बड़े ज़ोर-शोर से हमेशा कबीर को उद्धृत किया जाता है कि ‘जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान’…लेकिन मराठी भाषा की एक कहावत भारतीय समाज को आईना दिखा देती है कि ‘जाता जात नाही ती जात’…मतलब जो कभी ‘जाती’ ही नहीं वही है ‘जाति’। मराठी भाषा की कहावत का उल्लेख इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे के गांधी भवन में 25 अप्रैल को हिंदी नाटक खेला गया ‘कोर्ट मार्शल’। स्वदेश दीपक का यह पुरस्कृत नाटक इससे पहले भी कई बार पूरे देश में विभिन्न नाट्य समूहों ने खेला है। पुणे की संस्था स्वतंत्र थियेटर खुद इसके पहले कई शो कर चुकी है। इस बार उन्होंने इसे पुनः प्रस्तुत किया। नाटक का शीर्षक अपने आप में मार्मिक है। दुनिया की किसी भी सेना में जब भी गंभीर अपराध होता है, तो होता है – कोर्ट मार्शल। सेना की पृष्ठभूमि पर यह कोर्ट रूम ड्रामा है, जो भीतर तक उद्वेलित कर देता है। पहलगाम में हुई ताज़ा घटनाएँ, जब जाति पूछकर मार दिया गया हो या महाराष्ट्र में ‘फुले’ फ़िल्म के प्रदर्शन से पहले के हंगामे हों, इस पृष्ठभूमि में यह नाटक कई सवालों के साथ दर्शकों को झंझोड़कर रख देता है। इसे देखने के बाद दर्शक सोचता है नाटक एक व्यक्ति का कोर्ट मार्शल न रहकर जैसे पूरे समाज पर चल रहा मुकदमा बन जाता है।
जातिप्रथा से जन्मी घृणा और अहम्मन्यता के शिकार रामचंदर के प्रतिशोध की यह कहानी सन् 1988 की सत्य घटना पर आधारित है। रंजीत कपूर द्वारा नाट्य रूपांतरित कर इसका मंचन अन्वेषण थिएटर ग्रुप द्वारा अपनी स्थापना के बाद सबसे पहले 1992 में पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में किया गया था। अब 2025 आ गया है लेकिन तबसे आज तक न स्थितियाँ बदली हैं, न हालात। इस नाटक का नायक रामचंदर है जो निचली जाति का होने से सामंती प्रवृत्ति का शिकार है। रामचंदर के प्रतिशोध से कैप्टन वर्मा का कत्ल और कैप्टन कपूर पर गोली चलाने के अपराध में कोर्ट मार्शल में किया जा रहा है।
इस कोर्ट मार्शल का सभापति जज कर्नल सूरत सिंह के बारे में नाटक की शुरुआत में एक सैनिक कहता है – दस कोर्ट मार्शल कर चुके हैं और आज तक कोई मुजरिम बच नहीं सका उनके हाथों। समझ लो हो गया रामचंदर का राम नाम सत। केंद्रीय पात्र रामचंदर (प्रवेश साकोरे) के पास बचाव में बोलने के लिए एक ही संवाद है लेकिन मात्र एक छोटे से दृश्य में वह दर्शकों की सहानुभूति की धारा बदल देता है। कैप्टन बिकाश राय (हिमांशु शर्मा) कहते हैं सोचिए ज़रूर कि रामचंदर ने गोली क्यों चलाई, क्यों किया खून? वे बचाव पक्ष के वकील हैं और रामचंदर ने खून क्यों किया, की जड़ तक जाते हैं। वे गवाहों के असली चेहरे सामने लाते हैं। वे उसके कत्ल को सामाजिक क्रांति की आग में बदल देते हैं। कैप्टन बिकाश का संवाद है कि जब छोटे छोटे विरोध दबा दिए जाते हैं तो हमेशा एक भयकंर विस्फोट होता है, प्राणघातक विस्फोट।
नाटक में कठोर तथ्यों को भावनात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया है। न्याय के लिए संघर्ष नाटक का कथ्य है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह विचारों के दमन और प्रतिक्रिया के संघर्ष की कहानी है। सेना अनुशासन के नाम पर होने वाले मानवीय अत्याचार तथा झूठे बयानों पर आधारित अंधी न्याय व्यवस्था का चित्रण नाटक का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सामान्य अपराध पर प्रकाश डालने के साथ सत्य की तलाश, मूल्यों की छानबीन और मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करने वाली गंभीर व सार्थक नाट्य कृति है। मंच पर 14 पात्र नाटक में कारण व सत्य को ढूँढते दिखते हैं। ऊपरी धरातल पर रामंचदर पर किए गए कोर्ट मार्शल के साथ भीतर और एक कोर्टमार्शल अंतरात्मा का जजों के सामने हो रहा है।सेना की वर्दी पहने हुए कलाकार अपने अभिनय से दर्शकों पर स्थायी छाप छोड़ते हैं। कोर्ट मार्शल में चरित्र चित्रण को सामने रखते हुए निर्देशक अभिजीत चौधरी और उनकी टीम ने सूक्ष्मता के साथ पेश करने में सफलता हासिल की है। नाटक में पात्रों की भरमार है लेकिन चरित्रांकन सफलता में कोई संदेह नहीं है। नाटक के प्रमुख पात्र कर्नल सूरत सिंह (प्रशांत गौड़ा), रामचंदर, कैप्टन बिकाश राय, कैप्टन बी.डी.कपूर, मेजर पुरी (धनश्री हेबलीकर) तथा गौण पात्र सुबेदार बलवान सिंह, ले. कर्नल रावत, डॉ. गुप्ता, गार्ड के चरित्र भी महत्वपूर्ण हैं।
सभी पात्र सजग व स्वाभाविक हैं। कैप्टन बी.डी. कपूर समाकालीन व्यवस्था का प्रतिनिधि चरित्र है। सामंती व्यवस्था के प्रतिनिधि के रूप में आया पात्र शुरू में अत्याचारी और बाद में अपमान से आहत होकर कायराना कृत्य आत्महत्या कर लेता है। वह शराबी है। वंश महिमा का गुणगान कर कहता है- वी बिलांग टु रूलिंग क्लास। पत्नी को वस्तु समझता है। वह अंहकारी–अत्याचारी, भ्रष्टाचारी है। आत्मा के हत्यारे कैप्टन कपूर और वर्मा तथा आत्मसम्मान के लिए जीते फौजी रामचंदर को बिकाश राय जज के सामने रखते हैं। सूरत सिंह जो दया, क्षमा से रहित है, वह भी पूरी तरह हत्यारा जानने के बाद भी रामचंदर को हत्यारा मानने के बजाय ईमानदार फौजी मानते हैं। गवाहों का पदार्फाश होते हुए सामंती वर्ग द्वारा शोषण व नारी वर्ग (मिसेस कपूर- मृणाली) का शोषण भी सामने आता है।
नाटक के संवाद अत्यंत चुटीले व नाटकीय हैं। बिकाश राय के संवाद सबसे अधिक सटीक, सार्थक व यथार्थपूर्ण हैं। नाटककार अपनी अभिव्यंजना शैली में एक शब्द में ही संपूर्ण अर्थ व्यंजित करता है। पात्रों की मनोदशा भी बताता है। कहीं-कहीं लंबे संवाद पात्रों के मनोविश्लेषण तथा पात्रों की स्थिति को पूर्णता प्रदान करते हैं। नाटक में कोई भी प्रसंग ऐसा नहीं जो नीरस हो। शाब्दिक भाषा के साथ हरकतों की भाषा, रामचंदर की चीख, मेजर पुरी का तमतमाया चेहरा, गार्ड की शारीरिक चेष्टाएँ भावों को प्रकट करती हैं। मंच सज्जा, चरित्र चित्रण, संवाद, ध्वनि (साराक्षी-मोक्षा) से फौजी अदालत का परिवेश दिखता है। पात्रों का चाल चलन, कोर्ट रूम जैसा स्टेज, फौजियों की चाल, उठना-बैठना हमेशा चुस्त और फुर्तीला होता है, जो दिखता है। नाटक की भाषा प्रवाहमय है। पात्रानुकूल,संकेत सूचक व लयबद्ध है। संवाद की भाषा फौजी हिंदी है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग चरित्र को दिखाने के लिए किया गया है। कुशल शहाणे, हुजैफ खान, दीपक गुप्ता, सचिन कस्बे, पूजा, राजन चौहान, सुमित तुपारे, ओम ओवल ने अपने पात्रों को जीवंत किया है। इसके निर्माता युवराज शाह तथा रचनात्मक निर्देशक धनश्री हेबलीकर हैं।
‘मेरा सामना कई बार मौत से हुआ है, मैंने बहुत से लोगों की जान ली है युद्ध के मैदान में भी और कोर्ट मार्शल में भी..।’
कर्नल सूरत सिंह के इस संवाद से ‘कोर्ट मार्शल’ नाटक की शुरुआत होती है। अंत में कर्नल सूरत सिंह के साथ रामचंदर शराब का आखरी जाम लेता है और यहीं नाटक खत्म होता है।
—
कथानक
प्रस्तुत नाटक में रामचन्दर एक निम्नवर्गीय जवान (सवार) का कोर्ट मार्शल किया जाता है। नाटक में उसने एक जघन्य अपराध किया है। उसका अपराध यह है कि दस जून की रात को जवान रामचन्दर गार्ड ड्यूटी पर था। रात के नौ बजे रेजिमेंट के दो अफसर कैप्टन मोहन वर्मा और कैप्टन कपूर गार्ड चौकी के पास से गुजरे। जवान रामचन्दर ने सरकारी राइफल से उन पर गोली चला दी। कैप्टन मोहन वर्मा की हादसे की जगह पर ही मौत हो गई। कैप्टन कपूर गंभीर रूप से घायल हो गये। इंडियन आर्मी एक्ट 69 और इंडियन पेनल कोड के अनुसार दफा 302 के तहत जवान रामचन्दर का जनरल कोर्ट मार्शल किया जा रहा है। जानबूझकर होशो-हवास में हत्या करने पर कोर्ट मार्शल।
कर्नल सूरत सिंह के इस संवाद से ‘कोर्ट मार्शल’ नाटक की शुरुआत होती है। अंत में कर्नल सूरत सिंह के साथ रामचंदर शराब का आखरी जाम लेता है और यहीं नाटक खत्म होता है।
—
कथानक
प्रस्तुत नाटक में रामचन्दर एक निम्नवर्गीय जवान (सवार) का कोर्ट मार्शल किया जाता है। नाटक में उसने एक जघन्य अपराध किया है। उसका अपराध यह है कि दस जून की रात को जवान रामचन्दर गार्ड ड्यूटी पर था। रात के नौ बजे रेजिमेंट के दो अफसर कैप्टन मोहन वर्मा और कैप्टन कपूर गार्ड चौकी के पास से गुजरे। जवान रामचन्दर ने सरकारी राइफल से उन पर गोली चला दी। कैप्टन मोहन वर्मा की हादसे की जगह पर ही मौत हो गई। कैप्टन कपूर गंभीर रूप से घायल हो गये। इंडियन आर्मी एक्ट 69 और इंडियन पेनल कोड के अनुसार दफा 302 के तहत जवान रामचन्दर का जनरल कोर्ट मार्शल किया जा रहा है। जानबूझकर होशो-हवास में हत्या करने पर कोर्ट मार्शल।
इस कोर्ट मार्शल के प्रोसेसिंग आफीसर कर्नल सूरतसिंह है। जिनके हाथ से आज तक काई मुजरिम नहीं बच पाया है। साथ ही गवाह के तौर पर उपस्थित व्यक्तियों को देखते हुए रामचंदर के बच निकलने के कोई आसार नहीं हैं। केवल एक कारण से रामचन्दर बच सकता है। वह है पासवर्ड पूछने का। अगर कोई उसे पासवर्ड पूछकर अन्दर न आये तो वह आर्मी लॉ के मुताबिक उसे गोली मार सकता है। लेकिन रामचन्दर इस प्रकार अपना बचाव नहीं करता है।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं और समसामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन करती हैं)

