हुए लोग हैं। वर्षा उपाध्याय ’सहिष्णुता, दृढ़ता व कर्मठता के भाव जगाने का प्रयास पी सको अगर समुद्र तुम, अन्त हीन प्यास चाहिए। जमीं कायनात जोड़कर, एक नए क्षितिज तक चलें। -डॉ. वीणा अग्रवाल
’नारी की पीड़ा
कोंख में ही छिनता बेटी से जीवन का मौलिक अधिकार…… लोभी सामाजिक पशुओं की मार -जेबा फिजा
टूटते रिश्तों के दौर में नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा –
मैं घड़ी तुम संग चलूंगी युग के उस अंतिम समय तक राह में मत छोड़ देना हाथ मेरा तुम प्रलय तक – कुसुम जोशी
’मन हरणकवित्त-वासुकी है कंठ साजे गोद गणेश बिराजे मृदंग पे नंदी झूमें।
डमरू बजाए हो। – दीप्ति राजौरा
’समृद्ध काव्य सौंदर्य-अंतरात्मा का आर्तनाद भरता मन में अति विशाद करुणा के सजल अश्रुपात, करते प्रकृति में जलप्रपात । कम बोलूं तो बोले घुन्नी ना बोलूं तो मुंह चढ़ी है बिन्नी। – वैदेही गौतम
इस प्रकार साहित्यकार डॉ .प्रभात कुमार सिंघल की इस कृति से अनेकानेक साहित्य सत्य उद्घाटित होते हैं जिन्हें चर्चा का विषय बना ते जी नहीं अघाता। अतः बहुत कुछ में से कुछ और- ’काव्य लेखन ही स्नेहलता जी की धड़कन है और वे स्वतंत्रता सेनानियों के किरदारों पर लिख रही हैं। राष्ट्रप्रेम के बीजवपन करने और उन्हें पनपाकर विकसित करने के लिए ऐसा साहित्य पढ़ना, पढ़ाना चाहिए।
’हाड़ौती की महिला साहित्यकारों के अवदान को समझने के लिए सज्जन पोसवाल जी का साहित्य पठनीय है। ’हाड़ौती अंचल की लोककथाओं का लाभ श्यामा शर्मा जी के साहित्य से लिया जा सकता है। ’कथ्य और शिल्प के सौंदर्य में डुबकियां लगानी हैं तो विशेषकर डॉ. वीणा अग्रवाल जी वैदेही गौतम व कृष्णा कुमारी जी का साहित्य अवश्य ही पढ़ना चाहिए।
’कथात्मक काव्यशैली में प्रभावी भावपूर्ण लेखन करने वाली डॉ. रौनक राशीद खान का परिचय इस पुस्तक की शान है। सामाजिक सरोकार के साथ जीवन के हर रंग में लिखने वाली डा. राशीद खान की रचनाओं में सहज सरल व प्रभावी अभिव्यक्ति हुई है। ये मुक्त भाव से लेखन कर सीधे दिल को छूती हैं। गजलें जीवन के हर पहलू को ध्यान में रखकर लिखी गई हैं। काव्य शिल्प अद्भुत है। शैली कथात्मक है। ’अपने लेखन से ईर्ष्या-द्वेष और स्वार्थ के स्थान पर प्रेम का साम्राज्य स्थापित करने को प्रयत्नशील हैं डॉ. कंचना सक्सेना।
’नारी संबंधी समस्याओं के प्रति सजगता, उनके अध्ययन और निराकरण के लिए डॉ. कंचना सक्सेना जी, डॉ. क्षमा चतुर्वेदी जी, रेखा पंचोली जी, रीता गुप्ता जी, गरिमा गौतम ’सर्वोच्च जीवन-मूल्य है प्रेम। इसके अभाव में ही सारे फसाद होते हैं। अभाव क्यों न हो, इसके सही अर्थ और रूप-स्वरूप तक कोई बिरला ही पहुंचा है। जिसने इसे पूरी तरह समझा और आत्मसात् किया वही महामानव बन कर लोक-मंगल कर पाया है। डॉ.कृष्णा कुमारी जी ने अपने काव्य में प्रेम को बखूबी समझाया है-गीत कोई गुनगुनाना इश्क है।
बेसहारों का, हारा जो बनें उनके आगे सर झुकाना इश्क है।
शर्म से नजरें झुकाना इश्क है।
आप इश्क को केंद्र बनाकर कई मानवीय संदेश देती हैं।
गरिमा गौतम भी अपने काव्य सृजन से इसे समझाने का पुरजोर प्रयास कर रही हैं।
कितना वजन रखती हैं ये पंक्तियां-ष्तुम लाघव चिन्ह- सा मुझे संक्षिप्त करते रहे, मैं उद्धरण चिह्न की तरह तुम्हें विशेष करती रही। ष्मैं जीवन के कौष्ठक में तुम्हें बंद करती रही।
आपने नारी की समस्याओं को भी उभारा है।
डॉ. अपर्णा पांडेय जनसाधारण के चारित्रिक व आध्यात्मिक विकास लिए डॉ. अपर्णा जी शास्त्रों को निचोड़ कर सहज स्वादु बनाकर परोसने का उद्योग कर रही हैं।
हिन्दी के उत्कृष्ट व लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार जयशंकर प्रसाद व महावीर प्रसाद की शास्त्रीय हिन्दी जिनके लेखन में झलकती है, जो मेघदूतं जैसे गीतिकाव्य का हिन्दी में सुंदर काव्यानुवाद कर चुकी हैं। सांख्य कारिका जैसे दर्शनशास्त्र का भी सफलता पूर्वक काव्यानुवाद कर चुकी हैं। ऐसी अद्भुत सक्षम साहित्यकारा का साहित्य सभी सामाजिकों के लिए महत्वाधायी है। आपकी कविताएं उदात्त प्रेम की पक्षधर हैं।
’ विशेष रूप से महिलाओं के संदर्भ में सृजन रत कथा लेखिका डॉ. क्षमा चतुर्वेदी की रचनाएं सरल, सहज और मुंह बोलती- सी हैं। आज जिस रूप में नारी- विमर्श की चर्चा होती है उस रूप में स्त्री को संवेदित करने में आप विश्वास नहीं करतीं। आप के अनुसार स्त्री-विमर्श मात्र सैक्स फ्रीडम नहीं। क्षमा चतुर्वेदी जी का साहित्य तो स्त्री की सकारात्मक अस्मिता का पक्षधर है। वे वैज्ञानिक बोध और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से युक्त उस स्त्री के पक्ष में खड़ी हैं जो अपनी अस्मिता और विवेक के आधार पर अपनी राह चुन सकती हो। आप 500 बाल कहानियां भी लिख चुकी हैं।
’स्वयं का नेत्रदान करने वाली, डॉ. सुशीला जोशी 37 बार रक्तदान कर चुकी हैं। निर्धन महिलाओं व बच्चों को मुफ्त पढ़ाती हैं। ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व की कलम से बेशकीमती संदेश झरते हैं –
सोच को किशमिश जैसी नरम और मीठी बनाओ और बारिश बनकर ठंडक पहुंचाओ। जीवन एक बाजी है, आशा उसकी चाबी है।
’योगमाया शर्मा जी ने छूटते बचपन, तिरोहित होते प्रेम, संस्कार हीन हो आधुनिकता का जामा पहनना, कमाने की दौड़ में धूमिल होती मानवता को कुशलतापूर्वक अभिव्यक्ति देकर सराहनीय सुधारात्मक कदम उठाया है।
’ यथार्थवादी कहानियां लिखती हैं रिंकी रविकांत एक और नारी के प्रति अन्याय का सशक्त प्रतीकार तो दूसरी और पुरुष के प्रति इन्साफ का सजग दृष्टि कोण आपके साहित्य और व्यक्तित्व की उल्लेखनीय विशेषता है।
वो जो तुम्हें चौराहे पर छोड़ गया था,
वो रोए, सिसके जले। हारे हुए जुआरी की तरह
हाथ मले ।
पुरुष के चरित्र पर लांछन लगाने और स्त्रियों का गुणगान करने वालों का नजरिया बदलने का प्रयास भी आप करती हैं।
’ ऋचा भार्गव अपने साहित्य से पुरानी पीढ़ी के द्वारा नई पीढ़ी को ईश्वर के प्रति आस्थावान् बनाने का प्रयास कर रही हैं। आप भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय निर्माण उपन्यास लिख चुकी हैं। ’साहित्यकार समाज के चमकते सितारों में से एक हैं डॉ. मनोरमा सक्सेना। आपकी कहानियां जीवन को सरल सरस और मनोरम ढंग से जीने की सीख देती हैं। इनमें समझदार नारी पात्रों की सृष्टि, गहरी मनोवैज्ञानिक अन्तर्दृष्टि व निज संस्कृति से जुड़ाव दृष्टिगत होता है। आपके उपन्यास में जीवन संघर्ष के साथ स्वामी विवेकानंद के चिन्तन का नवनीत भी है। आपका बाल साहित्य भी महत्वपूर्ण है। मांडनों से अक्षरों के उद्भव की कल्पना पर आधारित हिन्दी वर्णमाला की पुस्तक लिखी जो प्रौढ़ साक्षरता अभियान में चल रही है। आपने राष्ट्रीयता से ओतप्रोत काव्य लिखा है। इनका सृजन समाज को राष्ट्रीय चरित्र देने की प्रेरणा देता है। वर्तमान में विश्व शांति अभीष्ट है। अतः आपकी ईश्वर से प्रार्थना है-
सारे जग में बस प्यार भर दोश् श्चिर शान्ति, चिर प्रेम विस्तार कर दो।
’एक एक शब्द को अपने भावबोध से ऊर्जस्वित् कर अभिव्यक्ति देने वाली रचनाकार अनुराधा शर्मा की साहित्यलेखन- दक्षता देखिए –
जीवन मधु का प्याला नहीं
हालातों को पीना पड़ता है।
औरों में दम कहां गिरा दें हमें
सांपों को आस्तीन में रखना पड़ता है।
अभिव्यक्ति का तीर चलाना पड़ता है।
आपका अद्भुत कथ्य और शिल्प सटीक शब्दावली से गागर में सागर भरता है -सोच के गलियारे में मोच का आना छीन लेता है सुख
डॉ. गीता सक्सेना – गद्य में भी पद्यात्मक शैली आपके लेखन की विशिष्टता है। हाड़ौती अंचल के साहित्यकारों पर शोध कार्य इनकी विशिष्ट उपलब्धि है। कथात्मक, विवेचनात्मक, वर्णनात्मक कलात्मक आदि शैलियों में लिखती हैं। इनके साहित्य से भाव एवं विषयानुरूप रसों का आस्वादन किया जा सकता है। समसामयिक चेतना, सामाजिक-सांस्कृतिक उन्नयन व अध्यात्म काव्य सृजन के विषय हैं। विषय की गंभीरता, औचित्यपूर्ण सपाटबयानी, लाक्षणिकता व आलंकारिकता काव्य वैशिष्ट्य है। ’ हास्य रस को रचना में भरपूर स्थान देती हैं तारुणी कारिया। नील प्रभा जी भी हास्यव्यंग्य लिखती हैं।
’ गीता जाजपुरा व नीलप्रभा नाहर की रचनाएं राष्ट्रीयता से प्रेरित हैं तो डॉ. हिमानी भाटिया नारी के प्रति संकुचित दृष्टिकोण रखनेवालों को आइना दिखाती हैं।
’ डॉ. वैदेही गौतम शब्दों के जादू व चिन्तन से दिल को गहराई तक छूती हैं। आशावादी दृष्टिकोण, सतत गतिमान रहने की प्रेरणा, विचारात्मक भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक शैली का उपयोग व मनोविज्ञान की विशेषज्ञता ने आपके साहित्य को अति विशिष्ट बनाया है। आपने व्यक्ति के व्यक्तित्व का बखूबी विश्लेषण किया है। कुंठा, द्वन्द्व आदि मनोविकारों की सफल अभिव्यक्ति की है।
’ऊर्जा से भरपूर प्रयत्न करती दिखाई देती हैं ममता महक-
जमाने ने बिगाड़ी मगर औकात बाकी है।
रुवों के पार चल सितारे उठा लाएं,
कमरा रौशन हो बहुत सारे उठा लाएं।
’विज्ञान के युग को वैज्ञानिक साहित्य की भी अपेक्षा है। प्रज्ञा गौतम ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने लेख, कविताओं और कहानियों में विज्ञान लेखिका के रूप में अपनी पहचान बनाई है।
’जीवन संघर्ष से विश्रान्त मन को शांत रस चाहिए निर्मला आर्य के छंदों से निदाघ में कल कल निनादिनी शीतलाती सरिता सलिल के स्पर्शवत् अहसास मिलता है –
धन्य धन्य तुलसी करवाया, शिव से वंदित राम को किया प्रतिष्ठित मर्यादा के उच्च शिखर पर राम को।
’ डॉ. मनीषा शर्मा- आपने आधुनिक काल के प्रमुख रचनाकारों के साहित्य पर आलेख लिखे हैं। अनेकानेक महत्वपूर्ण विषयों पर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत भी किया है। अनेक कथाकारों के साहित्य का तुलनात्मक विश्लेषण भी किया है। शोधकर्ताओं, रचनाकारों व साहित्य रसिकों के लिए आपका साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। डॉ. जगदीश गुप्त जी के संपूर्ण साहित्य की आपने विस्तृत विवेचना की है।
कुसुम जोशी हिन्दी और राजस्थानी में कविताएं, गीत और हास्य व्यंग्य का प्रभावी, भावपूर्ण साहित्य लिख चुकी हैं। आपने हनुमान चरित्र महाकाव्य की भी रचना की है। हाड़ौती की गौरव आप देश-विदेश में श्री हनुमंत कथा का वाचन कर रही हैं। सुमन लता जी की कलम कहीं दोहों से कहावतें गढ़ती है तो कहीं प्रकृति के अभिराम चित्रण से मोह लेती हैं।
’सुलोचना शर्मा भावपूर्ण आध्यात्मिक और दार्शनिक रचनाएं करती हैं-
काल घड़ी अपमान न कर दुर्वाणी का पान न कर अहंकार अभिमान न कर
जो जन्मों के घेरे से छूटे मोक्ष विराम है, नहीं पूर्ण है
जो अशेष है वहीं पूर्ण है जो शून्य है वही पूर्ण हैं
’ खोखले आकर्षण विवेक पर पर्दा डाल देते हैं और लोग देखा-देखी करते हैं। फलतः अनेक प्रकार से हानि होती है। यह व्यक्ति से लेकर विश्वस्तर तक भी हो सकती है। इससे बचाव का प्रयास करती, कवयित्री अक्षयलता शर्मा प्रश्न उठाती हैं –
बहती हवा की धार में बह चला, तिनका या कि आदमी?
और भी –
जीवन संघर्ष से पस्त व्यक्ति को उठ खड़े होने की उत्तेजना देती पंक्तियां –
वक्त को पछाड़ टूट,
विश्वरूप तू विराट तू, अटूट है तू आदमी,
उठ रे उठ, तू है आदमी ।
अशक्त को संबल देने की प्रेरणा –
आदमी है आदमी तो उठा सकेगा आदमी ।
’उषा शर्मा जी ने नारी की पीड़ा के भिन्न-भिन्न रूपों को उभारा है –
पिया बिना नहीं 2भावे सिंगार फीका छ तीज त्यौहार
शिक्षा का अधिकार मिला पर पढ़ने कैसे जाऊं
जगह-जगह पर खड़े लुटेरे मैं कैसे बच पाऊं
’वंदना शर्मा जी राजस्थानी में मधुर गीत लिख रही हैं। आप नारी की वेदना इस प्रकार व्यक्त करती हैं –
मू बी थारो अंस री माता मू थारी परछाई। बेटी को आबा सुं घर म क्यों उदासी छाई।
’दहेज प्रथाजन्य व्यथा जेबा फिजा के शब्दों में -कोंख में ही छिनता बेटी से जीवन का मौलिक अधिकार…… लोभी सामाजिक पशुओं की मार
’नारी की खूबियों को बखूबी दर्शाया है यशोदा शर्मा जी ने -रण में जाऊं तो ज्वाला हूं, यूं प्यारी सी बाला हूं। घर की खुशियां भी सारी हूं, सारे घर का ताला हूं।
’ नारी की महानता से वाकिब डॉ. शबाना नारी को न्याय दिलाने हेतु, नारी के प्रति दुराचार पर सवालों की झड़ी लगा देती हैं-कर
’’बेटी बनकर खुशी लुटाऊं बीवी बनकर घर को सजाऊं मां बनकर पूरी हो जाऊंश्,
’हर रिश्ते से सटी हुई हूं, फिर क्यों मुझको तोड़ा जाता।
क्यों चलते हो मुझसे चाल?
प्रमिला गुप्ता ने नारी-धर्म कविता में नारी की विशेषताओं को कई रंग रूप में उभारा है -बर्फ सी दिखती शिला पर हाथ न रखना, धधकते अंगार से अधिक गर्म है नारी।
’नारी की प्रकृति पल्लवी दरक के शब्दों में -विरहिणी नारी की पीड़ा का भावचित्र –
बैठ अकेली सरि के तीरे, करती मन से मन की बात तेरे विरह में सब कुछ भूली, क्या होते हैं दिन और रात सर्द हवाओं से लिपटी बैठी अपलक सरि को रही निहार नीर बन तुम बहते रहे, शिला सी ठहरी रही मैं नार।
’भावना की अनुकरणीय विशाल हृदयता का निदर्शन हैं प्रमिला गुप्ता जी का ये सृजन –
नशा प्रीत का नशा मीत का सीखो और सिखाओ जग को अपने तो अपने ही होते बेगाने भी अपने हों
’उच्च कोटि के भावबोध के साथ सरल शब्दों में अर्चना शर्मा जी का अभिव्यक्ति कौशल –
खता मेरी नहीं तो भी सजा मेरी है काश तुम भी मान लेते खता अपनी मैं बांट देती सजा आधी वाह! कितनी संप्रेषणीयता है।
’कम से कम शब्दों में अधिकाधिक कहने का सामर्थ्य सिद्धहस्त कवयित्री शकुन्तला
साहू के हाइकु में -सच्चाई चीखी बेईमानी के द्वार मरने तक वयोवृद्धों के प्रति कृतज्ञता मेघना तरुण के शब्दों में-बस चलते रहना उस बुढ़ापे के लिए, जिसने जवानी गला दी, तुम्हारी जवानी के लिए।
सामाजिक विषमताओं पर लेखन -लिव-इन रिलेशनशिप में रिश्तों में ना रही शुद्धता नर-नारी पर समलैंगिकता छाई ये कैसी संस्कृति है आई
वर्जिनिटी कीमत बाजारों आई….
’पिंकी परुथी के बेशकीमती शब्द -पाक साफ, पवित्र होता है किसी दुआ, विनती और प्रार्थना सा। सुनो, प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं, पर, अन्तर कर लेना, प्रेम और वासना में।
भक्ति-भाव में पगी पिंकी परुथी की काव्य पंक्तियां-सुनो कृष्ण, तुम्हारी आभा के वृत्त में, अनुभूति होती है, नितान्त शान्ति की, निजता के संरक्षण की, भावनाओं के ठहराव की।
’कथात्मक व चित्रात्मक शैली में आशावादी स्वर मधु सनाढ्य जी के शब्दों में -आज देखा मैंने उसे अपनी टापरी के बाहर चाय बनाते चाय बनी उसने डाली अपने टूटे टिफिन के खाने में और सुडकने लगा मैंने पूछा नाम क्या है तुम्हारा। बोला विक्रमादित्य आध्यात्मिकता की सुवास की एक बानगी -मैं बुद्ध बन रही हूं
नैसर्गिक जीवन में आनंद की लहरें चलीं उठीं भावनाओं के हंस तैरे आता है आनंद देख खुद का शवश् ’ डॉ. शशि जैन के शब्दो में प्रेम और विरह की खूबसूरती-किसी के साथ दूर तक जाकर तो देखोय अकेले लौटकर आना कितना मुश्किल है?
’शमा फिरोज-मेरे हर दर्द की दवा है ईश्क शुक्रिया क्यों न करें रब का ताकत है प्यार में यह समझना जरूरी है दुश्मन भी प्यार पाके वफादार हो गए।
’ -गद्य- पद्य विधाओं में लक्षणा और हास्य व्यंग शैली में सभी रसों में कुशलतापूर्वक लिखने वाली शशि सक्सेना हाइकु लिखने में भी प्रवीण हैं-
खुशहाली है कच्ची ईंटों से बने उन घरों में आपके हाइकु अमेरिका से प्रकाशित श्श्री राम पीयूष हाइकुश् में प्रकाशित हुए हैं।
संजू श्रृंगी की आत्मा की आवाज है, खुश रहो, खुश रखो-मौसम खुशियों भरा चला आएगा। बांटकर खुशियां जमाने में सारी मायूस चेहरों को हंसाने की जिद है। खुश रहने या उदासी दूर करने का नुस्खा – मौसम खुशियों से भरा चला आएगा हाले दिल खुलकर सुनाओ तो जरा।
अपने आदर्श से सफल सार्थक जीवन की राह दिखाती हैं शोभा सक्सेना -श्दूसरों की बुराइयां न टटोलकर अपने को अच्छा बनाऊं समाज में असहायों की सेवा कर अपने को धन्य बनाऊश्
सभी पुष्पों का अपना सौंदर्य होता है। हर चेहरा सुंदर होता है। दृष्टाओं की दृष्टि भिन्न भिन्न हो सकती है। अतः इस कृति को आद्योपांत पढ़ा जाना चाहिए। इससे देश व समाज में अपेक्षित परिवर्तन संभव है।
आदरणीय डॉ. प्रभात सिंघल का पुस्तक लेखन बहुउद्देशीय सार्थकता लिए हुए है। लोक-मंगल की दृष्टि से यह बड़े महत्व का है। विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, साहित्यरसिक सामाजिकों, पुस्तक पठन कीअभिरूचि रखने वालों एवं रचनाकारों के लिए विशेष कर उदीयमान प्रतिभाओं के लिए निश्चय ही यह कृति वरदान सिद्ध होगी। माननीय समीक्षक का योगदान अप्रतिम है।
पुस्तक : नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान
लेखक : डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
प्रकाशक : साहित्यकार, जयपुर
हार्डबाउंड
मूल्य :
उपलब्ध ; अमेजॉन/ फ्लिपकार्ट
समीक्षक :अक्षयलता शर्मा
पता:-श्रीमती अक्षयलता शर्मा
विला न.34 ‘बी’ ब्लाक
बालाजी विहार ,अपना बेंगलो, मोहनपुरा
नियर केसर सर्किल त. सांगानेर, जयपुर
मोबाइल नं. 9461704390
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